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            Derek Prince

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            *First Published: 2018

            *Last Updated: मार्च 2026

            10 min read

            This teaching is not currently available in हिन्दी.

            इस शिक्षण विरासत में, डेरेक यीशु का और अधिक निकटता से अनुसरण करने की चुनौती देते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि यीशु की आज्ञा मानना हमारे जीवन में क्रूस का सामना करना है। हम वास्तव में तब तक अनुसरण नहीं कर सकते जब तक हम स्वयं का इनकार न करें और अपना क्रूस न उठाएँ। यीशु की पहली मुलाकात मत्ती से उद्धृत करते हुए, जब उन्होंने इस कर वसूलकर्ता से कहा, "मेरे पीछे आओ," डेरेक स्पष्ट करते हैं: "मत्ती की तरह, हमारा अनंत भविष्य भी यीशु मसीह के प्रति हमारी प्रतिक्रिया के संतुलन पर टिका है।" उद्धारकर्ता की खोज में हमारी व्यक्तिगत जाँच के लिए डेरेक चार प्रश्न प्रस्तुत करते हैं।
            • मने मने देखा सफलता का अर्थ विभिन्न लोगों के लिए अलग-अलग ‘है। संसार के लिए सधारण तौर से यह धन और शोहरत हैं। मसीहियों के लिए इसका अर्थ है परमेश्वर की इच्छा को करना। हम इस सफलता को किस प्रकार पा सकते हैं? एक ही मार्ग है, यीशु का अनुसरण करना। यही वह मार्ग है जिससे एक मसीही अपने व्यक्तित्व का निर्माण करता हैं। एक मसीही के जीवन का सार यही हैं।

            इसे समझाया गया है महसूल लेने वाले मत्ती के परिवर्तन से (देखें मत्ती ६:६)।

            मत्ती जब अपने महसूल की कोठी में बैठा था तब यीशु वहाँ से गुजरा और उससे सिर्फ यह कहाः “मेरे पीछे हो ले।”

            मत्ती की प्रतिक्रिया पर उसका अन्नतकालीन भाग्य निर्भर था। वह उठा और उसके पीछे हो लिया।

            Two Essential Preconditions

            इसे समझाया गया है महसूल लेने वाले मत्ती के परिवर्तन से (देखें मत्ती ६:६)। मत्ती जब अपने महसूल की कोठी में बैठा था तब यीशु वहाँ से गुजरा और उससे सिर्फ यह कहाः

            “मेरे पीछे हो ले।” मत्ती की प्रतिक्रिया पर उसका अन्नतकालीन भाग्य निर्भर था। वह उठा और उसके पीछे हो लिया।

            त्यागने का अर्थ है ‘नहीं’ कहना ! हमें न कहना है हमारे हठ, स्वइच्छा और अहम् को। हमें अनुकरण करना है यीशु की प्रार्थना का जो उसनें गतसमने में किया :

            हे पिता यदि तू चाहे तो इस कटोरे को मेरे पास से हटा ले, तौभी मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूरी हो” (लूका २२:४२)।

            हम स्वयं को त्यागने के पश्चात् ही अपने क्रूस को उठा सकते है। किसी ने यह भी व्याख्या की है कि हमारा एक योद्धा के व्यक्तित्व का निर्माण क्रूस वह स्थान है जहाँ परमेश्वर की इच्छा और हमारी इच्छा मिलती है। यथार्थ में यह एक निर्वाह करने का स्थान है।

            रोमियों के ६:६ में पौलुस हमसे कहता है “क्योंकि हम जानते है, कि हमारा पुराना मनुष्यत्व उसके साथ क्रूस पर चढ़ाया गया, ताकि पाप का शरीर व्यर्थ हो जाए, ताकि हम आगे को पाप के दासत्व में न रहें।” याद रखे, हमने अपने पहले अध्याय में यह सीखा कि हमारा पुराना मनुष्य एक विद्रोही, और स्वयं के सुख खोजनेवाले प्रकृति का है जो हमें अपने पूर्वज आदम से प्राप्त हुआ।

            परमेश्वर के पास इस पुराने मनुष्य से निपटने के लिए एक ही उपाय था। उसने उसे किसी कलीसिया या संडेस्कूल नहीं भेजा; और उसने उसे कोई महत्वपूर्ण सिद्धांत नहीं सिखाया; और न ही किसी कक्षा में भेजा जहाँ उसे स्वयं के सुधार की शिक्षा मिलती। परमेश्वर का उपाय आसान और अन्तिम हैं। वह है निर्वाह।

