आत्मिक वरदानों को उठा लो

Teaching Legacy Letter
*First Published: 2019
*Last Updated: मार्च 2026
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ध्याय १० में हमने एक कहानी को देखा जो अब्राहाम के सेवक और एक कुंवारी स्त्री रिबेका के ऐतिहासिक क्रम को, और जो दर्शाती है पवित्र आत्मा और कलीसिया के बीच के संबंध को। और आगे अगर हम देखेंगे तो पायेंगे कि यह सदृश पवित्र आत्मा की एक अनोखी इच्छा को प्रकट करती है।
Earlier in this series, I pointed out that the servant of Abraham who found Isaac’s bride was a type of the Holy Spirit. In that story, when Abraham sent his servant from Canaan to Paddan Aram to seek a bride for Isaac, the servant took ten camels loaded with gifts, including precious jewelry.
जब दास को इसहाक की दुल्हन के लिए एक जवान स्त्री मिली तो पहला काम उसने यह किया कि उसने उसे नथनी पहना दिया। उसे स्वीकार कर रिबेका ने अपने आपको इसहाक की दुल्हन के रूप में समर्पित कर दिया।
अगर वह उस तोहफे को लेने से इन्कार कर देती तो वह इसहाक को त्याग देती और अपमानित करती। वह कभी उसकी दुल्हन नहीं बन पाती। इससे मिलती हुई आज परमेश्वर ने अपने सेवक पवित्र आत्मा को कई उपहारों के साथ भेजा है ताकि वह अपने पुत्र, यीशु के लिए एक दुल्हन ला सके -जो है कलीसिया। उसमें सम्मिलित है नौ आकर्षित आत्मिक वरदान। इन वरदानों को स्वीकार करने से वह कलीसिया अपने आपको मसीह की दुल्हन बनने को स्वीकार करती है।
नौ आलौकिक वरदान
यह नौ वरदान १ कुरिन्थियों १२:८-१० में व्यक्त की गई हैं। इसके यथार्थ अर्थ को सामने लाने के लिये मैं इसका अनुवाद सरलता से करूंगाः
- १. बुद्धि की बातें
- २. ज्ञान की बातें
- ३. विश्वास
- ४. चंगाई के वरदान
- ५. सामर्थ के कार्य करने की शक्ति
- ६. भविष्यवाणी
- ७. आत्माओं की परख
- ८. अनेक प्रकार की भाषा
- ६. भाषाओं का अर्थ बताना
यह सब वरदान “प्रकटीकरण” है। पवित्र आत्मा स्वयं अदृश्य है, परन्तु इन वरदानों के द्वारा वह अपने आपको प्रकट करता है। वह हमारे ज्ञानेन्द्रियों को प्रभावित करता है ताकि हम उसे देख, सुन या महसूस कर सकें।
यह सब “सबके लाभ के लिए है”। इनके द्वारा मसीही एक दूसरे के साथ सेवकाई कर सकते है। वरदान कुछ व्यवहारिक उद्देश्यों की पूर्ति करता है। वे औजार है, खिलौने नहीं।
Available to All
युगों के अन्त तक वापस ले लिया गया और आज यह प्राप्त नहीं किया जा सकता। पौलुस परमेश्वर को कुरिन्थ के मसीहियों के लिये धन्यवाद कहते हैं। क्योंकि “यहां तक कि किसी वरदान में तुम्हें घटी नहीं और तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह के प्रगट होने की बाट जोहते रहते हो” (१ कुरिन्थियों १:७)। तो फिर सही रूप में मसीही जन को निरंतर इन आत्मिक वरदानों का प्रयोग करना चाहिये तब तक जब तक मसीह का आगमन नहीं हो जाता।
पहला दो वरदान जो पौलुस बताते हैं - बुद्धि की बातें और ज्ञान की बातें -जो प्राकृतिक रूप से संबधित किया गया है। ज्ञान की बात हमें एक परिस्थिति के सच्चाई को बताती है। परन्तु बुद्धि की बात हमें यह दिखाती है कि परमेश्वर हमें उस परिस्थिति से सामना करने की इच्छा किस प्रकार रखते हैं।
