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            Do You Bury Your Face in the Water?

            Do You Bury Your Face in the Water?

            Derek Prince

            Teaching Legacy Letter

            17
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            *First Published: 2018

            *Last Updated: मार्च 2026

            9 min read

            This teaching is not currently available in हिन्दी.

            "क्या आप अपना चेहरा पानी में डुबोते हैं?" डेरेक गिदोन की कहानी को खोलते हैं। वे दिखाते हैं कि कैसे परमेश्वर ने गिदोन को एक डरपोक, भयभीत व्यक्ति से आज्ञाकारी और विजयी योद्धा में बदल दिया, और कुछ ऐसे बिंदु साझा करते हैं जो हमारे लिए भी प्रासंगिक हैं। हमें आशा है कि आप गिदोन के जीवन से डेरेक की गहरी समझ को अपने यीशु मसीह के साथ चल रहे संबंध में लागू कर पाएंगे।

            In this Teaching Letter series on the theme of Our Value, Our Worth, we are looking at what the Bible has to say about the human personality.

            As I shared in the second installment, the Bible is a unique kind of mirror, which shows us how each aspect of our personality is intended to function. Correctly using God’s mirror can save us from much inner frustration, disharmony, and failure.

            How God Sees Us

            हा ल ही में, प्रभु के वचन यशायाह ५५:८-६ से मैं काफी प्रभावित हुआ।

            "क्योंकि यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं हैं, न तुम्हारी और मेरी गति एक सी है। क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरी और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर हैं।"

            हमारे विचारों की दूरियों के विषय में सोच रहा था, तब मुझे गिदोन और उसकी सेना के बारे मे याद आया जो न्यायियों के ६-८ पदों में दिखाया गया हैं।

            इस वक्त इस्त्राएल पाप और मूर्तिपूजन में गिर गया और परमेश्वर का न्याय उन पर आ गया और हर वर्ष मिद्यानियों की सेना आक्रमण कर उन्हें और उनकी फसल को लूट ले जातें थें।

            एक दिन, जब गिदोन अपना अनाज तैयार कर रहा था और मिद्यानियों से छिपाने की कोशिश कर रहा था तभी परमेश्वर का दूत प्रकट हुआ और उससे कहा,

            "हे शूरवीर सूरमा" (न्यायियों ६-१२)।

            स्पष्ट रुप में परमेश्वर ने गिदोन को अलग नज़रिये से देखा जो उसके अपने नज़रिये से भिन्न था। गिदोन ने अपने आपको एक युवा, कमजोर और अप्रभावशाली रुप में देखा था। परन्तु परमेश्वर ने उसे “हे शूरवीर सूरमा” करके पुकारा।

            Seeing Ourselves Rightly

            स्पष्ट रुप में परमेश्वर ने गिदोन को अलग नज़रिये से देखा जो उसके अपने नज़रिये से भिन्न था। गिदोन ने अपने आपको एक युवा, कमजोर और अप्रभावशाली रुप में देखा था। परन्तु परमेश्वर ने उसे "हे शूरवीर सूरमा" करके पुकारा।

            जैसे मैंने पहले कहा, हमें यह चिंता नहीं करनी चाहिये कि हम अपने आपको कैसे देखते है परन्तु हमे इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि परमेश्वर हमें किस रुप में देखता है। यदि मसीह में हम सबने "नये मनुष्यत्व को पहन लिया हैं जो परमेश्वर के अनुसार सत्य की धार्मिकता, और पवित्रता में सृजा गया है" (इफिसियों ४:२४)।

            हम यदि अपने आप को इस प्रकार देखें तो अवश्य ही हमारे इस युद्ध के दौरान काफी प्रभाव पड़ेगा। परमेश्वर ने गिदोन को आज्ञा दी कि वह इस्त्राएल को मिद्यानियों से युद्ध करने में नेतृत्व करे।

            गिदोन ने सेना को हरोद के सोते के पास इकटठा किया जिसके उत्तर दिशा में मिद्यानियों ने पड़ाव डाला था।

            क्या गिनती थी दोनों तरफ की?

            • गिदोन की सेना ३२,०००
            • मिद्यानियों की सेना १,३५,०००

            और गिदोन ने ३२,००० पुरुषों के साथ (देखें न्यायियों ७ः३) मिद्यानियों की सेना का सामना किया (देखें न्यायियों ८ः१०) ।

            परमेश्वर ने गिदोन को निर्देश दिया कि जो कोई भी भयभीत है उसे वापस भेज दिया जाए। परिणाम स्वरुप २२,००० पुरुष जन वापस लौट गये और गिदोन के साथ रह गये केवल १०,००० पुरुष । यहाँ तक कि उस के पास प्रति तेरह के लिये एक का अनुपात था।