            सुसमाचार का संदेश यह हैं कि, वह ‘निर्वाह’ पूर्ण हुआ जब यीशु ने क्रूस पर अपनी जान दी। और हमारा पुराना मनुष्य भी उसके साथ क्रूस पर चढ़ाया गया। यह ऐतिहासिक रुप से भी सच हैं। यह सच है भले हम इसे जाने या इस पर विश्वास करें। परन्तु अगर इसमे से कुछ पाना हो तो हमें इसे जानना भी होगा और इस पर विश्वास भी करना होगा।

            एक स्वप्न में परमेश्वर द्वारा चुनौती दिया गया

            पचास साल पहले लंदन में मार्बल आर्क के स्पीकर कार्नर नामक एक जगह पर मैं धर्मोपदेश संबंधी सभा का आयोजन किया करता था। उस दौरान एक रात मैंने कुछ अलग सा स्वप्न देखा, जिसमें एक व्यक्ति स्पीकर कार्नर में प्रचार कर रहा है। उस व्यक्ति का प्रचार तो अच्छा था, परन्तु उसका बाहरी रुप मुझे पसंद नहीं आया। उसका शरीर कुछ टेढ़ा था और पाँव फैला लग रहा था। उस समय मैंनें अपने स्वप्न को कुछ खास महत्व नहीं दिया।

            मैंने यह समझ लिया कि परमेश्वर मुझ से कुछ चाहता है। “प्रभु” मैंने कहा, “वह कौन मनुष्य हैं? उसका प्रचार तो अच्छा था परन्तु उसके बाहरी रुप को मैंने पसन्द नहीं किया। कौन हैं वह?”

            परमेश्वर का उत्तर तुरन्त व सीधा थाः वह मनुष्य तुम हो! यकीनन परमेश्वर मुझसे कुछ चाहता था, परन्तु मैं नहीं जानता था कि वह क्या हैं।

            ईस्टर का पर्व आने वाला था और मैंने स्वयं को क्रूस के विषय में मनन करते हुए पाया। मेरे मन में पहाड़ पर तीन क्रूस का चित्र था। उसमें से मध्य क्रूस बाकी दो कूसों से ऊँचा था । पवित्रआत्मा ने मुझसे प्रश्न किया कि किसके लिए वह मध्य क्रूस ऊँचा बनाया गया? परन्तु उसने साथ ही चेतावनी भी दी कि इसका जवाब देते समय सावधान रहना।

            ईस्टर का पर्व आने वाला था और मैंने स्वयं को क्रूस के विषय में मनन करते हुए पाया। मेरे मन में पहाड़ पर तीन क्रूस का चित्र था। उसमें से मध्य क्रूस बाकी दो कूसों से ऊँचा था । पवित्रआत्मा ने मुझसे प्रश्न किया कि किसके लिए वह मध्य क्रूस ऊँचा बनाया गया? परन्तु उसने साथ ही चेतावनी भी दी कि इसका जवाब देते समय सावधान रहना। मैंने इसके बारे में थोड़ा सोचा, फिर कहा “मध्य क्रूस बरअब्बा के लिए बनाया गया था, परन्तु आखिरी समय में यीशु नें उसका “ स्थान ले लिया।

            “तो यीशु ने बरअब्बा का स्थान लिया” पवित्र आत्मा ने पूछा। “परन्तु तुम नें कहा था कि यीशु तुम्हारे स्थान पे था।” “हाँ, वह मेरे स्थान में था” मैनें कहा। उसने कहा तो तू बरअब्बा हैं!

            My True Condition

            उस वक्त मैंने साफ रुप से देखा कि : मैं वह व्यक्ति था जिसके लिए वह क्रूस तैयार किया गया था। वह मेरे नाम में बनाया गया था। वह जगह मेरे लिए था।

            मेरे पुराने मनुष्य के क्रूस पर चढ़ाये जाने के बावजूद मैं पौलुस के स्वयं के प्रति व्यक्त किये गये रवैये को पहचानने की कोशिश कर रहा था : क्योंकि मैं जानता हूँ, कि मुझ में अर्थात् मेरे शरीर में कोई अच्छी वस्तु वास नहीं करतीं” (रोमियों ७:१८)। मैंने देखा, मेरे हर व्यक्तित्व पर पाप की भ्रष्टता प्रभाव कर रही थी। मुझ में कुछ भी शुद्ध नहीं था जिससे परमेश्वर का अनुग्रह मुझ पर हो। तो मेरी प्रतिक्रिया कैसी होगी?

