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            पुराने मनुष्यत्व का इन्कार

            पुराने मनुष्यत्व का इन्कार

            Derek Prince

            Teaching Legacy Letter

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            *First Published: 2020

            *Last Updated: मार्च 2026

            10 min read

            This teaching is not currently available in हिन्दी.

            जीवन में, हम शायद ही कभी जानते हैं कि हमारे लिए परीक्षा का मौसम कब समाप्त हुआ है। क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वह सबसे कठिन परीक्षा क्या हो सकती है? आप उस उत्तर से हैरान हो सकते हैं जो डेरेक इस पत्र की शुरुआत में ही देते हैं। यह न केवल अप्रत्याशित है (जैसा कि डेरेक स्वयं स्वीकार करते हैं)—बल्कि यह जीवन का एक शक्तिशाली सिद्धांत भी है, जो आज हमारे लिए ज्ञान, चुनौती और अनुप्रयोग से भरपूर है।

            हिजकिय्याह से हमे दो बातें सीखने को मिलती हैं। पहला, अगर परमेश्वर आपको कोई खास चमत्कार प्रदान करता है तो इसका अर्थ आप कोई खास व्यक्ति नहीं हैं परन्तु आपके साथ एक खास परमेश्वर है। दूसरा, अगर परमेश्वर अपनी उपस्थिति और अपने कार्य आपके जीवन में सही रुप से नहीं कर रहा है, तो इसका अर्थ हो सकता है कि वह आपकी परीक्षा ले रहा है ताकि वह देख सके कि जब वह आपको स्वयं में छोड़ दे तो आपका व्यवहार क्या होगा?

            An Unexpected Test

            गर में एक जन समूह से पूछें कि वह कौन सा सबसे कठिन परीक्षा है जिसका मसीही जन सामना कर रहें है? निश्चित रुप से मुझे कई अलग जवाब मिलेंगे। मेरे स्वयं का उतर शायद आपको चकित कर दें, परन्तु यह मेरे पचास साल से अधिक की मसीही सेवकाई पर आधरित है। मैं विश्वास करता हूँ कि सबसे कठिन परीक्षा का हम सब सामना करते है। और हम में से बहुत कम उस में उत्तीर्ण होते है वह हैं सफलता ।

            Solomon warns us:

            सुलैमान हमे चेतावनी देते है “किसी काम के आरम्भ से उसका अन्त उतम है; और धीरजवन्त पुरुष अहंकारी से उतम हैं” (सभोपदेशक ७ः८)।

            दूसरे शब्दों में कह सकते है कि : आपके शुरु करने के तरीके से आप विजय नहीं होते, परन्तु जिस प्रकार आप अन्त करते है।

            एक अनुभवी चीनी पादरी जिसने अपने विश्वास के खातिर बीस साल बंदीगृह में बिताए और हाल ही में उनका देहांत हुआ, उनका एक व्यक्गित टिप्पणी थी : “मैंने बहुत से लोगों को एक सही शुरुआत करते देखा है परन्तु कम लोगों को एक सही अन्त करते

            देखा।” मैं भी यह दोहराना चाहूँगा। उदाहरण के रुप में उन लोगों के बारे में देखेंगे जिन्होंने सफलता प्राप्त की, हम कुछ इस्राएल के राजाओं के बारे में देखेंगे।

            Saul’s Pride

            पहला राजा था शाऊल जो ताकतवर और हर जवानों में श्रेष्ठ था, और अपने शुरुआती दिनों में बहुत से युद्धों में विजय प्राप्त किये। परन्तु जब उसे परमेश्वर ने अमालेकियों से युद्ध करने भेजा तो उसने लोगों के भय को अपने अन्दर आने दिया और अपने आपको परमेश्वर के पूर्ण आज्ञाकारिता से अलग किया। जिसका परिणाम स्वरुप शमुएल भविष्यवक्ता उसके पास परमेश्वर का संदेश लेकर आया कि परमेश्वर ने उसे राजा के पद से हटा दिया है।

            शाऊल की मूल समस्या को शमूएल के संदेश में दर्शाया गया है कि :

