ब आप किसी डॉक्टर के पास जाते हैं तो आप यह चाहते हैं कि उसे उन बातों का ज्ञान हो जो वह कह रहा है।

हम डॉक्टर से यह चाहते हैं कि वह हमारे बीमारी के रोकथाम, दर्द कम करने और किस प्रकार स्वस्थ रहने के विषय में हमें बताये। हम यह चाहते हैं कि वह अनुभवी हो और साथ ही साथ अच्छी प्रशिक्षण को भी प्राप्त किया हो। हम में से कितने होंगे जो एक ऐसे डॉक्टर से अपना इलाज करवाना चाहेंगे जो कभी किसी मेडिकल स्कूल में नहीं गया हो, कभी कोई किताब नही पढ़ी हो और कभी कोई अनुसंधान में काम न किया हो। वह व्यक्ति दूसरों के लिए कितना प्रभावशाली होगा ?

यही लागू होता है मसीही जन के लिए भी जब वे धार्मिक लड़ाई लड़ते हैं। हमें 'अनुभव' तो होता है, हम अपने व्यक्तित्व को बढ़ाने की कोशिश भी करते हैं। परन्तु अगर हमने किताब नहीं पढ़ी हो-जो अधिकार से भरा हुआ हैं तो हम सफल न हो पाएंगे। हम किसी सही तत्वज्ञान, या परमेश्वर के बारे में नेक विचारों को अपनाते हैं, परन्तु अगर हमारी जड़ें वचन के आधार पर न हो तो हमारे वचन में विश्वसनीयता नहीं होती। इसका कोई दूसरा रास्ता नहीं हैः अगर हमारी मसीही जीवन का निर्माण परमेश्वर के वचन में न हुआ हो तो हम सहनशीलता पर उम्मीद नहीं लगा सकते।

दो प्रकार से 'परमेश्वर के वचन' को प्रयोग किया गया है। पहला स्वयं पवित्रशास्त्र (परमेश्वर द्वारा लिखा गया वचन) और दूसरा है यीशु मसीह (परमेश्वर का अपना वचन)। दोनों ही 'परमेश्वर के वचन' कहलाते हैं। अगर हमें यीशु से एक संबंध कायम करना है तो हमें पवित्रशास्त्र से सही संबंध रखना होगा। आयें खोज करें परमेश्वर के वचन के अधिकार और सामर्थ को किस प्रकार पवित्र आत्मा इस सत्य की गवाही देता है।

किसके वचन है यह ?

‘अधिकार’ (authority) शब्द ली गई है author (रचयिता) शब्द से। किसी भी अधिकार में रचयिता का अधिकार है। दूसरे शब्दों में, वह रचयिता ही है जो उन सब चीजों पर अधिकार देता है जिसकी रचना उसने की है। इसलिए यह जरूरी है कि हम पवित्रशास्त्र के रचयिता को जान लें।

“हर एक पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिये लाभदायक है। ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने और हर एक भले काम के लिए तत्पर हो जाए” (२ तीमुथियुस ३ः१६-१७)।

आखिरकार रचयिता है। उसने विभिन्न साधनों का प्रयोग किया, परन्तु पवित्र आत्मा जो स्वयं परमेश्वर है इन सब का संचालन करता रहा। जब हम पवित्रशास्त्र से दूर होते हैं, तो हम परमेश्वर के अधिकार से दूर होते हैं।

पौलुस यह भी कहता है कि हरएक पवित्रशास्त्र, न की कुछ या थोडे से । कुछ पद जिन्हें हम मूल्यवान समझते हैं उन्हें अमूल्यवान समझने वाले पदो से अलग करने के लिए हमें कोई अधिकार नहीं। पवित्र आत्मा स्वयं घोषित करते हैं कि 'हरएक' पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने और सुधारने और धर्म की शिक्षा के लिए लाभदायक है।

क्या ऐसा कोई भी लेख या अध्याय या आयत है जिसे हम कम महत्व का समझकर छोड़ सकते है। हमें कुछ आयतों को ही ध्यान में नहीं रखना है जो बहुचर्चित है बल्कि यह सोचना है कि हर एक वचन महत्व रखता है। हम इसे पायेंगें जब हम इन पर मनन करेंगे और जब इन पर अमल करेंगे। यीशु ने कहा हमें परमेश्वर के वचन सुनने और मानने वाले बनना है; सिर्फ सुनना ही नहीं परन्तु सुनना और मानना ।