            रोमियों ६:६-१३ में पौलुस चार क्रमानुसार बातों का जिक्र करते हैं जिससे हम एक ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण कर सकते है जो पुराने मनुष्य को हराकर यीशु के व्यक्तित्व को ग्रहण करता है।

            १. सबसे पहले, मुझे यह जानने कि आवश्यकता है कि मेरे पापमय प्रकृति का अन्त यीशु के क्रूस पर चढ़ने से हुआ। यही वह पहला महत्वपूर्ण क्रम है जिससे बाकी क्रम लागू होते है ( देखें आयत ६)।

            २. मुझे मानना है कि मैंने मृत्यु को प्राप्त की जिस प्रकार यीशु ने की (देखें आयत ११)।

            ३. इस आधार से मुझे पूरे दृढ़ता से पाप को न कहना हैं ताकि वह मुझ पर हावी न हो सके (देखें आयत १२)।

            ४. मुझे चाहिये कि मैं अपने आपको परमेश्वर को भेंट कर दूँ, जैसे कि कोई मृत्यु इसका अर्थ है कि परमेश्वर को हमारे भ्रष्ट प्रकृति पर विचार मुझे अपने शारीरिक आवश्यकताओं (यथार्थ रुप से अस्त्र) को धर्मिकता के लिए उत्पन्न करना है। अस्त्र शब्द ने मुझे सतर्क किया कि शायद मुझे शैतान का सामना करना पड़े (देखें आयत १३)।

            God’s Threefold Provision

            और हमने देखा कि पाप के क्रूर अधीनता से पूर्ण छुटकारा पाने के लिए परमेश्वर के तीन प्रकार के व्यवस्थाओं की आवश्यकता है। सबसे पहला, उसे हमारे पाप से निपटना होगा वह पापमय कार्य जो हम सब ने किया है। परमेश्वर न्याय को देखे बिना हमें क्षमा करेगा क्योंकि यीशु ने हमारे पापों का दाम क्रूस पर चुका दिया है। उसका प्रथम व्यवस्था है क्षमाशीलता।

            करना होगा । वह प्रकृति जो हमें बार बार पाप करने को मजबूर करती है। और सुसमाचार यह है कि १६वीं शताब्दी पूर्व इसका निर्वाह हो चुका था जब यीशु ने क्रूस पर अपनी जान दी।

            परन्तु यह वहाँ समाप्त नहीं होता हैं। परमेश्वर का उद्देश्य है कि पाप में पड़े पुराने मनुष्य को बदल कर एक नये मनुष्य को जो उसकी स्वयं की सृष्टि होगी पुनः स्थापित करें। इस व्यवस्था को इफिसियों की पत्री ४:२२-२४ में समझाया गया हैं:

            “कि तुम अपने चालचलन के पुराने मनुष्यत्व और अपने मन के आत्मिक स्वभाव में नये बनते जाओ। और नये मनुष्य को पहिन लो जो परमेश्वर के अनुसार सत्य की धर्मिकता, और पवित्रता में सृजे गए हैं।”

            हम पौलुस के पचिन्हों में चले तो भी हमें यह नहीं सोचनाचाहिए कि हमारा पुराना मनुष्य आसानी से निर्वाह के निर्णय कोस्वीकार करेगा। इसके विपरीत वह भयंकर रुप से कोशिश करेगाकि वह अपने खोए हुए अधिकार को पा लें।

            इस बात को समझाया गया है पौलुस के वाक्यों से, जो कुलीसियों की पत्रीतीसरे अध्याय में है। आयत ३ में वह कहता है, "क्योंकि तुम तोमर गए” परन्तु फिर अध्याय ५ में कहता है, "इसलिए अपने उनअंगों को मार ड़ालो, जो पृथ्वी पर हैं।" हमें विश्वास में स्थिररहना है जिससे हमारे पुराने मनुष्य की मृत्यु सही साबित होऔर हमें शक्त रुप से दुबारा हम पर हावी होने से रोकना है।

