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            Are You Spiritual or Soulish?

            Are You Spiritual or Soulish?

            Derek Prince

            Teaching Legacy Letter

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            *First Published: 2018

            *Last Updated: मार्च 2026

            9 min read

            This teaching is not currently available in हिन्दी.

            क्या आपने कभी "आध्यात्मिक होना" और "आत्मिक होना" के बीच के अंतर के बारे में सोचा है? इस "टीचिंग लिगेसी" पत्र में, डेरेक प्रिंस इस प्रश्न को संबोधित करते हैं: "हमारी आत्मा और हमारे मन के बीच क्या संबंध है?" इतनी गहरी सच्चाई की उनकी स्पष्ट प्रस्तुति ज्ञानवर्धक है—और हमारे लिए इसे समझना अत्यंत आवश्यक है।

            This Teaching Letter series, Our Value, Our Worth, aims to be a source of blessing to you as you discover the value God places on each and every one of us. We began this series by going back to the very beginning of man. We saw that creation, as a whole, was spoken into existence by the word of God. The creation of Adam, however, was uniquely different.

            And the Lord God formed [molded] man of the dust of the ground, and breathed into his nostrils the breath of life; and man became a living being [literally, a living soul]. (Genesis 2:7)

            We saw as well how the Scriptures reveal the three areas which make up the total human personality: spirit, soul, and body. In this letter, as we examine how God intended each aspect of our personality to function, we will focus on one particular issue: the relationship between our spirit and our soul.

            The Original Pattern

            •ष्टि के प्रारंभ में अगर हम देखे तो मनुष्य का परमेश्वर केसाथ का सम्बन्ध 'पतनीय' था। परमेश्वर जो मनुष्य कीआत्मा में मंडरा रहा था और मनुष्य की आत्मा उसके प्राणों पर,और उसके प्राण ने निर्देश दिये उसके देह को। मनुष्य की आत्मा जोसीधे परमेश्वर की ओर से आती है उसका सीधा सम्बन्ध परमेश्वरसे था। परन्तु मनुष्य के विद्रोहों के कारण उसकी आत्मा उससे दूरहो गई और उसका नियंत्रण उसके प्राणों द्वारा होने लगा। इसकापरिणाम हुआः पुर्नजीवन न पानेवाला मनुष्य। उसके प्राण तीन कार्योंद्वारा नियंत्रितं होने लगा; इच्छा, ज्ञान और भावनाएँ।

            जब परमेश्वर ने मनुष्य से सामजस्य स्थापित किया, तबउसका उद्देश्य प्रारंभिक क्रम को पुर्नस्थापित करना था। जिससे वहफिर से मनुष्य की आत्मा से सीधे जुड सके; मनुष्य की आत्मा उसकेप्राणों पर मंडरायें और उसके प्राण उसके शरीर पर।

            जैसे दाऊद की आत्मा परमेश्वर में एक हो गई और वह उसकी आराधना करने को उत्सुक हो गया।

            Bless the Lord, O my soul.

            उसकी आत्मा उसके प्राणों को उत्तेजित करने लगाऔर उसके प्राण ने उसके वांचिक इन्द्रियों को उत्तेजित किये जिससेवह अच्छे शब्दों से आराधना करने लगा।

            आतंरिक तालमेल की खोज

            जब तक मनुष्य परमेश्वर के अधीन में रहता है और उसके प्राण उसकी आत्मा के अधीन में, तब मनुष्य परमेश्वर से और स्वंय से तालमेल रखता है। परन्तु किसी भी वक्त मनुष्य परमेश्वर से विद्रोह करता है तो उसके प्राण उसकी आत्मा के अधीन नहीं रहता और आन्तरिक सामंजस्य टूट जाता हैं। इसका अर्थ है आत्मा और प्राण के बीच निरन्तर तनाव का होना।

            ग्रीक भाषा का नया नियम प्राण के कार्यों की विशेषता बताता है।प्राण के लिये जो शब्द कहा गया वह है "एयूष" और इसकी विशेषताजो इससे उत्पन्न होती है वह हैः "यूचिकोस"। सही शब्दों में यदिकहा जाये तो इसका अर्थ होगा "प्राण द्वारा" ।

