प्रेम करने की आज्ञा दी

Derek Prince
*Last Updated: जनवरी 2026
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एक ऐसे संसार में जहाँ इतनी पीड़ा और विभाजन है, हमें ‘एक दूसरे से प्रेम करने’ की यीशु की आज्ञा का पालन कैसे करना चाहिए? - बाइबल के इस शक्तिशाली विचार में डेरेक प्रिंस हमें यीशु के उदाहरण और उसके प्रेम करने की ओर इशारा करके दिखाते हैं कि यह कैसे करना है।
यूहन्ना १३:३४-३५ में वचन कहता है:
“मैं” तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ, कि एक दूसरे से प्रेम रखो: जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दुसरे से प्रेम रखो। यदि आपस में प्रेम रखोगे तो इसी से सब जानेंगे, कि तुम मेरे चेले हो।”
यह प्यार कोई चुनाव नहीं है। यह एक आज्ञा है। यीशु ने कहा कि यह एक नई आज्ञा है।
यहूदी लोग मूसा की दस आज्ञाओं के आदी थे। एक निश्चित अर्थ में आप इसे शायद ग्यारहवीं आज्ञा कह सकते हैं और मेरा मानना है कि यह सभी दस आज्ञाओं को समम्मिलित करती है।
हमें एक दूसरे से प्रेम कैसे करना चाहिए?
ठीक उसी तरह जैसे यीशु ने हमसे प्यार किया था। वह निःस्वार्थ, स्वयं को देनेवाला, पहले दूसरों की भलाई चाहने वाला होता है। यीशु ने कहा कि यदि आपमें उस प्रकार का प्रेम होगा तो सारा संसार आपकी ओर ध्यान देगा, क्योंकि वे इसे और कहीं भी नहीं देखते हैं। वे जो देखते हैं वह स्वार्थ है, अपनी भलाई खोजना है, हड़पना है। आप परमेश्वर के प्रेम का प्रदर्शन करने के द्वारा पूरी स्थिति में क्रांति ला सकते हैं।
यदि आप आज अधिकांश लोगों से पूछें कि मसीही कलीसिया के बारे में उनकी क्या धारणा है, तो वे प्रेम के संदर्भ में बात नहीं करेंगे। संसार हमें इस तरह नहीं देखती है। अद्भुत और गौरवशाली अपवाद हैं, लेकिन मूलतः वे हमें एक धार्मिक लोगों के रूप में देखते हैं। जो कुछ नियमों का पालन करते हैं।
तो हमारे पास दो विकल्प हैं. या तो हम एक दूसरे से उसी तरह प्रेम कर सकते हैं जैसे यीशु ने हमसे प्रेम किया और आज्ञाकारी रह सकते हैं, या हम एक दूसरे से प्रेम करने से चूक सकते हैं और अनाज्ञाकारी हो सकते हैं। यीशु ने कभी व्यर्थ शब्दों का प्रयोग नहीं किया। उसने कहा, “यदि आपस में प्रेम रखोगे तो इसी से सब जानेंगे, कि तुम मेरे चेले हो।” ऐसा किया जा सकता है।
मैं किसी भी तरह से एक इतिहासकार नहीं हूँ, लेकिन मुझे पता है कि रोमी साम्राज्य में, जो इतिहास में अब तक दर्ज किए गए सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था, अविश्वासी मसीहियों के बारे में कहते थे, “देखो ये मसीही एक दूसरे से कैसे प्यार करते हैं।” यही उनकी धारणा थी. और यह जीत गया.
तीन शताब्दियों के भीतर पृथ्वी पर उस समय की सबसे शक्तिशाली साम्राज्य ने एक यहूदी बढ़ई, यीशु के दावों के सामने समर्पण कर दिया था, जो रोमी क्रूस पर मर गया था। वे इसे समझा नहीं सके। वे इसे समझ नहीं सके। विभिन्न पृष्ठभूमियों, विभिन्न जातियों और सामाजिक स्तरों के लोग एक-दूसरे से प्यार करते थे। उन्होंने जीवन के एक नए तरीके का मार्ग प्रशस्त किया जिसने पूरे रोमी जगत को प्रभावित किया।
इस तरह का प्यार वास्तव में कोई भावना नहीं है। यह एक निर्णय है। मैं आपको भजन संहिता १८ के पहले पद की ओर ले जाना चाहता हूँ। ये दाऊद के शब्द हैं:
“हे यहोवा, हे मेरे बल, मैं तुझ से प्रेम रखूँगा।
” दाऊद ने एक निर्णय लिया। क्या आपने कभी यह निर्णय लिया है? क्या आपने कभी सचमुच यह निर्णय लिया है कि मेरे भीतर जो कुछ भी है, उससे में प्रभु से प्रेम करूँगा?