कोई ऐसा कह सकता है, "परन्तु जिन लोगों ने पवित्रशास्त्र लिखें वे कई स्थानों पर कमजोर व अविश्वसनीय थे। और पवित्र शास्त्र उनके पापों के बारे में भी बताता है।" यह सही हो सकता है। मैं समझता हूं पवित्रशास्त्र के सच्चे होने का प्रमाण है कि यह उन लोगों के पापों का बयान करता है जिन्होंने यह लिखा है। आजकल ऐसे कई लोग हैं जो अपने पापों को छिपाते हुए अपने आपको विश्वसनीय बताते हैं। पवित्रशास्त्र के लिखने वालों ने यह नहीं किया। हम देखते हैं किस प्रकार दाऊद ने अधिकतर भजन संहिता अपने पाप में पड़कर लिखा ताकि सब इसे पढ़ सके।

तो फिर किस प्रकार पवित्रशास्त्र अविश्वसनीय होगा अगर उसके लिखने वाले विश्वसनीय है? इस प्रश्न का बहुत ही उत्तम जवाब एक सरल आयत से दी गई हैः

"परमेश्वर का वचन पवित्र है, उस चांदी के समान जो भट्टी में मिट्टी पर ताई गई है और सात बार निर्मल की गई हो" (भजन संहिता १२:६)।

यह एक चित्र है जिस प्रकार मनुष्य एक धातु को शुद्ध बनाते हैं वे मिट्टी के भट्टी बनाकर उसमें आग जलाते है और धातु को शुद्ध करने के लिए उसमें डाल देते हैं तो हम इसका एक तुलनात्मक चित्रण कर सकते हैंः 'मिट्टी के भट्टी' जो है मानव। साधन सिर्फ मिट्टी, आग जो है पवित्र आत्मा, और वह शुद्ध करता है चांदी को जो है संदेश।

यह बताती है कि किस प्रकार विश्वसनीय पुरूष और स्त्री जन एक प्रेरणात्मक और अधिकार से भरे परमेश्वर के वचन को उत्पन्न करने के साधन बन गये। मिट्टी है मानव घड़ा, आग है पवित्र आत्मा और चांदी है 'परमेश्वर का संदेश" जो सात बार शुद्ध किया गया, एकदम शुद्ध। पवित्रशास्त्र, गुजरता है मिट्टी के घड़े से जो कमजोर, विश्वसनीय, पापी पुरुष और स्त्री जन है, परन्तु सात बार पवित्र आत्मा की आग में शुद्ध किया गया। वह पूर्ण रूप से विश्वसनीय है।

यीशु और वचन

हमें यीशु के स्वभाव को देखना है जो पवित्रशास्त्र के लिये था, क्योंकि हम जो उसके चेलें हैं, हमारे लिये वह आदर्श है। वह लिखे हुए वचन से कैसे संबंध रखता है? आयें शुरुआत करें उसके दिनों में जो शिक्षा उसने पवित्र शास्त्र के बारे में दी है, जिसे हम पुराना नियम कहते हैं।

कीयहूदियों के अगुवों से एक दिन वार्तालाप करते समय, यीशु ने ऐसा कहा, "यदि उसने उन्हें ईश्वर कहा जिन के पास परमेश्वर का वचन पहुंचा... (और पवित्र शास्त्र की बात लोप नहीं हो सकती) (यूहन्ना १०:३५)।

यीशु ने बाईबल के दो शीर्षक दिये जो उसके अनुयायी तब से आज तक उनका प्रयोग कर रहें हैंः 'परमेश्वर का वचन' और 'पवित्र शास्त्र'। उसके द्वारा प्रयोग किये गये 'परमेश्वर का वचन' से अर्थ है जो परमेश्वर से शुरू हुआ। यह किसी मनुष्य से शुरू नहीं की गई; यह स्वर्ग से आया और सीधे परमेश्वर से। और उसके 'पवित्रशास्त्र' के प्रयोग करने का अर्थ है कि यह सब लिखित प्रमाण है। वह हमारे लिये लाभदायक है। उसमें सारी बातें बतायी गई है जो हमारे उद्धार के लिये जरूरी है।

महत्वपूर्ण व्यक्ति है? डेरेक प्रिन्स सिर्फ एक पापी है जो परमेश्वर के अनुग्रह से बचाया गया है।