            “शमूएल ने कहा, जब तू अपनी दृष्टि में छोटा था, तब क्या तू इस्राएली गेनो का प्रधान न हो गया? और क्या यहोवा ने इस्राएल पर राज्य करने को तेरा अभिषेक नहीं किया। ” (१ शमूएल १५:१७)।

            परमेश्वर शाऊल को तब तक आशीषित कर सकता था जब तक वह अपने आपको नम्र रखता। परन्तु जब वह घमंडी हुआ तब परमेश्वर ने उसे अलग कर दिया।

            यह हम सब पर भी लागू होता है। जब हम स्वयं की नज़रों में छोटे होंगे तो हम जगह देते हैं परमेश्वर की महानता को। परन्तु अगर हम अपनी नज़रों में महान बनते है तो हम परमेश्वर की महानता को हमारे ज़रिये कार्य करने से रोक देते है।शाऊल का घमंड उसे एक दुखद अन्त की ओर ले गया। उसके जीवन के आखिरी रात उसने एक जादूगरनी की सलाह ली, और अगले दिन युद्धभूमि में उसने आत्महत्या की।

            David’s Forgetfulness

            अगला राजा था दाऊद जो परमेश्वर के हृदय को जानने वाला था। कई वर्षों तक वह एक भगोड़े का जीवन जिया और शाऊल द्वारा सताया गया। फिर भी वह इस सब पर विजयी हुआ और आखिरकार उसके पास एक अच्छी गवाही थी :

            “यहोवा ने मुझे से मेरे धर्म के अनुसार व्यवहार किया, और मेरे हाथों की शुद्धता के अनुसार उस ने मुझे बदला दिया। क्योंकि मैं यहोवा के मार्गों पर चलता और दुष्टता के कारण अपने परमेश्वर से दूर न हुआ” (भजन संहिता १८ः२०-२१)।

            परन्तु बाद में दाऊद बदल गया और उसकी भाषा थी :

            “हे परमेश्वर, अपनी करुणा के अनुसार मुझ पर अनुग्रह कर; अपनी बड़ी दया के अनुसार मेरे अपराधों को मिटा दे। मुझे भली भांति धोकर मेरा अधर्म दूर कर, और मेरा पाप छुड़ाकर मुझे शुद्ध कर” (भजन संहिता ५१:१-२)।

            क्या हुआ था? ऐसा बदलाव क्यों? दाऊद को पूर्ण सफलता का अनुभव हुआ। पूरे इस्राएल पर राजा स्थापित होकर और अपने सारे दुश्मनों पर विजय प्राप्त कर दाऊद सफलता के प्रतिफलों का आनन्द ले रहा था। वह फिर कभी युद्ध पर नहीं गया। वह हर वक्त यरुशलेम मे रहकर उसे लुभाने वाली बातों में लगा रहा।

            और वह बतशेबा को दूषित करने से भी नहीं हिचकिचाया, जो उसका पड़ोंसी उरियाह की पत्नी थी। और अपने पाप को छिपाने के लिए उरियाह को मरवाने से भी नहीं हिचकिचाया। दाऊद की सफलता के समय में वह भूल गया उन सिद्धांतो को जो वह राजा बनने से पहले जिया करता था।

            परमेश्वर का धन्यवाद हो कि दाऊद ने आखिरकार पश्चाताप किया और परमेश्वर ने उसे उसके पाप से क्षमा दी। फिर भी, दाऊद का पाप एक गहरे छाये की तरह उसके वंशजो पर पीढ़ी दर पीढ़ी रहा। परमेश्वर ने उसे चेतावनी दी : “इसलिए अब तलवार तेरे घर से कभी दूर न होगी” (२ शमुएल १२:१०)। यह जरुरी है कि हम जान ले, कि परमेश्वर के क्षमा कियें जाने से कोई जरुरी नहीं कि हमारे पाप के पूरें परीणामों का अन्त हो।

            Solomon’s Idolatry

            दाऊद का पुत्र सुलैमान जो उसके बाद राजा बना, वह परमेश्वर का चहेता और चुना हुआ था। क्योंकि उसने नम्र होकर परमेश्वर से परिज्ञान माँगा, और परमेश्वर ने उसके साथ धन व सम्मान भी दिया। वह पूरे इस्राएल के राजाओं में से सबसे ज्ञानी, अमीर व प्रतिष्ठित हुआ।