कुछ वरदान दोनों तरफ से बहुवचन हैं उदाहरणतः चंगाई के वरदान, सामर्थी काम करने के वरदान, आत्माओं की परख, अनेक प्रकार की भाषाएं आदि। यह सूचित करती है कि हर एक चंगाई, हर एक सामर्थ, हर एक समझ, हर एक भाषा एक वरदान है। अगर किसी व्यक्ति के द्वारा कोई वरदान निरंतर प्रकट होता है, तो हम कह सकते हैं कि उस व्यक्ति के पास वह वरदान है।
वरदान जो कमाया नहीं जा सकता
इस बात पर जोर देनी चाहिये कि हर वरदान परमेश्वर की कृपा के द्वारा ही प्राप्त होता है। वे विश्वास के द्वारा मिलता है। हम उन्हें कभी कमा नहीं सकते। हम कभी ‘इतने अच्छे’ नहीं हो सकते कि इनका प्रयोग कर सकें।
१६४१ में आधी रात के समय यीशु मसीह के साथ मेरी एकभंयकर और जीवन बदल देने वाली मुठभेड़ हुई जो ब्रिटिश सेना केबेरेक में घटी। कुछ ही हफ्तों बाद उसी बेरेक स्थल पर मैंने पहलीबार अज्ञात भाषा बोली। और अप्रत्याशित रूप से मैं उनका 'अर्थ'भी बोलने लगा, बहुत ही मनोहर, कविता के रूप में। यह मेरे जीवनऔर सेवकाई के लिये परमेश्वर की योजना थी और उसकी एक रूपरेखा थी जो धीरे-धीरे एक-एक क्रम से पूर्ण हुई।
१६५७ से १६६१ तक मैंने केन्या के अफ्रीकन शिक्षकों के लिए ‘टीचर ट्रेनिंग कॉलेज’ में प्रधानआचार्य के रूप में सेवा की। उन दिनों में हमारे कालेज में पवित्र आत्मा की एक सर्वश्रेष्ठ भेंट हुई। उस सभाओं में मैंने अपने विद्यार्थियों के साथ पूरे नौ वरदानों को प्रयोग में आते देखा और यह कई बार हुआ। मैंने यह भी देखा कि दो विद्यार्थी अलग अलग समय में -मुर्दों में से जी उठे। दोनों ने अपनी गवाही दी और अपना अनुभव बताया जब उनकी आत्मा उनके शरीर से अलग हो गई थी।
Workings of Miracles
बाद में अमेरीका में मुझे अप्रत्याशित रूप से लंगडों के लिये सेवकाई करने का ‘वरदान’ मिला। एक बार जब मैंने एक लंगड़े व्यक्ति को व्हील चेयर में बैठाया और उसकी छोटी सी एड़ी अपने हाथों में ली तो मेरे आंखों के सामने वह एड़ी बढ़ने लगी और वह व्यक्ति चंगा हो गया। कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि एक अच्छे बाईबल टीचर होने के बाद यह सेवकाई शोभा नहीं देती। मैंने निर्णय लिया कि मैं प्रभु से पुछंगा और मुझे यह जवाब मिलाः “मैंने तुझे एक वरदान दिया। दो बातों को तुम कर सकते हो। पहला, तुम उसका प्रयोग कर सकते हो, यही नहीं, इससे और अधिक प्राप्त भी कर सकते हो। या दूसरा, तुम इसे प्रयोग करने में असमर्थ हो जाओ और इसे वापस लौटा दो।” उसी समय मैंने निर्णय लिया कि मैं उसे प्रयोग करूंगा जो परमेश्वर ने मुझे दिया है, और हां मैं अधिक पाता रहा।
एक बार मैंने एक छोटे से पांव को दो इन्च बढ़ते देखा। इसी प्रकार के आलौकिक सामर्थ कई जगह देखने को मिली। एक जगह पर, किसी विशेष प्रार्थना के बगैर ही एक व्यक्ति ने तीन बिमारियों से छुटकारा पाया और उसने सिगरेट के नशे से भी अपने आपको छुड़ाया।
मुझे याद है एक महिला एक कागज के बैग के साथ आयीं। उसके एक जूते पर डेढ़ इन्च का हील लगा था। जब मैंने उसकी ऐड़ी अपने हाथ में लिया तो उसका छोटा पैर डेढ़ इन्च बढ़ गया। उसके बाद उसने अपने कागज के बैग से एक जूता निकाला जो साध् ारण हील वाला था और अब वह उसके पैरों में सही बैठ गया। तब मैंने समझा कि वचन के आधार पर मेरा वरदान का नाम था “सामर्थ के कार्य करने की शक्ति”।
आत्मिक वरदानों की सीमा
मैं आवेश में आ जाता हूं जब मेरे जीवन में आत्मिक वरदानोंके प्रकटीकरण को देखता हूं। साथ ही साथ हमें यह भी समझनाजरूरी है कि जो हम आत्मिक वरदानों से आग्रह करते हैं। उसमेंएक निश्चित सीमा होती है।
सबसे पहले, आत्मिक वरदान वर्तमान