            परन्तु परमेश्वर फिर भी न रुका! उसने गिदोन से कहा,

            "लोग अब भी अधिक है"।

            फिर परमेश्वर ने गिदोन को निर्देश दिया कि वह अपने लोगों को सोते के पास नीचे ले जाए, जहाँ वह उन्हे उनके पानी पीने के तरीके से परख सके। वह सब जो घुटने टेककर पानी पीये उन सब को अलग कर दिया गया। जिन्होने मुहँ में हाथ न लगाते हुए, कुतों की नाई पानी पिया वे चुन लिये गये (देंखे न्यायियों ७:४-७) ।

            यह परख केन्द्रित करती है एक विशेष स्वभाव को जो हैः चौकन्ना।

            एक योद्धा के व्यक्तित्व का निर्माण “एक महत्वपूर्ण स्वभाव की आवश्यकता”

            पहला चित्र उनका है जिन लोगों ने साधारण रुप से पानी पीयें। उन्होंने बायें हाथ से ढ़ाल को नीचे रखा और घुटने टेककर मुँह को पानी से लगाकर पीने लगे। इस स्थिति में, वे एक आकस्मिक आक्रमण में आसानी से चोट खा सकते थे। वे नही अपनी ओर बढ़ते दुश्मन को देख सकते और न ही वे अपने हथियार को इस्तेमाल करने के लिये तैयार है। जब तक वे अपने आप को तैयार करते दुश्मन उनपर हावी हो जाता।

            उनका क्या जिन्होनें कुत्तों की नाई चपट-चपट कर पानी पीया? जब एक कुत्ता पानी पीता है, वह अपनी नाक पानी में ड़ाले बगैर अपनी जीभ के द्वारा पानी चारों तरफ छिड़क जाता हैं।

            फिर हम किस प्रकार चित्रित करें उन जनों का जो हाथ में पानी चपट कर पीयें? न्यायियों ७ः६ कहता है कि, वे अपने हाथ को कटोरा आकार मे बनाकर पानी को अपने मुँह तक ले गये।

            और अपनी बरछी या तलवार जिसे आसानी से उठाकर इस्तेमाल कर सके। दुश्मन को कोई मौका न था कि एकाएक उनके बिन देखे उन पर आक्रमण कर सकें।

            गिदोन के सिर्फ ३०० जन इस दूसरी परख मे चुन लिए गये। वे १,३५,००० मिद्यानियों का सामना कर रहे थे। अब रह गये प्रति ४५० मे १।

            Against the Odds

            मैं चित्रित कर सकता हूँ कुछ जनों को जिन्हें वापस भेज दिया गया, वे स्वयं कहने लगे, "चलो, परमेश्वर का धन्यवाद हो कि हम अलग हुए ! वह गिदोन का दिमाग ठिकाने पे नही हैं। इससे क्या फर्क पड़ता है कि कोई पानी किसी भी तरह से पीये? देखें क्या होता है उसका और उन बेवकूफों का जो उसके साथ हैं।"

            आखिरकर गिदोन और उसके तीन सौ जनो ने एक ऐसा आकस्मिक आक्रमण किया जिससे मिद्यानी उलझन में पड़ गयें। उसके पश्चात् इस्राएली गिदोन के पीछे हो लिये और मिद्यानियों पर पूर्ण विजय प्राप्त की।

            यह पूरी बात यह दर्शाती है कि परमेश्वर के मार्ग हमसे कितने भिन्न हैं।

            अगर गिदोन को देखें तो वह स्वयं इस निष्कर्ष में रहा होगा कि, "मेरे साथ बहुत कम लोग हैं। मुझे अपनी सेना की संख्या बढ़ानी चाहिए।" परन्तु परमेश्वर का नज़रिया उससे भिन्न था।

            वह यह कि "जो लोग तेरे साथ है वे काफी है।" अन्त में गिदोन के पास सौ में से एक था जो उसके साथ जुड़े थे। परन्तु परमेश्वर के लिये यह प्रश्न नहीं उठता है कि “कितने लोग?", बल्कि यह कि "किस प्रकार के लोग?"

            व्यक्तिगत मूल्यांकन

            इस घटना के आधार पर हमें स्वयं एक व्यक्तिगत जाचँ करनी चाहिए।

            • परमेश्वर की सेना में जो आज इकट्ठा हो रही हैं, क्या मैं उन चुनें हुओं में से हूँ?
            • या मैं उन २२,००० में से हूँ जो डर को अपने जीवन में लाये ?
            • या उन ६,७०० लोगों में जिन्होने प्यास बुझाने के लिए अपने हथियार नीचे डालकर, अपने मुँह को पानी में दिये ?