            फिर भी इन सब सफलताओं के बाद भी सुलैमान सफलता के परीक्षा में खरा नहीं उतरा।

            “सो जब सुलैमान बूढ़ा हुआ तो उसकी स्त्रियों ने उसका मन परायें देवताओं की ओर बहका दिया... सुलैमान तो सीदोनियों की अशतोरेत नाम देवी, और अम्मोनियों के मिल्कोम नाम घृणित देवता के पीछे चला। और सुलैमान ने वह किया जो यहोवा की दृष्टि में बुरा हैं” (१ राजा ११:४-६)।

            एक शानदार शुरुआत के बावजूद सुलैमान एक मूर्तिपूजक बनकर मरा।

            Two Other Kings

            सुलैमान के बाद राज्य विभाजित हुआ। इस्राएल के सारे राजा परमेश्वर से दूर हुऐ जैसे उत्तरी राज्य मूर्तिपूजक और परमेश्वर ने उनको त्याग दिया। बहुत से दक्षिण राज्य, जैसे यहूदा, परमेश्वर के मार्ग से भटक गये और मूर्तिपूजक बन गये। फिर भी यहूदा में उस वक्त कुछ धर्मी राजा हुए। परन्तु कोई भी सफलता की परीक्षा में खरे नहीं उतरें।

            उदाहरण लेते हैं हिजकिय्याह का, जिसने शुद्धिकरण की शुरुआत की और यहोवा की सच्ची आराधना का पुर्नस्थापन किया। अश्शूर का राजा सन्हेरीब ने जो, यरुशलेम पर चढ़ाई की परन्तु परमेश्वर ने उसमे मध्यस्थता की और हिजकिय्याह व उसके लोगों को एक अद्भुत छुटकारा दिया।

            बाद में; जब हिजकिय्याह रोगी हुआ और वह मरने को था तब परमेश्वर ने चंगाई ही नहीं दी परन्तु सूरज को विपरीत दिशा में घुमाकर उसे एक चमत्कारी चिन्ह

            दिखाया। उसने हिजकिय्याह के जीवन में पंद्रह वर्ष और दे दिये। सूरज की चमत्कारी चिन्ह ने हिजकिय्याह के वैभव को और देशों में भी पहुँचा दिया। परिणामस्वरुप बाबेल के हाकिम उसके पास आये। उनके बातों से वह फूल गया और उसने उनको अपने राज्य के सारे बहुमूल्य चीजों को दिखाया। परन्तु उसने परमेश्वर की महिमा नहीं की।

            पवित्रशास्त्र दो प्रकाशित करने वाली टिप्पणियाँ देता है। हिजकिय्याह के व्यवहार काः

            “परन्तु हिजकिय्याह ने उस उपकार का बदला न दिया, क्योंकि उसका मन फूल उठा था (घमंड से भर गया था।)... तौभी जब बाबेल के हाकिमों ने उसके पास उसके देश में चमत्कार के विषय पूछने को दूत भेजे, तब परमेश्वर ने उसको इसलिए छोड़ दिया, कि उसको परख कर उसके मन का सारा भेद जान ले (२ इतिहास ३२:२५,३१)।”

            बाद में यहूदा के इतिहास में एक और धर्मी राजा हुआ - जो था योशिय्याह। हिजकिय्याह के समान योशिय्याह ने भी शुद्धिकरण की शुरुआत की और परमेश्वर की सच्ची आराधना का पुर्नस्थापन किया। उसने भी उत्तरी राज्य, बेतेल, के मूर्तिपूजकों के वेदी को नष्ट किया।

            परन्तु योशिय्याह की सफलता ने उसे आत्मविश्वास से भर दिया और वह जल्दबाजी करने वाला बन गया। बिना परमेश्वर के सलाह के और एक गंभीर चेतावनी के रुप में, उसने फिरौन को, जो मिस्र का राजा था, विरोध किया और युद्ध में मारा गया (देखें २राजा २३:२६)। उसके साथ ही यहूदा की आखिरी उम्मीद भी समाप्त हो गई।

            नये नियम के सफल पुरुष

            नये नियम के विषय में क्या? क्या यह अलग मानदंडों का प्रबंध करती हैं? आओ देखे आगे की व्यक्तित्वों कोः स्वयं यीशु और उसके तीन प्रमुख चेले, पतरस, यूहन्ना और पौलुस । उनका अन्त क्या था?