बाईबल हमें बताती है किस प्रकार यीशु ने अपने जीवन में पवित्रशास्त्र के अधिकार का प्रयोग किया और जिस उदाहरण को हम भी प्रयोग कर सकते हैं। यीशु की कहानी जब वह मरूस्थल में शैतान द्वारा प्रलोभन में डाला गया। इस कहानी के पहले, मती के तीसरे अध्याय में यह कहा गया है कि किस प्रकार यीशु ने यरदन में बपतिस्मा पायाः

"और यीशु बपतिस्मा लेकर तुरन्त पानी में से ऊपर आया और देखो, इसके लिये आकाश खुल गया; और उसने परमेश्वर के आत्मा को कबूतर की नाई उतरते और अपने ऊपर आते देखा। और देखो यह आकाशवाणी हुई कि यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिस से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूं” (मत्ती ३:१६-१७)।

आप और मैं यह सोचेगें कि इसके बाद यीशु के दिन बहुत आराम से गुजरे। उसे दोनों पिता और पवित्र आत्मा का समर्थन मिला और उसके साथ यूहन्ना बपतिस्मा नामक भविष्यवक्ता का भी। इसके तुरन्त बाद एक भंयकर आमना सामना हुआ। यीशु ने अपने आपको मरूस्थल में चालीस दिनों तक उपवास में पाया।

और साथ ही शैतान के प्रलोभन का भी सामना करना पड़ा। कृपया यह नहीं समझे कि परमेश्वर की आशीष आपकी जिन्दगी को आरामदायक बनायेगी। हकीकत में कभी-कभी वह सबसे मुश्किल बना देती है वो इसलिए क्योंकि शैतान उन्हें पसन्द नहीं करता जिन्हें परमेश्वर ने अभिषेक किया है।

लूका कहते हैं कि पवित्र आत्मा ने यीशु को सिखाने के लिये उसे मरूस्थल ले गया (देखें लूका ४:१)। परन्तु चालीस दिन के अन्त में वह पवित्र आत्मा के सामर्थ से भर कर लौटा (देखें आयत १४)। ध्यान दें कि यह एक बात है कि आत्मा द्वारा ले जाये जाना और दूसरा कि उसमे भर कर उसके नियंत्रण में चलना। यीशु ने दूसरे भाग में तब तक प्रवेश नहीं किया जब तक उसने शैतान का सामना करते हुए उसे हरा न दिया। कुछ बातों में हमें भी ऐसा ही चलना है। हमें अपने प्रलोभनों को पवित्र आत्मा के सामर्थ द्वारा चलते हुए सामना करना है।

जब शैतान यीशु के पास आया तो पहली बात जो उसने प्रलोभित करने के लिये किया वह था कि उसे शंका में डालने की कोशिश करना। शैतान अपनी शुरूआत ऐसे ही करता है। वह एकदम से परमेश्वर के वचन मानने को इन्कार नहीं करेगा; वह आप से प्रश्न पूछेगा जिससे आप शंका के गिरफ्त में आ जाये।

"तब परखनेवाले ने पास आकर उससे कहा, यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो कह दे कि ये पत्थर रोटियां बन जाएं" (मत्ती ४:३)।

अभी परमेश्वर ने स्वर्ग से कहा ही था कि यह मेरा प्रिय पुत्र है। "शैतान यीशु को यह चुनौती दे रहा था कि वह अपने अन्दर शक को आने दे। "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो कह दे कि ये पत्थर रोटियां बन जाये।"

यीशु का जवाब यह थाः "उस ने उत्तर दिया; कि यह लिखा है कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है जीवित रहेगा" (मत्ती ४:४)।

वह परमेश्वर के उस वचन के अटूट अधिकार पर पूर्ण रूप से निर्भर था । हर एक समय जब यीशु ने प्रलोभन का सामना किया, उसने कहा, "यह लिखा है" और जब कभी यीशु ने यह कहा तो शैतान ने विषय बदल डाला। वह जानता था कि वचन का उसके पास कोई जवाब नहीं है। यह हमें दो महत्वपूर्ण निर्देश देते हैं, पहला हमें हमेशा पवित्रशास्त्र के अधिकार पर निर्भर रहना है। और दूसरा हमें इसका प्रयोग प्रलोभनों का सामना करते वक्त करना है। हम युद्ध नीति को और ज्यादा देखेंगे आने वाले अध्यायों में। परन्तु मैं यह अध्याय, जो पवित्र आत्मा के प्रेरणा से पवित्रशास्त्र के बारे में है, समाप्त करना चाहूंगा, यह कहते हुए कि कभी यह नहीं समझना कि आप बहुत चतुर हैं जो शैतान से बहस कर पायेंगे, वह आप से कहीं अधिक चतुर है। वह इस व्यापार में बहुत लम्बे समय से हैं और उसे अपने बहस से समझाने की कोशिश मत करो। बल्कि उसका सामना पवित्र शास्त्र से करो। पवित्रशास्त्र अधि कार से भरा है। उसे स्वीकार कीजिए। उसके साथ जीयें। शैतान को इससे जवाब दें।