अब दाऊद ने इसे निजी निर्णय बना लिया। लेकिन १ यूहन्ना ४ अध्याय में हमारा सामना एक सामूहिक निर्णय से होता है जो हमें और भी आगे ले जाता है:
“हे प्रियों, हम आपस में प्रेम रखें; क्यों कि प्रेम परमेश्वर से है: और जो कोई प्रेम करता है, वह परमेश्वर से जन्मा है; और परमेश्वर को जानता है” (1 यूहन्ना 4:7)
आप देखते हैं कि यह एक सामूहिक निर्णय होता है। आईए हम एक दूसरे से प्यार करें। अंतिम परीक्षा किसी सिद्धांत पर सहमति नहीं है, यह प्रेम है।
हर कोई जो प्यार करता है वह परमेश्वर से जन्मा है। जब तक आप परमेश्वर से जन्म नहीं लेते हैं तब तक आपको उस प्रकार का प्रेम नहीं मिल सकता है। लेकिन यदि आप परमेश्वर से जन्म लेते हैं तो इसका प्रमाण उस प्रकार का प्रेम होना चाहिए।
इसका आदर्श उदाहरण यीशु है। उन्होंने उसके साथ सब कुछ किया। उन्होंने उसे पीटा, उन्होंने उसके हाथ और पैर छेदे, उन्होंने उसके सिर पर काँटों का ताज रखा, उन्होंने उसे पीने के लिए सिरका दिया, उन्होंने उसे गालियाँ दीं, उन्होंने उसकी निन्दा की, लेकिन एक चीज जो वे नहीं कर सके वह क्या था?
वे उसे प्रेम करने से नहीं रोक सके। वह उनसे अंत तक प्यार करता रहा। यदि आप उस तरह का प्यार करते हैं तो कोई भी आपको रोक नहीं सकता है। आप पृथ्वी पर एकमात्र वास्तविक स्वतंत्र व्यक्ति हैं क्यों कि कोई भी आपको वह करने से नहीं रोक सकता जो आप करना चाहते हैं।
मेरा मानना है कि परमेश्वर इसी बात की प्रतीक्षा कर रहा है कि हम एक दूसरे से उसके ईश्वरीय प्रेम से प्यार करें।
हम विश्वास और धार्मिकता के बारे में जितना चाहें उतना बात कर सकते हैं, लेकिन यदि हम लोगों के लिए कुछ नहीं करते हैं जिन्हें वास्तव में हमारी जरूरत है तो हम केवल खोखले शब्दों का उपयोग कर रहे हैं। और ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जिन्हें हमारी जरूरत है।
मैं फिलिप्पियों ३ अध्याय में पौलुस की प्रार्थना से हमेशा आश्चर्यचकित होता रहा हूँ.
“और मैं उसको और उसके मृत्युजय की सामर्थ को, और उसके साथ दुखो मे सहभागी हाने के मर्म को जानू, और उस की मृत्यु की समानता को प्राप्त करूँाँ”
मैंने देखा है कि कुछ चीजे केवल कष्ट सहने से ही आती हैं।
दुःख वह कार्य करता है जो कोई और नहीं कर सकता। और फिर मुझे याद आता है, जब मैं ब्रिटिश सेना में चिकित्सा सहायक या अर्दली था। मैने अपने ब्रिटिश सैनिकों के साथ अपने जुड़ाव से सीखा कि जो लोग एक साथ वास्तविक कठिन, खतरनाक समय से गुजरे हैं, वे आग मे डाले गये, वे गुफाओं मे रहे, वे जहाँ भी रहे - वे इस तरह एक साथ बंधे हुए रहे जैसा अन्य लोग बंधे न रहे थे।
वे अपने व्यक्तित्व, अपने सामाजिक स्तर और कई अन्य बातों में बहुत भिन्न हो सकते हैं, लेकिन एक साथ रहना लोगों को आपस में जोड़ता है। और मुझे लगता है कि यीशु हमसे जुड़ रहना चाहता है, और जब हम उसके साथ मिलकर इससे गुजरते हैं तो हमारा उनके साथ एक ऐसा बंधन बन जाता है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता है। इसलिए मैं दुख का स्वागत नहीं कर रहा \vec{\delta}_{\alpha} लेकिन मैं इसके लिए तैयार हूँाँ मुझे मालूम है कि कुछ चीजें हैं जो परमेश्वर मुझमें कष्ट के बिना नहीं कर सकते हैं।
आप क्या सोचते हैं? क्या आप कोई समर्पण करना चाहेंगे? यह एक वचन सम्मत समर्पण है। क्या आप पौलुस के शब्दों में कहेंगे, “मैं” उसको और उसके मृत्युंजय की सामर्थ को, और उसके साथ दुखों में सहभागी हाने के मर्म को जानूँ ।” आप पहले से कहीं अधिक प्रभु के करीब आ जायेंगे। और परमेभगवान यही चाहता है। मैं आपको शांत भाव से निम्नलिखित वक्तव्य देने का अवसर देना चाहता हूँ।
*Prayer Response
प्रभु यीशु, मैं आपको धन्यवाद देता हूँ कि आप मेरे लिए क्रूस पर मरे। कि आपने मुझ से अनन्त प्रेम किया है। कि आपने मुझे प्रेममय अनुग्रह से अपनी ओर खींच लिया है।
और अब, प्रभु, मेरा एक निवेदन है कि मैं आपको और आपके पुनरुत्थान और आपके कष्टों की शक्ति की संहभागिता को जान सकाँ ताकि मैं अपने जीवन में अब तक जितना देखा हूँ उससे अधिक घनिष्ठ संगति में आपकी ओर आकर्षित हो सकाँ प्रभु, मैं बिना किसी संदेह के स्वयं को आपको सौंपता हूँाँ
मुझे वैसे ही अपनाईये जैसा मैं हूँ और मुझे वैसा बनाईये जैसा आप मुझे अपनी महिमा के लिए बनना चाहते हैं। यीशु के नाम में, आमीन् ।
कोड: TL-L808-100-HIN