कपट के लिए कोई स्थान नहीं

Teaching Legacy Letter
*First Published: 2019
*Last Updated: मार्च 2026
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In this Teaching Letter series, Who Is the Holy Spirit?, our goal has been to grasp the mystery of the Holy Spirit. Our study of God’s Word so far has allowed us to see the presence of the Holy Spirit in creation; His unique role in the Trinity; His eternal existence, omniscience, and omnipresence. Our most recent segment focused on His holiness—reminding us of this aspect of His character: He is the Holy Spirit.
जैसा कि मैंने बार-बार ज़ोर दिया है, पवित्र आत्मा के साथ हमारे संबंध का मापदंड शास्त्र हैं, जो हमें दिखाते हैं कि हम वास्तव में उसे कैसे जान सकते हैं।यीशु अपने शिष्यों से इस "जानने" की भावना के बारे में यूहन्ना 14:16-17 में कहते हैं:
“और मैं पिता से विनती करूंगा और वह तुम्हें एक और सहायक देगा कि वह सर्वदा तुम्हारे साथ रहे। अर्थात सत्य का आत्मा जिसे संसार ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह न उसे देखता है और न उसे जानता हैः तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है और वह तुम में होगा”।
ब यीशु ने अपने चेलों से वायदा किया कि वह अपने पिता से कहकर एक अलौकिक सहायक को भेजेगा तो उसने उस सहायक को विशेष नाम दियाः ‘“सत्य का आत्मा।” इसके साथ उसने चेतावनी भी दी कि संसार इस सहायक को नहीं स्वीकारेगी।
The World Cannot Know
ब यीशु ने अपने चेलों से वायदा किया कि वह अपने पिता से कहकर एक अलौकिक सहायक को भेजेगा तो उसने उस सहायक को विशेष नाम दियाः ‘“सत्य का आत्मा।” इसके साथ उसने चेतावनी भी दी कि संसार इस सहायक को नहीं स्वीकारेगी। इसके लिए पवित्र शास्त्र दो कारण बताता है। पहला, वह समय जब मनुष्य परमेश्वर से दूर हुआ और विद्रोही बना। उन्होनें उस सत्य को ठुकरा दिया जो उनके अधर्मी व्यवहारों का खुलासा करता है। इसी कारण से वे, “सत्य को अधर्म से दबाए रखते हैं” (रोमियों १ः१८) ।
इसके लिए पवित्र शास्त्र दो कारण बताता है। पहला, वह समय जब मनुष्य परमेश्वर से दूर हुआ और विद्रोही बना। उन्होनें उस सत्य को ठुकरा दिया जो उनके अधर्मी व्यवहारों का खुलासा करता है। इसी कारण से वे, “सत्य को अधर्म से दबाए रखते हैं” (रोमियों १ः१८) ।
दूसरा, परमेश्वर से विद्रोह करने से मानवता इस संसार के देवता के अधीन होने के लिए अपने आप को सौंप देता है, वह देवता, “शैतान कहलाता है और सारे संसार का भरमानेवाला है” (प्रकाशितवाक्य १२:६)। भरमाना या छल शैतान का सबसे पहला हथियार है जिसके द्वारा शैतान पूरे मानवता पर अधिकार रखता है। एक बार अगर उसकी यह छल करने के गुण को यदि छीन लिया जाये तो उसके पास कुछ नहीं बचेगा सिवाय उस जगह की जो उसके साथ अनन्त आग में है।
What Is Truth?
कई सदियों से मानव तत्वज्ञान सत्य की एक संतुष्ट परिभाषा नहीं निकाल सका।
परन्तु दूसरे तरफ बाईबल में इसका तिगुणा उत्तर मिलता है। पहला, यीशु कहता है, “सत्य... मैं हूं” (यूहन्ना १४:६)। दूसरा, पिता परमेश्वर से प्रार्थना करते समय यीशु कहता है, “तेरा वचन सत्य है” (यूहन्ना १७:१७)। तीसरा यूहन्ना हमें बताते हैं, “(पवित्र) आत्मा सत्य है” (यूहन्ना ५ः७),
आध्यात्मिक क्षेत्र में तीन समकक्ष सत्य हैः यीशु, वचन और पवित्र आत्मा। जब इन तीनों के बीच एक समझौता होता है, तो हमें मालूम हो जाता है कि हम सत्य तक पहुंच गये-एक बिलकुल सत्य। परन्तु यह जरूरी है कि एक नतीजे पर पहुंचने से पहले हमें इन तीनों समकक्षों का परीक्षण करना है। इसलिए किसी भी आध्यात्मिक बातों के विषय में तीन प्रश्न हमें पूछना चाहिएः
- क्या यह यीशु को दर्शाती है जो वह हकीकत में है?