            यह बहुत आसान व स्वाभाविक है कि हम अपने मुहँ को अपने दैनिक जीवन में गढ़ा दें; या हम अपने व्यवहारिक जरुरतों को पूरी करने में खो जाते है; या हम भूल जाते है कि हम उन अन्धकार की ताकतों से एक आत्मिक लड़ाई लड़ रहे है जो घात लगाये बैठे है और इस ताक में है कि हम किस वक्त तैयार नहीं है।

            हर परिस्थिती में चौकसी को कायम रखने के लिए जरुरत है सचेत होना और व्यक्तिगत अनुशासन रखना । फिर भी नया नियम हमें यह चेतावनी देता है कि "सचेत रहो;

            क्योंकि तुम्हारा विरोधी शैतान गर्जनेवाले सिंह की नाई इस खोज में रहता है, कि किस को फाड़खाये" (१ पतरस ५:८)।

            अगर हम इस चेतावनी को नज़रअंदाज कर एक योद्धा के व्यक्तित्व का निर्माण दें तो हम सूक्ष्मबुद्धि होने में पराजित होते है और हमें शैतान के आक्रमण का पहले से ज्ञात नहीं होता।

            Finding a Balance

            उदहारण के रुप में हमारे अवकाश के विषय ही देखिये। मैंने और रुत ने देखा कि हम यह सेवकाई प्रभावशाली रुप में नहीं ले जा सकते अगर समय समय में हम कुछ दिनों का अवकाश नहीं लेते। (हमारा अवकाश हकीकत में यह था कि परमेश्वर के साथ कुछ वक्त बिताना)। परन्तु मैनें एक बात सीखी कि शैतान कभी छुट्टियाँ नहीं लेता।

            जब हमें लगता है कि हमें कुछ आराम की सख्त ज़रुरत हैं, तब शैतान हम पर ऐसे दबाव डालता है जिसका हमे पूर्व ज्ञान नहीं हो पाता और हम पकडे जाते, क्योंकि हम हथियार तुरन्त उपयोग में लाने में सक्षम नहीं होतें।

            इसका मतलब, क्या हमने कभी छुट्ठियाँ नही ली? बिल्कुल नहीं! इसका मतलब यह है कि हमने उन आराम के वक्त भी अपना मुँह पानी में नही गड़ाये; हमने अपने हथियार नीचे नही ड़ाले। हमने यह सीखा कि इन वक्तों में हमे ज्यादा चौकस रहना चाहिए।

            यह एक उदाहरण है जिसे हम और भी जगहों पर उपयोग में ले सकते है जैसे: पारिवारिक संबध में, व्यवसाय की गतिविधियों में, खास उत्सवों में या शिक्षा के मौकों में। हम इन सब में शामिल हो सकते हैं, हमारे मुँह को इनमे गड़ाये बिना।

            याद रखें, गिदोन की सेना बहुत ही कम थी लगभग चार सौ के मुकाबले एक! क्या आज यह परिमाण अलग है?

            What About You?

            एक बार हम चौकसी की परख में चुन लिये जाये, तो यह सिर्फ एक शुरुआत हैं।

            अब हम देखेंगे हमारी तैयारी हमारे व्यक्तित्व को किस प्रकार प्रभावित करती है और स्पष्ट करती है हमारे अगले क्रम के लिए जो एक सैनिक प्रकृति का निर्माण करती हैं।

            Do you want to be renewed by seeing yourself as God sees you? Do you want to reach out in faith to be strengthened like Gideon, in the power and might of the Lord? Let’s ask the Lord to accomplish this in our lives right now:

            *Prayer Response

            Dear Lord, I’m sorry I’ve allowed the blows and assaults of the devil to affect how I see myself. I want to see myself the way You see me—as a mighty person of valor. I choose not to hide any longer; I choose not to be afraid. Instead I ask You to empower me to love You, to serve You, and to bring forth Your Kingdom on earth.

            I humbly ask You to do for me what You did for Gideon. I take my face out of the water and I look full in Your face, Jesus. I release my life, my fears, my gifts—everything I am and everything I have—into Your hands. I commit myself fully to You now. Amen.

            मैंने प्रार्थना की है
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            What People Say

            See how Do You Bury Your Face in the Water? has impacted lives across the globe.

            "I've applied the Biblical principles on family relationships from this teaching, and it has completely restored harmony in our home. My teenagers and I now have meaningful conversations about faith, and my marriage has been strengthened in ways I never thought possible."
            Elena R., Brazil
            "The teachings on spiritual warfare completely transformed my approach to daily challenges. I used to feel overwhelmed by life's obstacles, but now I understand how to stand firm in faith. This teaching gave me practical tools I use every single day."
            Sarah K., California
            "After 20 years of struggling with unforgiveness, the Biblical principles shared in this teaching helped me release the bitterness I had been carrying. The step-by-step approach to forgiveness wasn't just theory—it actually worked in my life when nothing else had."
            Michael T., United Kingdom
            "As a new Christian, I was confused about many aspects of faith. These teachings provided clear, Scripture-based explanations that helped build my foundation. I'm especially grateful for how the content made complex concepts accessible without watering down the truth."
            Priya M., India
            "The teaching on God's sovereignty during difficult times came to me exactly when I needed it most. After losing my job and facing health challenges, this message reminded me that God remains in control. It gave me hope when I had none left."
            James L., Australia
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            Sarah K., California

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