            यीशु जो सबसे अनोखा है - संपूर्ण, परमेश्वर का पुत्र जिसमे पाप न था। जिसने कभी पराजय का सामना नहीं किया। फिर भी उसके जीवन का अन्त वस्त्रहीन होकर क्रूस पर लटके हुए समाप्त हुआ और पापियों के मजाक का पात्र बना। वह था आखिरी संसार जिसे यीशु ने देखा। उसके बाद के पुनरुथान और महिमा सिर्फ उन लोगों को प्रकट हुआ जिनके बारे में कहा गया “उन गवाहों को जिन्हे परमेश्वर ने पहिले से चुन लिया था” (प्रेरितों १०:४१) । परन्तु इस संसार के नज़रिये से यीशु जहाँ तक एक अच्छा शिक्षक था, और एक अच्छा मनुष्य था, वहीं यह भी कहती है कि वह सफल नहीं था और परमेश्वर ने कभी भी उसके साथ सही नहीं किया।

            पतरस का क्या, जो बारह प्रेरितों का अगुआ था? विश्वसनीय पंरपराओं से पता चलता हैं कि पतरस नेभी क्रूस पर अपनी जान दी - परन्तु उसके स्वयं के इच्छानुसार उसे उलटा टाँगा गया क्योंकि वह स्वयं को अपने स्वामी के समान मरने के लायक नहीं समझता था।

            यूहन्ना की मृत्यु के बारे में हमें कोई विश्वसनीय ज्ञान नहीं मिलता। परन्तु हमें पता हैं कि उसके वृद्धावस्था में उसे पतमुस नामक में एकांत व पत्थरीले टापू में डाल दिया गया, जहाँ उसने 58 वह सब आत्मा में देखा जो प्रकाशितवाक्य में लिखा गया हैं।

            पौलुस के बारे में क्या? हमारे पास उसके स्वयं की लेखनी हैं जिससे पता चलता हैं कि उसने और अन्य प्रेरितों ने किस प्रकार का जीवन जीया :

            “हम इस घड़ी तक भूखे - प्यासे और नंगे है, और घूसे खाते है और मारे मारे फिरते हैं; और अपने ही हाथों के काम करके परिश्रम करते हैं। लोग बुरा कहते हैं; हम आशीष देते हैं; वे सताते हैं, हम सहते है। वे बदनाम करते है, हम बिनती करते हैं; हम आज तक जगत के कूड़े और सब वस्तुओं की खुरचन की नाई ठहरे है” (१ कुरन्थियों ४:११-१३) ।

            आखिरकार, एक अदभुत और श्रेष्ठ सेवकाई के बाद, जो था अन्यजातियों के बीच सुसमाचार को प्रचार करना, पौलुस भी जंजीरों में रोमी कालकोठरी में रखा गया, जहाँ उसके सहकर्ता ने भी उसे त्याग दिये। वहाँ से उसे सार्वजनिक रुप से सिर धड़ से अलग करने को ले जाया गया।

            What Does This Teach Us?

            क्या यीशु, पतरस, युहन्ना और पौलुस के जैसे हर मसीही के लिए भी यह सब लागू होता है? क्या हर मसीही को भी धर्म के लिए प्राण त्यागनेवाला बनना आवश्यक है? क्या कोई भी समर्पित मसीही कभी धनी नहीं हो सकता? नहीं! परन्तु वे प्रेरणा देते हैं एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात पर : वह हैं, हमें संसार द्वारा उसकी लुभावनी सफलता के सिद्धांतों को स्वीकार नहीं करनी चाहिए। हमें कभी संसार की स्वीकृति को नहीं देखनी चाहिए। लोकप्रिय होने की इच्छा हमेशा खतरनाक होती हैं।

