चरित्र की परीक्षा

Teaching Legacy Letter
*First Published: 2021
*Last Updated: मार्च 2026
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रज- यह एक प्रसिद्ध वाक्य नहीं है - और न ही इतनी आसानी से इसे समझा जा सकता है।
जो भी हो, हम इसके बगैर लड़ाई में नहीं जीत सकते। मैं विश्वास करता हूं कि हम एक ऐसे समय में जी रहें है जहां 'धीरज धरने' को समझना बहुत ही महत्वपूर्ण बात है।
A Needed Trait
बाईबिल की किंग जेम्स वर्शन का अनुवाद करीब तीन सौ वर्ष पहले हुआ था और कुछ वाक्यों का अर्थ बदल गया है। साधारणतः किंग्स जेम्स वर्शन ‘सब्र’ को उपयोग में लाता है तो हम उसे ‘धीरज’ कहते है। और जहां हम सब्र कहतें है वहां किंग जेम्स वर्शन ‘सहनशीलता’ कहता है।
सब्र या सहनशीलता किसी चिड़चिड़े व्यक्ति के साथ जोड़ा जाता है ताकि कठिन परिस्थितियों से वे अपने गुस्से पर काबू रख सकें साथ ही नियंत्रित रह सकें। यह एक बहुमूल्य मसीही गुण है। मैं यह समझता हूं कि मुझे इसे और अधिक प्रयोग में लाना है। परन्तु जब किंग्स जेम्स अनुवाद इसे ‘सब्र’ कहता है तो आधुनिक परिभाषा है- धीरज या दीर्घ प्रयत्न। इसकी क्रिया है “ध् गीरज धरना” जो किंग जेम्स अनुवाद में अधिकतर जगह प्रयोग किया गया है।
भविष्यवाणी को बताया जो उसके पुनः आगमन से पहले घटेगी। बहुत सी बातों की प्रकटीकरण आज हम देखते हैं। इस अध्याय से मेरा उद्देश्य यह नहीं कि मैं भविष्यवाणी की व्याख्या करूं, परन्तु यीशु के उस विशेषता पर ध्यान केन्द्रित करूं जिससे हम उन दिनों में सफलता पूर्वक गुजर के जा सकते हैं।
A Clear Warning
“और अधर्म के बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठण्डा हो जाएगा।
परन्तु जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा” (मत्ती २४:१२-१३)।
यहां हम देखते हैं एक सीधा संबंध अधर्म और प्रेम के अभाव के बीच।
अक्सर हम समझते है कि प्रेम एक स्वतंत्र व स्वाभाविक और कुछ ऐसा है जिसमें वाकई व्यवस्था या अनुशासन न हो। यह सच नहीं है। प्रेम और अनुशासन एक साथ चलते हैं।
"जब अनुशासन और व्यवस्था का उल्लंघन होता है तब प्रेम ठण्डा हो जाता है। प्रेम शब्द जो आयत १२ में है वह 'अगापे' है जो मसीहियोंके प्रेम को दर्शाता है। परन्तु यीशु यहां मसीहियों के प्रेम के ठण्डे होने के बारे में बात कर रहें हैं।"
इस कठिन और खोखले परिस्थिति में अधर्म जहां बढ़ रहा है और प्रेम ठण्डा हो रहा है-वहां यीशु कहते हैं: "जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा उसी का उद्धार होगा। हमें अन्त तक धीरज धरना है। यथार्थ ग्रीक भाषा में कहा गया है, "वह जो अन्त तक धीरज धरता है, वही उद्धार पायेगा।"
A Somber Picture
मरकुस की जैतून पहाड़ में दिये गये भविष्यवाणी को देखें तो आप पाएंगे कि चेतावनी यहां दोबारा दिया गया हैः
"और भाई को भाई और पिता को पुत्र घात के लिये सौंपेगे और लड़केवाले माता-पिता के विरोध में उठकर उन्हें मरवा डालेंगे। और मेरे नाम के कारण सब लोग तुम से बैर करेगेंः पर जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा,उसी का उद्धार होगा" (मरकुस १३:१२-१३) ।
यह अनियंत्रित कपट और पारिवारिक संबंध के अविश्वसनीयता का उदासीन चित्र है और मसीहियों का जिनसे बैर रखा जायेगा । और फिर इनके लिये वही उपदेश हैः धीरज। हमें इस घटना में कभी कभी परमेश्वर हमसे धीरज धरने को कहता हैं और यह हर वक्त करना पडेगा।