            A Personal Spiritual Inventory

            इसे दुर्भाग्य कह सकते है कि बहुत से सच्चे मसीही इससच्चाई को नहीं जानते और परमेश्वर के व्यवस्था को लाभ नहींउठा पाते। वे निरंतर अपने पापों के लिये क्षमा माँगते रहते है,परन्तु उन्हें यह पता नहीं कि परमेश्वर के व्यवस्था में पुरानेमनुष्य की मृत्यु हो चुकीं हैं और उसके स्थान में एक नये मनुष्यनेलेली है। फलस्वरुप उनकी मसीही जीवन एक थका देने वालीक्रम मे बंध जाती हैं पाप करना पश्चाताप करना क्षमा किया जाना - और फिर से पाप करना... वे कभी उस पुरानेपापमय प्रकृति के अधीनता से छुटकारा नहीं पाते।

            यह परमेश्वर की व्यवस्था का विश्लेष्ण जो पाप के संबध मेंथा, यह हमें अपनी स्वयं की धार्मिक सूची बनाने में सहायताकरती है और जिसमें हम अपने आप से यह प्रश्न पूँछते है कि

            • क्या मैं निश्चित रुप से मान लूँ कि मेरे सारे पापों को क्षमा

            मिल गयी है?

            • क्या मैं मेरे पुराने सांसारिक प्रकृति की अधिनता

            से आज़ाद हूँ?

            • क्या मैंने उस नये मनुष्य को पहन लिया है जो

            धार्मिकता और पवित्रताई में बनाया गया हैं? क्या मैं यीशु काअनुकरण कर रहा हूँ?

            • क्या मैं यीशु का अनुकरण कर रहा हूँ?

            भविष्य की एक झलक

            इस युग के अन्त में परमेश्वर स्वयं के लिए १४४००० मसीह का अनुकरण करने वाले इस्राएलियों को खड़ा करेगा। वह उन्हें उस संसार में भेजेगा जो “भयंकर क्लेशों” से प्रभावित होगी और वे आत्माओं की एक ऐसी कटनी काटेंगे “जिसकी गणना कोई न कर पायेगा।”

            प्रकाशितवाक्य १४ः १ -५ बताता है कि ये १४४००० विजय की घोषणा करते हुए अपने कार्य की पूर्ती करने के बाद संभावित रुप से अपने गवाहियों पर जीवन के लहू से मुहर लगाएंगे। उनके माथे पर पिता और पुत्र का नाम लिखा हुआ होगा, और वे परमेश्वर की महिमा के गीत ऐसे शब्दों में करते है “जो जल की बहुत धाराओं और बड़े गर्जन का सा एक ऐसा गीत जो और शब्द था” (प्रकाशितवाक्य १४:२) कोई सीख नहीं सकता।

            वे किस प्रकार के मनुष्य थे?उनके व्यक्तित्व का स्पष्ट रुप से चित्रण किया गया है: वेस्त्रियों के साथ अशुद्ध नहीं हुए; उनके मुहँ से कभी झूठ ननिकला और वे निर्दोष है। किस प्रकार उन्होंने यह व्यक्तित्वपाया? एक सरल उतर इस प्रश्न के लिए दिया गया है: " जहाँ एक योद्धा के व्यक्तित्व का निर्माण कहीं मेम्ना जाता हैं, वे उसके पीछे हो लेते है।"क्या यह आपको उत्त्तेजित करता है जिस प्रकार इसने मुझे कियाहै-एक अभिलाषा जगाते हुए कि यीशु को और निकटता सेअनुसरण कर सके ?

            अनुसरण कर सके?

            Do you want to follow the Lamb of God wherever He goes? Perhaps you have been trying very hard to do just that. But you have found yourself in the wearisome repetitive cycle of sinning … repenting … being forgiven … and then sinning again.

            Let’s pray and ask for help from the Holy Spirit as we use the personal inventory questions I listed above. Let’s set our faces to follow Jesus more closely than ever before.

            *Prayer Response

            Dear Lord Jesus, I sense that by Your Holy Spirit you are calling me to follow You more closely. I long for this with my whole heart, but I am trapped in a cycle of sin. Please help me know with certainty that all my sins are forgiven, to be freed from the domination of my old carnal nature, and to learn how to put on the new man created in righteousness and holiness. Help me to deny myself, to take up my cross, and to follow You. In Your Name I pray, Amen.

            मैंने प्रार्थना की है
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            "I've applied the Biblical principles on family relationships from this teaching, and it has completely restored harmony in our home. My teenagers and I now have meaningful conversations about faith, and my marriage has been strengthened in ways I never thought possible."
            Elena R., Brazil
            "The teachings on spiritual warfare completely transformed my approach to daily challenges. I used to feel overwhelmed by life's obstacles, but now I understand how to stand firm in faith. This teaching gave me practical tools I use every single day."
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