परन्तु याद रखें आपको यह कहना होगा। इफिसियों ६:१७ में पौलुस कहते हैं, ".. आत्मा की तलवार जो परमेश्वर का वचन है, ले लो।" वचन के लिए ग्रीक में दो शब्द कहा गया हैः पहला है 'लोगोस' और दूसरा है 'रेमा'। 'लोगोस' पूर्ण है और परमेश्वर की ओर से अनन्त सलाह है। रेमा जिसे कहा गया है वह है परमेश्वर का वचन। यही वचन इफिसियों ६:१७ में प्रयोग किया गया है। पौलुस कहता है कि "आत्मा की तलवार", जो है (कहा गया रेमा) परमेश्वर का वचन है, ले लो।"

बाईबल आपको सुरक्षा प्रदान नहीं करती अगर वह किसी कोने में अन्य किताबों के साथ रखा गया हो या आपके पलंग के साथ वाले टेबल पर ही पड़ी हो। वह तभी कार्य करता है जब हम उसका इस्तेमाल करते हैं। आपको इसे अपने जुबान पर लाना है और स्वयं के लिये कहना है। तब यह एक तेज धार वाली तलवार बनेगी जिससे शैतान पीछे हट जायेगा। उसके पास अब कोई जवाब नहीं बचेगा।

मत्ती के सुसमाचार से हमें इस बात को और स्पष्ट रूप से पता चलता है जिसमें यीशु पुराने नियम के बारे में कहता हैः

"यह न समझो कि मैं व्यवस्था या भविष्यवक्ताओं की पुस्तकों को लोप करने आया हूं; क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूं कि जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएं तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिन्दु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा" (मत्ती ५:१७-१८) ।

मात्रा (jot) शुद्ध इब्रानी भाषा योड़ (yod) से लिया गया है, यह वर्णमाला का सबसे छोटा अक्षर है। बिन्दु जो केराईया (kerai) एक हल्का से घुमाव है जो किसी एक जैसे शब्द को पहचानने के लिये डाला जाता है। यह दो छोटे चीजे हैं जो ईब्रानियों में प्रयोग किया जाता है और अगर इनमें से कोई भी प्रयोग में न लाया गया तो पवित्र शास्त्र पूरा हुए बिना नहीं टलेगा। वह उस वक्त परमेश्वर के वचन के विषय में नहीं कर रहा था क्योंकि उसने मात्रा (jot) और बिन्दु (title) का प्रयोग किया जो सिर्फ लिखने के उपयोग में आता है। हमने देखा कि यीशु ने परमेश्वर के वचन के पूर्ण अधि कार को दृढ़ किया है।

यीशु की सेवकाई के अन्तिम दिनों में वह सदूकियों से बातें कर रहा था, सदूकियों जो उस समय के उदारवादी थे और जो पवित्रशास्त्र के सारे अधिकारों को नहीं मानते थे। परन्तु वे सिर्फ पांच अध्यायों के अधिकार को ही मानते थे जिसे पेंटाटियेक कहते है। पुनरूत्थान के बारे में बताये गये शिक्षा को चुनौती देने के उद्देश्य से सोच समझकर प्रश्न तैयार कर यीशु के पास आये। यीशु ने उनसे यह जवाब दियाः

"परन्तु मरे हुओं के जी उठने के विषय में क्या तुमने यह वचन नहीं पढ़ा जो परमेश्वर ने तुम से कहा कि मैं इब्राहीम का परमेश्वर और इसहाक का परमेश्वर हूं और याकूब का ध्यान से देखिए किस प्रकार यीशु ने उस पवित्रशास्त्र का प्रयोग किया।

यह वचन चौदह शताब्दी पहले मूसा द्वारा लिखी गई थी। यह वाक्य सीधे प्रभु द्वारा मूसा से कहा गया था। परन्तु यीशु ने उस वचन को सिर्फ मूसा तक ही सीमित नहीं रखा। उसने कहा, “क्या तुमने यह वचन नहीं पढ़ा जो परमेश्वर ने तुम से कहा...?” पवित्रशास्त्र कभी पुराना नहीं होता। वह सिर्फ मनुष्यों की बुद्धि से नहीं लिखी गई। यह परमेश्वर की प्रेरणा द्वारा है। भले ही ये तीन हजार साल पहले क्यों न लिखा गया हो परन्तु यह अब भी जैसे परमेश्वर हम से बात करता है। यही वह अधिकार है पवित्र शास्त्र का जिसे यीशु ने समझा था।