- क्या यह वचन के साथ तालमेल रखता है?
- क्या पवित्र आत्मा इससे अपनी गवाही देता है?
ऐतिहासिक तौर से अगर कलीसिया हर वक्त इन तीनों समकक्षों का परीक्षण करता तो उसमें त्रुटि या छल जन्म ले लेता। यह काफी नहीं है कि एक शिक्षक सिर्फ यीशु को एक नैतिक उदाहरण के रूप में चित्रिकरण करें। या एक पास्टर पूरी कलीसिया के ऊपर वचन की बौछार कर दें। तथा एक इवान्जलिस्ट पूरे दर्शकों को किसी आलौकिक कार्य दिखाकर प्रभावित करें। इससे पहले हम इन्हें स्वीकार करें, तीनों समकक्ष अपने स्थानों में अवश्य रूप में बैठने होंगे-यीशु, वचन और पवित्र आत्मा।
Bearing Witness
याद रखें पवित्र आत्मा का जो विशिष्ट कार्य है ‘गवाही देना’
“और जो गवाही देता है, वह आत्मा है” (१ यूहन्ना ५ः७)। पवित्र आत्मा यह गवाही देता है कि यीशु जो परमेश्वर का पुत्र है, उसने क्रूस पर अपने लोहू के द्वारा हमारे पापों के लिए एक पर्याप्त बलिदान दी है। चार्ल्स वेसली के शब्दों मेंः ‘आत्मा लोहू को जवाब देता है और मुझसे कहता है कि मैं परमेश्वर से जन्मा हूं।’
पवित्र आत्मा सत्य की भी गवाही देता है और वचन के अधि ाकार की भी, जिस प्रकार पौलुस थिस्सलुनीकियों के लिये लिखी पत्री में लिखते हैंः
“क्योंकि हमारा सुसमाचार तुम्हारे पास न केवल वचन मात्र ही में वरन सामर्थ और पवित्र आत्मा, और बड़े निश्चय के साथ पहुंचा है” (१ थिस्सलुनीकियों १ः५)।
Ananias and Sapphira
पवित्र आत्मा सत्य का आत्मा है और शैतान के बीच कोई समझौता नहीं हो सकता। यह एक नाटकीय रूप में प्रारम्भिक कलीसिया में घटी, जब हनन्याह और सफीरा ने कलीसिया को धन देने के विषय में झूठ बोला। उन्होंने दावा किया कि अपनी भूमि को बेचकर सारा दाम लाकर रख दिया, परन्तु हकीकत में उन्होंने कुछ अपने पास भी रख छोड़े थे।
पतरस में जो सत्य की आत्मा था वह इस छल से प्रभावित न हुई। उसने हनन्याह को दोषी ठहराया न सिर्फ मनुष्यों से झूठ बोलने के लिये परन्तु पवित्र आत्मा से भी जो स्वयं सत्य का आत्मा हैः
“परन्तु पतरस ने कहा, हे हनन्याह! शैतान ने तेरे मन में यह बात क्यों डाली है कि तू पवित्र आत्मा से झूठ बोले, और “भूमि के दाम में से कुछ रख छोड़े? जब तक वह मेरे पास रही, क्या तेरी न थी? और जब बिक गई तो क्या तेरे वश में न थी? तूने यह बात अपने मन में क्यों विचारी? तूने मनुष्यों से नहीं, परन्तु परमेश्वर से झूठ बोला। ये बातें सुनते ही हनन्याह गिर पड़ा, और प्राण छोड़ दिए; और सब सुनने वालों पर बड़ा भय छा गया” (प्रेरितों के कार्य ५ः३ः५)।
तीन घण्टें के बाद सफीरा वहां आई और उस झूठ को दोहराया। उसके पति के समान उसे भी कीमत अपनी जान खो कर चुकानी पड़ी ।
सही रूप में वर्णन करें तो, जो पाप हनन्याह और सफीरा ने किया वह था कपट या धार्मिक दिखावा। उन्होंनेअपने आपको उदार और प्रभु के लिए समर्पित बताना चाहा, जितना समर्पण उनमें न था।
यीशु ने इस तरह के पापों के लिए जो कठोर शब्द को बचाकर रखा था वह उसने धर्म शास्त्रियों पर प्रयोग किया। मत्ती २३ में सात बार उसने कहा, “हे कपटी .... तुम पर हाय!”,
What Is Hypocrisy?