मैं एक स्वीडिश मिशनरी से मिला जो फ्रांस में कई वर्षों से सेवकाई कर रहा था। उसने मुझे बताया कि वह फ्रांस के दक्षिण में मारसिलस नामक जगह के पास के कारागृह में भ्रमण के लिए गया जहां फ्रांस के ह्युगीनोट्स (उस समय के मत विरोध करने वाले) को उनके विश्वास के लिये डाला गया था। उन में से कई उस कालकोठरी में गये और कभी लौटकर नहीं आये। वह एक कैदी के बारे में बता रहा था जिसने उस कालकोठरी के पत्थर खोदकर एक शब्द लिख छोडा, वह शब्द थाः प्रतिरोध । फ्रेंच में जिसका अर्थ है 'न मानना'। यह एक संदेश था एक विश्वासी का दूसरे विश्वासियों के लिए। 'पकड़े रहना', 'हार न मानना', 'धीरज धरना'। मैं विश्वास करता हूं कि आज परमेश्वर हमसे यह शब्द कह रहा है।
परमेश्वर से प्रार्थना करता हूं कि उसके वचन के द्वारा वह आपकी आत्मा को लोहे की तरह सख्त कर दें और आपको एक धार्मिक रीड की हड्डी दें अगर इस वक्त आपके पास यह नहीं है।
क्लेश के फल
हम किस प्रकार धीरज को उत्पन्न करें। यहा कुछ आसान सिद्धांत दिये गये है।
हम किस प्रकार धीरज को उत्पन्न करें। यहा कुछ आसान सिद्धांत दिये गये है। “सो जब हम विश्वास से धर्मी ठहरे तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परेमश्वर के साथ मेल रखे। जिसके द्वारा विश्वास के कारण उस अनुग्रह तक जिसमें हम बने हैं, हमारी पहुंच भी हुई और परमेश्वर की महिमा की आशा पर घमण्ड करे” (रोमियों ५:१-२)।
हम भविष्य में होने वाली बातों को देखते हुए आनन्दित होते हैं। परन्तु पौलुस कहते हैं कि न सिर्फ भविष्य को सोचकर आनन्दित होना है किन्तु आज की बातों को भी सोचकर आनन्दित रहो।
केवल यही नहीं, वरन हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यही जानकर कि क्लेश से धीरज और धीरज से खरा निकलना और खरे निकलने से आशा उत्पन्न होती है (आयत ३-४)।
आयत तीन में जो शब्द 'घमण्ड' कहा गया है, ग्रीक में जिसका अर्थ है आनन्दित या हर्ष होना या गर्व करना। और हम क्लेशों में क्यों आनन्दित रहें। क्योंकि वह सब देखना जो क्लेश के समय घटित होता है।
बाईबल के अनुवाद से यह वाक्य इस प्रकार लिया हैः "क्लेश धीरज को उत्पन्न करती है; और धीरज, खरे चरित्र; और खरा चरित्र आशा को।
" धीरज हममें 'खरे' चरित्र को उत्पन्न करती है। यही धीरज का केन्द्र चरित्र जो परीक्षा के लिये तैयार खड़ा हो। आयत ५ को जरा देखेंः "और आशा से लज्जा नहीं होती, क्योंकि पवित्र आत्मा जो हमें दिया गया है उसके द्वारा परमेश्वर का प्रेम हमारे मन में डाला गया है।" यहां हम देखते हैं कि प्रेम चरित्र की एक प्रकृति है। जिसका मूल अर्थ होगा कि हम अपने चरित्र को बनाने की कोशिश में लगे है-एक योद्धा का चरित्र जो निरंतर अन्त तक बना रहता है। हम क्लेश में आनन्दित (हर्ष या घमण्ड) रहते हैं। क्योंकि क्लेश ही से ध् गीरज उत्पन्न होता है और धीरज से खरा निकलना। मैं उन लोगों को जानता हूं जो मेरे साथ चलते हैं, और कठिन परिस्थितियों को एक दूसरे से बांट चुके है, गलतफहमियां भी हमारे बीच आई। परन्तु आज मेरे लिये उनका चरित्र खरा है; मैं जानता हूं कि मैं उन पर भरोसा कर सकता हूं। अधर्म और बुरे समयों से ही मैं जान सकता हूं कि किस पर मैं भरोसा कर सकता हूं।
What About Me?