            यीशु इसके विरुद्ध कुछ गंभीर चेतावनियों को देते हुए फरीसियों से कहते हैं, “क्योंकि जो वस्तु मनुष्यों की दृष्टि में महान है, वह परमेश्वर के निकट घृणित है” (लूका १६:१५)। उसके चेलों से उसने कहा, “हाय, तुम पर; जब सब मनुष्य तुम्हे भला कहें, क्योंकि उनके बाप-दादे झूठे भविष्यवक्ताओं के साथयीशु इसके विरुद्ध कुछ गंभीर चेतावनियों को देते हुए फरीसियों से कहते हैं,

            “क्योंकि जो वस्तु मनुष्यों की दृष्टि में महान है, वह परमेश्वर के निकट घृणित है” (लूका १६:१५)।

            उसके चेलों से उसने कहा,

            “हाय, तुम पर; जब सब मनुष्य तुम्हे भला कहें, क्योंकि उनके बाप-दादे झूठे भविष्यवक्ताओं के साथ

            सच्ची सफलता की कुंजी

            मैं अपने आप में उन पाँच राजाओं का, जो पुराने नियम में थे, और यीशु व उसके चेलों के बीच भेद जानने की कोशिश कर रहा था। मैनें पूछा सच्ची सफलता के व्यक्तित्व के निर्माण की कुंजी क्या है?

            तब परमेश्वर मुझे दो वचनों की ओर ले गया।

            पहला, पौलुस के वाक्य १ कुरन्थियों ७:२५ में : परन्तु विश्वासयोग्य होने के लिये जैसी दया प्रभु ने मुझ पर की हैं, उसी के अनुसार सम्मति देता हूँ

            मैंने यह पाया कि विश्वसनीय होने के लिए मुझे पूर्ण रुप से परमेश्वर की दया पर निर्भर होना होगा। मैं किसी और चीजों पर निर्भर नहीं हो सकताः न मेरी शैक्षिक योग्यता, न मेरे आत्मिक वरदान, न मेरी पूर्व सफलता, और न ही मेरे कई वर्षों की मसीही सेवकाई। एक ही चीज़ मुझे विश्वसनीय बनाती हैः ‘प्रभु की दया’।

            मुझे निरंतर और पूरे होश के साथ प्रभु की दया को अपने जीवन का प्रथम उद्देश्य बनाना है। मैं उन बातों से जो मुझे इस निर्भरता की अनुभूति से कमजोर बनाती हैं, सतर्क रहूँगा । विशेष रुप से मुझे हर प्रकार के घमंड़ से सावधान रहना हैं। घमंड़ जिसका सार हैं - आत्मनिर्भरता ।

            दूसरा, यीशु के वाक्य, यूहन्ना ४:३४ में,

            “मेरा भोजन यह है कि मैं अपने भेजनेवाले की इच्छा के अनुसार चलूं और उसका काम पूरा करूँ।

            ” यीशु का भोजन - जो उसके जीवन का श्रोत और बल यह था कि बिना ड़गमगाये एक मन से अपने जीवन के अन्त तक परमेश्वर की इच्छा को करना। यही वह सच्ची सफलता है जिसे मैं और आप अपना लक्ष्य बनायें ।

            *Prayer Response

            हे पिता, मैं जीवन में सफल होना चाहता हूँ — ऐसे तरीके से जो आपको प्रसन्न करे और मेरे लिए आपकी योजना को पूरा करे। अपनी महान दया से, कृपया मेरी सहायता करें कि मैं अभिमान से बच सकूँ और आपकी इच्छा को अपने जीवन के अंत तक अपना मुख्य उद्देश्य बनाए रखूँ। धन्यवाद प्रभु। आमीन।

            मैंने प्रार्थना की है
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            See how पुराने मनुष्यत्व का इन्कार has impacted lives across the globe.

            "I've applied the Biblical principles on family relationships from this teaching, and it has completely restored harmony in our home. My teenagers and I now have meaningful conversations about faith, and my marriage has been strengthened in ways I never thought possible."
            Elena R., Brazil
            "The teachings on spiritual warfare completely transformed my approach to daily challenges. I used to feel overwhelmed by life's obstacles, but now I understand how to stand firm in faith. This teaching gave me practical tools I use every single day."
            Sarah K., California
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