जीवन तक ही सीमित होता है। भविष्यवाणी, भाषा और ज्ञान कीबातें जैसे वरदानों के विषय में पौलुस कहते हैं।
भविष्यवाणियाँ हों तो समाप्त हो जाएगी; भाषाएंहों तो जाती रहेंगी; ज्ञान हो, तो मिट जाएगा। क्योंकिहमारा ज्ञान अधूरा है, और जब सर्व सिद्ध आएगा, तो
अधूरा मिट जाएगा (१ कुरिन्थियों १३:८-१०) ।
हम अभी भी 'अधूरे' युग में जी रहें है। परन्तु जब हम समयसे पार होते हुए अनन्त जीवन में प्रवेश करेंगे और पुनरूत्थान केशरीर को धारण करेंगे, तो हमें इन अपूर्ण आशीषों की जरूरत नहींहोगी, जो भविष्यवाणी, भाषा या ज्ञान की बातों से आती है। यहीलागू होती है चंगाई या सामर्थ के वरदानों पर भी। हमारे पुनरूत्थानके शरीर को उनकी जरूरत नहीं होगी।
अगर लोग आत्मिक वरदानों में ज्यादा उलझे हुए हैं तो यहदर्शाती है कि उन्हें अन्तता से ज्यादा समय की फिक्र है। ऐसे लोगोंको पौलुस की चेतावनी पर ध्यान देना चाहिए; "यदि हम केवल इसी आत्मिक वरदानों को उठा लोजीवन में मसीह से आशा रखते हैं तो हम सब मनुष्यों से अधिकअभागे है” (१ कुरिन्थियों १५:१६) ।
A Matter of Character
सबसे महत्वपूर्ण बात आत्मिक वरदानों का प्रयोग करते वक्तव्यक्ति के व्यक्तित्व का पता नहीं चलता। मैं इस विषय में एक ठोसउदाहरण देना चाहूंगा। सोचें कि एक व्यक्ति जो आलसी, धोखेबाजऔर घमण्ड करने वाला, बिना कमाये एक करोड़ रूपये प्राप्त करताहै। उसका व्यक्तित्व कभी नहीं बदलेगा। वह फिर भी आलसी, ६गोखेबाज और घमण्डी ही रहेगा। और शायद वह और घमण्ड करेगाक्योंकि उसके जमा खाते में एक करोड़ रूपये है।
यही लागू होता है उस व्यक्ति के साथ जो नाटकीय रूप सेआत्मिक वरदान प्राप्त करता है जैसे भविष्यवाणी या चंगाई यासामर्थ। अगर वह पहले कमजोर और अस्थिर था तो वह बाद मेंभी कमजोर और अस्थिर ही रहेगा। परन्तु उसका नया वरदान उसेलोगों के बीच मशहूर बना देता है और उसे नये उत्तराधिकार प्राप्तहोते जाते हैं ताकि वह धार्मिक रूप से परमेश्वर को प्रसन्न करने केलिए अपने वरदान का प्रयोग करें।
सबसे बड़ी समस्या आज के केरिस्मेटिक नवीकरण की यहहै कि लोग सेवकाई करने वाले के वरदानों से उन्हें पहचानते हैं नकि उनके व्यक्तित्व से। काफी अनुभव यह दर्शाती है और यह संभवभी है कि मनुष्य उत्तम व नाटकीय वरदान का प्रयोग करने के बादभी एक अपूर्ण व्यक्तित्व का हो।
एक युवा प्रचारक के रूप में, मैं एक बुजुर्ग व्यक्ति को बहुतसम्मान करता था। और उसके सामर्थी सेवकाई के लिए मैं उसकीप्रशंसा भी करता था। परन्तु अंततः उसने अपनी पत्नी सेतलाक ले लिया, अपनी सेक्रेटरी से शादी की और एकपियक्कड़ होकर दम तोड़ दिया। और भी कई सफल औरनामी प्रचारक इस प्रकार के व्यक्तिगत घटनाओं में पड़ चुकेहैं।
Fruits—Not Gifts
जब ऐसी किसी घटना का पता चलता है, तो लोग इसप्रकार कहते हैं, "संभवतः अगर किसी व्यक्ति ने इनमें से एकवरदान का दुरूपयोग किया तो परमेश्वर उससे वह ले लेगा"।फिर भी जवाब होगा 'नहीं'। 'आत्मा के वरदान'इसलिए-विशेष वरदान है। यह कोई कर्ज नहीं है, जिसमें कोईशर्त जुड़ी है, या वापसी की अवधि लिखी है।
"क्योंकिपरमेश्वर अपने वरदानों से और बुलाहट से कभी पीछे नहीं
हटता" (रोमियो ११:२६)।
एक बार हम किसी एक वरदान कोप्राप्त कर लेते हैं तो हम इसे उपयोग करने या दुरूपयोग करनेके लिए मुक्त होते हैं यहां तक कि चाहे हम इसका इस्तेमालनहीं भी कर सकते हैं। अन्त में परमेश्वर हमसे हिसाब लेगाकि हमने इनका क्या किया या क्या नहीं किया।