            परन्तु इसका सही

            अनुवाद न होने से इसे अलग अलग शब्द दिया गया जैसे सांसारिक,इन्द्रिय, प्राकृतिक, संसारी सोच। अधिकत्तर अनुवाद एक शब्द के हैऔर वह ग्रीक भाषा का शब्द है।

            इस किताब में मैं "यूचिकोस" कोव्यक्त करने के लिए नये नियम के "प्राण द्वारा/प्राणिक" शब्द काउपयोग करूँगा ।

            This will emphasize the tension in the New Testament between that which is spiritual and that which is soulish.

            A Spiritual Body

            १ कुरिन्थियों १५:४४-४६ में, पौलुस ने हमारे वर्तमान शरीर और हमारी पुर्नस्थापित की हुई शरीरों में भेद को समझाने के लिए इस शब्द का उपयोग तीन बार किया है। "स्वाभाविक देह बोई जाती है और आत्मिक देह जी उठती है जबकी स्वाभाविक देह है, तो आत्मिक देह भी हैं। ऐसा ही लिखा भी है, कि प्रथम मनुष्य अर्थात आदम जीवित प्राणी बना और अन्तिम आदम जीवनदायक आत्मा बना परन्तु पहिले आत्मिक न था, पर स्वाभाविक था, इसके बाद आत्मिक हुआ।"

            फिर से कहता हूँ, प्राण के द्वारा शरीर ऐसा होता है जिस पर आत्मा प्राण से प्रभावित होकर मंडराती है। एक आत्मिक शरीर वह है जिस पर आत्मा बिना प्राणों से प्रभावित होते, सीधे मंडराती है।

            आत्मिक शरीर यहेजकेल के पहले अध्याय में बताये गये जीवधारियों के समान है जोः "सीधे अपने अपने सामने चलते थे; जिधर आत्मा जाना चाहता था, वे उधर ही जाते थे" (वाक्य १२)।

            And again, further down in the same chapter:

            फिर से "जिध्ार आत्मा जाना चाहती थी उधर ही वह जाते थे" (वाक्य २०)।

            यही वह शरीर है जो पौलुस कहता है कि हर विश्वासी का पुनरुथान के बाद होगा। हमारा शरीर हमारी आत्मा के निर्णय पर चलेगा। हम सब यहेजकेल के उन जीवधारियों के समान होंगेः हमबिना मुड़े सीधे जायेंगे, जहाँ हमारी आत्मा कहेगी और कितनी महान आज़ादी होगी।

            A “Soulish” Body

            नये नियम में तीन ऐसे पद है जो आत्मिक और ‘प्राणिक’ के बीच तनाव को व्यक्त करती है। शुरुआत में पौलुस कहतें हैः

            “परन्तु शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नही करता, क्योंकि वे उस की दृष्टि मे मूर्खता की बातें है, और न वह उन्हें जान सकता है क्योंकि उन की जाँच आत्मिक रीति से होती हैं। आत्मिक जन सब कुछ जाँचता है, परन्तु वह आप किसी से जाँचा नहीं जाता”

            आत्मिक बातों को जानने के लिए प्राण को आत्मा पर निर्भर रहना है। अगर आत्मा से तालमेल न हो तो प्राण के लिए आत्मिक सच्चाई के क्षेत्र बंद हो जाता हैं।

            यहूदा अपनी पत्री में उन कलीसिया के लोगों के बारे में लिखता है जो है “असंतुष्ट, कुड़कुडानेवाले, अपने अभिलाषाओं के अनुसार चलनेवाले... शारीरिक (प्राणिक) लोग जो फूट डालते है और जिनमें पवित्र आत्मा नहीं” (यहूदा की पत्री १६,१६) ।

            जब एक मसीही जन का प्राण बिना उसकी आत्मा के परमेश्वर को समर्पित होती है, तो वह एक माध्यम बनता है कलीसिया को हर सांसारिक व विभाजन करने वाले कार्यों से प्रभावित करने को। मसीह के देह का विभाजन करने के लिए यही सच और पहला कारण है।