सबसे पहले मैं यह निश्चित करना चाहता हूं कि मैं भी भरोसे के लायक हूं। मैं उन रोज के दबावों से वाकिफ हूं जो हमें प्रलोभित करते हैं कि हम स्वयं की सेवा करें और वो भी जब कोई और उसका मूल्य चुकाये। परन्तु मैं अपने आपको लज्जित पाऊंगा अगर यह दबाव मुझे अविश्वसनीय बनाती है उनके लिये जिनके सामने मैं समर्पित हूं और जो मसीह की देह में है।
आयें देखें कुलुस्सियों की पहली अध्याय कोः
“इसलिये जिस दिन से यह सुना है हम भी तुम्हारे लिये यह प्रार्थना करने और विनती करने से नहीं चूकते कि तुम सारे आत्मिक ज्ञान और समझ सहित परमेश्वर की इच्छा की पहचान में परिपूर्ण हो जाओ। ताकि तुम्हारा चाल-चलन प्रभु के योग्य हो और वह सब प्रकार से प्रसन्न हो और तुम में हर प्रकार के भले कामों का फल लगे और परमेश्वर की पहचान में बढ़ते जाओ। और उसकी महिमा की शक्ति के अनुसार सब प्रकार की सामर्थ से बलवन्त होते जाओ यहां तक कि आनन्द के साथ हर प्रकार से धीरज और सहनशीलता दिखा सको" (कुलुस्सियों १:६-११) ।
क्या यह अद्भूत नहीं है कि परेमश्वर हमें उसके सारे आत्मिक ज्ञान और उसके इच्छा की पहचान से परिपूर्ण करते हैं। जहां पौलुस कहता है, “तुम्हारे चाल-चलन प्रभु के योग्य हो” यह ध्यान में रखें कि जब हम उसकी इच्छा के ज्ञान से परिपूर्ण होते हैं तो वह हमारे जीवन में प्रभावित करती है। वह हमारे कष्टों से जूझने में मदद करती है।
यह एक बात है कि लम्बे समय तक सहन करना और वही दूसरी तरफ कि उस सहन के वक्त भी आनन्दित रहना। इसके लिए धीरज और शक्ति की आवश्यकता होती है। सब्र और धीरज उस शक्ति के चिन्ह हैं, याद रखिये वे कमजोरी के चिन्ह नहीं हैं।
It’s a Marathon
Let’s now look at Hebrews 12:1:
“इस कारण जबकि गवाहों का ऐसा बड़ा बादल हमको घेरे हुए है तो आओ, हर एक रोकने वाली वस्तु और उलझानेवाले पाप को दूर करे वह दौड जिस में हमें दौड़ना है, धीरज से दौडें” (इब्रानियों १२:१)।
Here the writer of Hebrews envisions life as a race that has to be run. At the finish line there is a great throng of spectators waiting to see who will win. This throng of spectators is all the saints who have already finished their course and are waiting there ready to cheer for us from the balconies of heaven.
Where he says, “lay aside every weight,” we must think in terms of this race. The runner empties his pockets and wears the lightest, most flexible clothing he can. He doesn’t carry a single, unnecessary ounce of weight. We need to remember that some activities are not sins—but they are weights that can burden us down and hold us back. They exhaust our strength or lure us into spending too much time and attention on them.
ध्यान रखें, वह कोई छोटी दौड़ नहीं है, यह एक लम्बी दौडहै एक सावधानी पूर्वक दौड़। बहुत लोग इस दौड को एक कम दूरीकी दौड़ समझते हैं। थोडे ही समय में वे दौड़ के पथ के किनारे थकेहुए है। परन्तु :
"न तो दौड में वेग और न ही युद्ध में शूरवीर" है (सभोपदेशक ६:११) ।
It isn’t speed or strength that counts—but endurance.
Building Character Together
One of the great tests to really check our character is the test of close, committed fellowship—such as the small group where you meet every week with the same people and share your life with them. After a little while, it becomes uncomfortably clear to you that there are some areas of your life that have never really been dealt with. You realize that when you weren’t too close to people or too intimate, you could cover up these areas. But when you are involved week by week in regular, intimate, close fellowship, you either have to back out or correct your life.
My friend Bob Mumford once said, “Suppose there are ten areas in our character that need to be changed. You can probably deal with six yourself. But the remaining four are going to need other people to put their finger on.” I think that is a pretty good average.
If I do not open myself up to others, I can deceive myself about areas of my character. But committed fellowship doesn’t afford me the same opportunities to deceive myself. Somebody once said fellowship is “roof off, walls down.” We don’t mind getting the roof off, because God sees through the roof anyhow. But what about getting the walls down and letting people see?
There is no greater test of our Christian character than close fellowship.
In my next letter we will explore this theme further. For now, let’s meditate on the Scriptures we have covered and ask the Lord to help us build a character of endurance. As we close this letter, why don’t we take a minute together to bring that request to Jesus?
*Prayer Response
Lord, I want to develop character in my life. Since that can be a long process, I realize it will take endurance to accomplish it. Please help me, Lord. Pour Your grace and strength into me to complete this process. Amen.
कोड: TL-L137-100-HIN