हमें हमेशा यीशु की चेतावनी को ध्यान में रखना हैः
"सो उन के फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे" (मत्ती ७:२०)।
यीशु ने एक स्पष्ट चेतावनी इन आत्मिक वरदानों के विषय मेंदिये है कि यह कोई पासपोर्ट नहीं है जिससे कोई स्वर्ग में प्रवेशपायें ।
Another Warning
हमें हमेशा यीशु की चेतावनी को ध्यान में रखना हैः “सो उन के फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे” (मत्ती ७:२०)। यीशु ने एक स्पष्ट चेतावनी इन आत्मिक वरदानों के विषय में दिये है कि यह कोई पासपोर्ट नहीं है जिससे कोई स्वर्ग में प्रवेश पायें ।
"जो मुझ से, हे प्रभु, हे प्रभु कहता है, उन में सेहर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो
मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे; हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यवाणी नहीं की और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला और तेरे नाम से बहुत अचम्भे के काम नहीं किए? तब मैं उन से कह दूंगा कि मैंने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करने वालों, मेरे पास से चले जाओ” (मत्ती ७:२१-२३) ।
यह दर्शाती है कि किसी व्यक्ति के लिए यह मुमकिन है किवह आत्मिक वरदानों का प्रयोग करें और साथ ही साथ "कुकर्म भीकरनेवाला" हो। क्या है यह कुकर्म ? यह एक अनुमान है अंहकारीहोने का उन लोगों के लिए जो आत्मिक वरदान द्वारा आलौकिकसामर्थ करते हैं, परन्तु उन पर परेमश्वर की सदाचारी और नैतिकमूल्य अब लागू नहीं होते।
इसका प्रतिवादन कैसे करें?
स्पष्ट रूप से कई बार इस प्रकार की सेवकाई हमें एकव्यक्तिगत निर्णय लेने के लिए मुश्किल में डाल देती है। इसकाप्रतिवादन कैसे करें?
सबसे पहले, हमें पौलुस की चेतावनी अपने ध्यान में रखनीहोगी जो उसने तिमुथियुस को लिखाः
"किसी पर शीघ्र हाथ न रखनाऔर दूसरों के पापों में भागी न होनाः अपने आप को पवित्र बनाए
रख" (१ तीमुथियुस ५:२२)।
दूसरा, हमें यह चेतावनी भी ध्यान में रखनी है जो यीशु नेहमें अनैतिक सेवकाई के विषय में दी हैः "स्वर्ग उनके लियेहै जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा को पूरा करता है।" हमेंअपने आप से यह पूछना हैः "परमेश्वर का मेरे जीवन से क्याउद्देश्य है? परमेश्वर पिता मुझसे क्या चाहता है?"
मेरे विषय में, मैं महसूस करता हूं कि परमेश्वर ने एक स्पष्ट और सरल जवाब दिया हैः ‘“परमेश्वर की इच्छा यह है कि तुम पवित्र बनो” (१ थिस्सलुनीकियों ४ः३) और इसके साथ पवित्र आत्मा ने एक चेतावनी को जोड़ दियाः “उस पवित्रता के खोजी हो जिस के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा” (इब्रानियों १२:१४)।यह मेरा संकल्प है कि “पवित्रताई का अनुसरण करूं।" यह मेरा संकल्प है कि "पवित्रताई का अनुसरण करूं।"और अब देखें सिक्के के दूसरे पहलू को जो हैः पवित्र आत्मा काफल ।
How about you? Would you take a moment now to commit yourself to the Lord in the proper use of the gifts of the Holy Spirit?
*Prayer Response
Dear Lord, Thank You that You have made these wonderful gifts of the Holy Spirit available to me. I receive them now, and ask that You would help me to move in them properly and humbly. I commit myself to this path, and ask for Your guidance. In Jesus’ name, Amen.
कोड: TL-L129-100-HIN