            The Downward Slide

            अंत में, याकूब ३:१५ में प्रेरित परिज्ञान के एक रुप के बारे में कहते है "यह ज्ञान वह नहीं जो ऊपर से उतरता है वरन सांसांरिक, और शारीरिक (प्राणिक) और शैतानी है।"

            याकूब यहाँ दर्शाता है एकगिरे हुए क्रमः को जो है - सांसारिक से फिर प्राणिक और फिर शैतानी।जब मसीह जन सांसारिक हो जाते है तो नित्यता के दर्शन कोखो देते हैं।वे इस जीवन के आगे देखने में असमर्थ होते हैः जीवन कीबाते जैसे सफलता, प्रसन्नता, धन, शारीरिक स्वास्थय। वे सिर्फ उसविश्वास पर रुचि रखते है जो उनके इस जीवन के लिए लागू होते हैं।

            ऐसे लोगों के लिए पौलुस कहते है "यदि हम केवल इसी जीवन में मसीहसे आशा रखते है तो हम सब मनुष्यों से अधिक अभागे है” (१कुरिन्थियों १५:१६)। ऐसे मसीही अपने आप को धनी एवं सफल समझतेहैं। परन्तु परमेश्वर उन्हे अभागा समझते हैं।

            सांसारिक के बाद अगला क्रम है प्राणिक का। प्राणिक होने काअर्थ है अंहमवादी, स्वार्थयुक्त। ऐसे लोगों के लिए मसीही विश्वास उनकेजीवन के कार्यों को प्राप्त करने के लिए एक माध्यम रह जाता है। वेसोचते है कि "भक्ति कमाई का द्वार है” (१ तीमुथियुस ६ः५)।

            प्राणिक दुष्टता के लिए मार्ग खोलती है यह एक महत्वपूर्ण कारणहै जिससे शैतान कलीसिया को अशुद्ध करता है। यह प्रश्न अक्सर पूछाजाता हैः क्या मनुष्य को शैतान के बन्धन से छुटकारा पाने की जरुरतहै? याकूब के शब्दों में इसका उत्तर मिलता है। यह गिरते हुये कम,सासांरिक से प्राणिक और फिर शैतानी प्रभाव शैतानी कार्यों का हर एकविश्वासी एवं पूरी कलीसिया पर प्रभाव होता है।

            पुनः स्थापित तालमेल

            बहुत से स्थानों में कलीसिया अधर्म से मिश्रित हो चुकी है। आत्मिकऔर प्राणिक के बीच कोई भेद नहीं समझाया जाता, जिससे, शैतानीबातों पर भी कोई रोक नही लगाया जाता। पवित्र आत्मा के यथार्थ प्रकटीकरण को छितराकर एक शैतानी प्रकटीकरण बना दिया।जिसके कारण बहुत से निष्कपट विश्वासी संशयात्मक और हक्केबक्के हो गये है।

            अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए चाहिए कि हमउत्पन्न करें उन विचारों को जो प्रभु के वचनों के बारे में है। हमें भेदसमझना हैं कि क्या आत्मिक है और क्या प्राणिक हैं। यह जानने केलिए एक ही तीक्ष्ण साधन है प्रभु का वचन।

            हम इस किताब में देखेंगे अति आवश्यक प्रभु के वचन को, परन्तु अभी हम स्वीकार

            करते हैं कि “परमेश्वर का वचन जीवित, प्रबल और हर एकदोधारी तलवार से भी बहुत चोखा हैं, और जीव, औरआत्मा को और गांठ गांठ, और गूदे गूदे को अलगकरके आर पार छेदता हैः और मन की भावनाओं और

            विचारों को जांचता है" (इब्रानियों ४:१२) ।

            Two Conditions

            और आगे इब्रानियों ५:१४ में, लेखक कहते है दो बातों को पूर्ण करें यदि हमें इस प्रकार के जाँच को प्रवृत्ति मे लाना हो।

            “पर अन्य स्थानों के लिये है, जीव के ज्ञानेन्द्रिय अभ्यास करते करते, भले बुरे में भेद करने के लिये पक्के हो गए हैं।”