अंग्रेजी में ‘कपटी’ को ‘हिपोक्रैट’ कहते हैं और यह शब्द ‘ह्यपोक्रेटस’ से लिया गया है जिसका अर्थ है “अभिनय करने वाला”। यही मूल अर्थ है कपट का एक धार्मिक अभिनय को पहनना। संभवतः ऐसा कोई पाप साधारण रूप से मसीहियों में नहीं पाया जाता जितना ‘कपट’ पाया जाता है। और हकीकत में यह कुछ धर्मों की मांग भी है।
जब कोई किसी धार्मिक स्थान में प्रवेश करते हैं तो उनका सारा आचरण बदल जाता है। वे अब प्राकृतिक, स्वतंत्र या खुले रूप से नहीं रहते हैं। वे किसी अदृश्य “सिकुड़न” के चंगुल में दिखते हैं। वे एक धार्मिक चेहरे को पहनने की कोशिश करते हैं। परन्तु ऐसे बहुत से कार्य हैं जो लोगों को उनके सही रूप में रहने को कहते हैं।
Job’s Example
कपटी लोगों के लिए बाईबिल के परमेश्वर के पास कोई समय नहीं। यह अय्यूब की कहानी से स्पष्ट होती है। अय्यूब के तीन मित्रों ने उसके उपर धार्मिकता की नीरस बातों को उड़ेल दिया। उन्होनें कहा, “परमेश्वर धर्मी को हमेशा अनुग्रहित करता है; वे कभी उसके अन्याय को नही सहते।” और : “परमेश्वर हमेशा दुष्ट पर न्याय करता है; और वे कभी समृद्ध नही होते।” परन्तु इतिहास बताता है कि यह सच नहीं है। यह सिर्फ धार्मिक बातें है।
दूसरी तरफ अय्यूब निष्कपट रूप से कहता है, “परमेश्वर मुझ से सही बर्ताव नहीं कर रहा। मैंने यह सब के लिए ऐसा कुछ भी नहीं किया। परन्तु वह अगर मुझे मार भी दें तो भी मैं उस पर भरोसा करूंगा।”
मैंने अय्यूब ४२:७ को पिछले अध्याय में उपयोग किया है। परमेश्वर अय्यूब और उसके मित्रों के व्यवहारों पर विचार करता है।
एक और बार इसे स्पष्ट रूप से देखेंः “तब उस ने तेमानी एलीपज से कहा, मेरा क्रोध तेरे और तेरे दोनों मित्रों पर भड़का है, क्योंकि जैसी ठीक बात मेरे दास अय्यूब ने मेरे विषय कही है, वैसी तुम लोगों ने नहीं कही।”
हमें स्वयं से यह पूछना है : किस प्रकार यह धार्मिक व्यवहार हनन्याह और सफीरा के पाप से भिन्न है, जो उनको जीवन देकर चुकानी पड़ी?
सत्य का एक पल
इस संदर्भ में राजा दाउद को देखें जब वह दो भयंकर पापों के लिए दोषी ठहरा। पहला, उसने अपने पड़ोसी उरिय्याह की पत्नी बेतशेबा के साथ व्यभिचार किया। फिर उस पाप को छिपाने के लिए उसने उरिय्याह की हत्या का प्रबंध किया। प्रत्यक्ष रूप से दाऊद इन सबसे बाहर निकल गया। उसने फिर से अपनी आराधना शुरू कर दी। वह अब भी राजा बनकर सारे कार्य करने लगा। वह अब भी
राजमहल में रहता है। बाहरी तौर से कुछ भी नहीं बदला -तब तक, जब तक परमेश्वर का दूत, नातान भविष्यवक्ता ने दाऊद को उसके पाप के बारे में महसूस कराया। उस समय दाऊद अपने अनन्त भविष्य पर स्वयं को संतुलित कर रहा था। परमेश्वर की कृपा से, दाऊद की एक सही प्रतिक्रिया रही। उसने कोई बहाना नहीं बनाया और कोई ऐसा कार्य नहीं किया जिससे वह उस पाप को छिपाता। उसने स्वीकार किया, “मैंने पाप किया” (देखें २ शमुएल १२:१-५)।
बाद में जब हम भजन संहिता ५१ में पढ़ते हैं कि दाऊद पश्चाताप की प्रार्थना करता है और करूणा के लिये रोता है। आयत ५ और ६ शुरू होता है शब्द “देख” से जो एक महत्वपूर्ण सत्य को प्रकट करता है।
आयत ५ में लिखा हैः “देख मैं अधर्म के साथ उत्पन्न हुआ और पाप के साथ अपनी माता के गर्भ में पड़ा।” दाऊद एक ऐसी बात का सामना करता है जो सत्य के आत्मा ही उसे प्रकाशित कर सकता है। जो कृत्य उसने किया सिर्फ वही नहीं बल्कि, भयंकर, शैतानी ताकत के प्राप्त किये हुए पाप जो आदम के हर वंश के अंदर घुली हुई है।