New Testament Authority

हमारे पास यीशु के स्वयं के शब्द हैं पुराने नियम के विषय में, परन्तु नये नियम का क्या? जो अधिकार पुराने नियम के पीछे हैं वही अधिकार नये नियम के भी पीछे है। नीचे दिये गये आयत में यीशु अपने चेलों को तैयार करता है उस सच्चाई से जो था उसका बिछड़ना।

“ये बातें मैंने तुम्हारे साथ रहते हुए तुम से कही। परन्तु सहायक अर्थात, पवित्रआत्मा जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा, वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा और जो कुछ मैंने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा” (यूहन्ना १४:२५-२६)।

प्रेरितों के द्वारा लिखे गये लेखनों के पीछे भी जो अधिकार है वह है पवित्र आत्मा का अधिकार। और यीशु ने कहा कि पवित्र आत्मा दो कार्य करेगाः "जो कुछ मैंने तुम्हें नहीं सिखाया वे बातें वह तुम्हें सिखायेगा और जो कुछ मैंने तुमसे कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण करायेगा।" इसलिए प्रेरित के यह लेखनी मनुष्य के ज्ञान पर निर्भर नहीं है; यह निर्भर है पवित्र आत्मा के सत्य पर।

मैं इस ओर दिखाना चाहूंगा कि अचानक यीशु ने सारे व्याकरण के सिद्धांत को तोड़ दिया जब उसने पवित्र आत्मा को वह it) की जगह पर वह मनुष्य (He) कहा। ग्रीक व्याकरण कहता है कि यीशु को वह (it) कहना चाहिए था, परन्तु उसने ऐसा नहीं किया; उसने वह (मनुष्य) (He) कहा। यह समझना बहुत जरूरी है कि पवित्र आत्मा सिर्फ वह अर्थात कोई वस्तु नहीं है परन्तु पवित्र आत्मा एक 'मनुष्य' (He) अर्थात् एक व्यक्ति है और हमें उसके साथ एक व्यक्ति के रूप में संबंध रखना है।

यूहन्ना १६ में यीशु पवित्र आत्मा के मुख्य विशेषताओं को प्रकट करता हैः

"परन्तु जब वह अर्थात सत्य का आत्मा आएगा तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा, परन्तु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा। वह मेरी महिमा करेगा, क्योंकि वह मेरी बातों में से लेकर तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना १६:१३-१४)।

पवित्र आत्मा हमेशा यीशु की महिमा करता है। अगर आप किसी ऐसे आध्यात्मिक बातों से गुजरे जो यीशु की महिमा नहीं करता परन्तु किसी व्यक्ति की महिमा करता है या किसी और दिशा में आपको ले जाता है, तो आपको समझना है कि वह पवित्र आत्मा नहीं है। सबसे बड़ी सेवकाई जो पवित्र आत्मा की है वह है यीशु की महिमा करना। बाईबल कहती है हमें अपनी आत्मा को परखना है और हम अपने आप परख सकते हैं कि वहां पवित्र आत्मा की उपस्थिति है या नहीं। सिर्फ यह देखते हुए कि वहां यीशु की महिमा हो रही है या नहीं। अगर नहीं हो रही और फिर भी धार्मिक या सच्ची लगती है तो भी वह पवित्र आत्मा से नहीं है क्योंकि वह यीशु के सिवाय किसी और की महिमा नहीं करेगा। मैं स्वयं के विषय में बहुत सचेत हूं और निरंतर अपने आपसे यह पूछता हूं, "क्या मैं यीशु को महिमा दे रहा हूं या क्या मैं लोगों को बताना चाह रहा हूं कि डेरेक प्रिन्स एक महत्वपूर्ण व्यक्ति है? क्या डेरेक प्रिन्स एक महत्वपूर्ण व्यक्ति है? डेरेक प्रिन्स सिर्फ एक पापी है जो परमेश्वर के अनुग्रह से बचाया गया है।

In my next teaching letter we will explore more about the nature of God’s Word. I will help you discover its remarkable power and the effects it can have on your life.

पसंद
शेयर करना