            पहली शर्त यह है कि हम निरंतर भोजन करें सयानों केअन्न को जो पूरे पवित्रशास्त्र के अध्ययन के द्वारा मुमकिन हैं।दूसरी शर्त है कि हमें भले बुरे का विचार करने के लिएनिरन्तर अध्याय करना चाहिए। हमेशा हमें सर्तक रहना है, उनदैविक शक्तियों से जिनका सामना हमें दिन प्रतिदिन करना होता है।भले बुरे के भेद को जानना एक मसीही योद्धा के लिए उतना हीजरुरी है जितनी की प्रार्थना।

            यह पत्र मुझे मिला एक जर्मन मनोवैज्ञानिक द्वारा,

            जिसे अपने व्यक्तित्व में “आत्मिक" और "प्राणिक” के बारे में एक विशेषप्रकटीकरण था।

            What About You?

            रहा था, तब मसीही जीवन में पहली बार "आत्मिकहैन्स्" जो मुझ में है उसे देखा और मानो मैं एककुर्सी में खड़े होकर ऊँचाई से नीचे उस 'प्राणिकहैन्स्' के गिरते हुए स्मारक को देखा।पुनः स्थापित, यह मेरी आत्मिक भाग जो थी"आत्मिक हैन्स्” जीवित हुआ जब मैंने करीबपाँच हफ्ते पहले आपके उपदेश को सुना औरपवित्र आत्मा से निरंतर भरता गया। जो मेरेअन्दर "प्राणिक हैन्स्" था जो मेरे ज्ञान औरभावनात्मक स्थान थें, मैं इन्हें घसीटते हुए कूसतक ले गया।

            *Prayer Response

            आप समझ सकते है कि यह जो बदलाव मेरेजीवन में है जो फिर से एक 'त्रीतत्व' मनुष्य हुआउसने मेरे व्यवसाय को भी पूरी तरह परिवर्तितकर दिया। अब जब मे ४५ वर्ष का हूँ और मुझेअपने जीवन में पहली बार एक मनोवैज्ञानिकबनने के कुछ अच्छे प्रयोजन देखता हूँ।हैन्स् पी., जर्मनी।

            पुनरुथान से पहले हमें एक सच्चा आत्मिक देह प्राप्त नहीं होगा। परअब, हैन्स् की तरह परमेश्वर के आगे सेवा के लिऐ सर्मपित रह करतैयार रहे और अपने प्राण को अपनी आत्मा के आगे सर्मपित होनेके लिए प्रशिक्षित करें। अन्त में पौलुस के प्रोत्साहन का पालन करेंजो उन्होंने १ कुरन्थियों १६:१३-१४ मे की है "जागते रहो, विश्वासमें स्थिर रहों, पुरुषार्थ करो, बलवन्त होओ। जो कुछ करते हो प्रेमसे करो।" अब देखें किस प्रकार उस सेवा के स्तर को हम कायमरखते हैं।

            मैंने प्रार्थना की है
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            What People Say

            See how Are You Spiritual or Soulish? has impacted lives across the globe.

            "I've applied the Biblical principles on family relationships from this teaching, and it has completely restored harmony in our home. My teenagers and I now have meaningful conversations about faith, and my marriage has been strengthened in ways I never thought possible."
            Elena R., Brazil
            "The teachings on spiritual warfare completely transformed my approach to daily challenges. I used to feel overwhelmed by life's obstacles, but now I understand how to stand firm in faith. This teaching gave me practical tools I use every single day."
            Sarah K., California
            "After 20 years of struggling with unforgiveness, the Biblical principles shared in this teaching helped me release the bitterness I had been carrying. The step-by-step approach to forgiveness wasn't just theory—it actually worked in my life when nothing else had."
            Michael T., United Kingdom
            "As a new Christian, I was confused about many aspects of faith. These teachings provided clear, Scripture-based explanations that helped build my foundation. I'm especially grateful for how the content made complex concepts accessible without watering down the truth."
            Priya M., India
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            James L., Australia
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