आयत ६ प्रकट करता है एक मूल बात जिससे परमेश्वर इस आन्तरिक पाप से छुटकारा देता हैः “देख, तू हृदय की सच्चाई से प्रसन्न होता है उसके पाप के पश्चात भी दाऊद अपने बाहरी राजकीय व्यवहार में आगे बढ़ता रहा लेकिन अब उसके बाहरी व्यवहार और हृदय की आन्तरिक स्थिति में काफी बड़ा अन्तर आ गया था। वह एक कपटी बन गया-एक अभिनेता जिसके व्यवहार में उसके दिल के साथ कोई तालमेल नहीं था। इसके लिए केवल एक ही समाधान थाः सच्चा अंगीकार और पूर्ण हृदय से पश्चाताप ।
A Barrier to Revival
बहुत से मसीही आज अपने बोलचाल और प्रार्थनाओं में पुनःजीवन के बारे में बोलते हैं। वे अपने नजरिये में उस सच्चाई को नजरअन्दाज कर देते है जो पुर्नजीवन के लिए रूकावट है। और वह है ‘पाप’। जब तक पाप से न निपटा जाएगा तब तक पुर्नजीवन कभी नहीं आयेगा। और एक ही तरीका है इस पाप से निपटने काः “जो अपने अपराध छिपा रखता है, उसका कार्य सफल नहीं होता, परन्तु जो उनको मान लेता और छोड़ भी देता है, उस पर दया की जाएगी” (नीतिवचन २८ः१३)।
साफ-साफ कहें तो आधुनिक कलीसिया में बहुत से जगहों पर ये “छिपे हुए अपराध” पाये जाते हैं।” यही कुछ पाप है जो मसीही जन छिपाने की कोशिश करते हैं जैसेः
- १. बच्चों के साथ दुरव्यवहार करना जो- शारीरिक, मानसिक, लैंगिक -या यह सब।
- २. विवाह के प्रतिज्ञा को तोड़ देना।
- ३. धन का अनैतिक रूप से प्रयोग।
- ४. अश्लील साहित्य की बुरी आदत (मैं हैरान हुआ जब मुझे पता लगा कि यह कितना सामान्य रूप से कलीसिया के अगुवों में पाये जाते हैं)
- ५. पेटुपन (खाऊ) - शारीरिक खान-पान में ज्यादा उलझना।
परमेश्वर का तरीका दो प्रकार के हैः पहला, ‘अंगीकार’; फिर ‘त्यागना’। हमारे पापों का अंगीकार करना आसान नहीं होता है। परन्तु और कोई तरीका भी नहीं है। “यदि हम अपने पापों को मान लें तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वास योग्य और धर्मी हैं” (१ यूहन्ना १:६) । परमेश्वर यह कभी नहीं स्वीकारेगा कि वह हमारे अंगीकार के बगैर हमारे पापों को क्षमा करे।
परन्तु सिर्फ अंगीकार करना ही काफी नहीं है। हमें त्यागना भी है। हमें एक ठोस कदम उठाना होगा कि हमारे द्वारा अंगीकार किये हुए पाप को हम न दोहरायें। हमें उस मूल्य सुझाव को अपनाना है जो दानिएल ने नबूकदनेस्सर को दिया थाः “पाप छोड़कर धर्म करने लग” (दानियेल ४ः२७)। धार्मिकता और पाप के बीच कोई मध्य स्थान नहीं है। “सब प्रकार का अधर्म पाप है” (१ यूहन्ना ५:१७)।
What About You?
यदि यह अध्याय आपके अपने जीवन के कुछ बातों के विषय में सवाल करता है और आपके जीवन की अनाज्ञाकारिता को आपके सामने लाने में सहायता करता है तो आप सत्य के आत्मा के सामने अपने आपको खोल दें। वह तैयार हैं और आपकी सहायता करना चाहता है।
*Prayer Response
Dear Heavenly Father, I open my heart now to the Holy Spirit—the Spirit of truth. I already know there are areas of sin and disobedience in me. I confess them to You, and I commit myself to forsake them as I move forward in Your grace. Thank You for making the power of Your Spirit available to us. May the Spirit of truth be at work in me from this day forward in every aspect of my life and ministry. Amen.
कोड: TL-L128-100-HIN