परमेश्वर का वचन आपके लिए क्या करेगा - भाग 5

Teaching Legacy Letter
*First Published: 2015
*Last Updated: जनवरी 2026
10 min read
जो कुछ परमेश्वर का वचन हमें प्रदान करता है वह विचार करने और अभिलेखन के लिए एकअद्भुत अनुभव है। हम में से प्रत्येक व्यक्तिगत लाभ की एक लंबी सूची बना सकते हैं, जो हम परबाइबल के प्रभाव से हमारे जीवन में आ गए हैं। लेकिन इस श्रृंखला 'परमेश्वर का वचन आपके लिएक्या कर करेगा' में, हम इस व्यापक गुंजाइश की जाँच करते रहे थे कि जब हम वचन का अध्ययनकरते और उसे लागू करते हैं तो परमेश्वर का वचन हमारे लिए क्या पूरा करता है।
इस विषय पर हमारा श्रृंखला के चौथे शिक्षण में, मैं ने समझाया, कि अपने वचन के द्वारा परमेश्वरहमें नये जीवन को बनाए रखने और मजबूत करने के लिए आत्मिक पोषण प्रदान करता है जिसेहमने नया जन्म के द्वारा पाया है। इस शिक्षण विरासत पत्र में, मैं आगे के दो और प्रभावों की जांचकरने जा रहा हूँ जो आपके जीवन पर परमेश्वर के वचन का होगाः शुद्धीकरण और पवित्रीकरण
वचन के द्वारा धोना
इस अध्ययन से हम इफिसियों ५ को देखकर शुरू करेंगे। यद्यपिपौलुस पतियों को इन शब्दों से संबोधित कर रहा है, मुख्य जोरअपनी पत्नियों के प्रति मानवीय पतियों के संबंध के बारे मेंनहीं है। दरअसल, यह दूल्हे के रूप में मसीह का अपनी दुल्हन,कलीसिया के साथ संबंध के बारे में है। इस प्रसंग में, पौलुसहमें दो बहुत ही महत्वपूर्ण प्रावधान बताता है जिसे यीशु मसीहने – हमारे मुक्तिदाता और प्रभु, और कलीसिया के दूल्हे के भीरूप में – अपने लोगों के लिए किया है। यहाँ पौलुस कहता है-
हे पतियों, अपनी अपनी पत्नी से प्रेम रखो, जैसा मसीह ने भी
कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया।कि उस को वचन के द्वारा जल के स्नान से शुद्ध करके पवित्रबनाए। और उसे एक ऐसी तेजस्वी कलीसिया बनाकर अपने पासखड़ी करे, जिस में न कलंक, न झुर्री, न कोई ऐसी वस्तु हो,
बरन पवित्र और निर्दोष हो।
यहाँ हम दो आवश्यक प्रावधानों को देखते हैं जिसे यीशु नेअपने लोगों, कलीसिया की भलाई के लिए बनाया है। पहलायह है कि यीशु ने अपने आप को उसके लिए दे दिया। उसनेक्रूस पर, अपना लहू बहाया ताकि उसके लोग छुड़ाए जायें। इसलिए, यीशु मसीह का पहला प्रावधान उसके लहू के द्वारासंपूर्ण छुटकारा है। उसने स्वयं के लिए हमारा छुटकारा किया है।लेकिन किस प्रयोजन के लिए? उपरोक्त परिच्छेद हमें बताता हैकि उसने अपने लहू से हमें छुड़ाया है ताकि वह आगे कुछऔर कर सके कि वह हमें वचन के साथ जल की धुलाई केमाध्यम से पवित्र करे। यहाँ जो शब्द उपयोग में लाया गया हैवह, जाहिर है, परमेश्वर का वचन है। ये पद उसी विचार कोप्रकट करते हैं धर्मशास्त्र में अन्य स्थानों पर पाया जाता है,जहाँ परमेश्वर के वचन की तुलना शुद्ध जल से किया गयाहै। जैसा कि यह हम पर कार्य करता है, हमें शुद्ध और हमेंपवित्र करता है। इस इफिसियों का प्रशस्ति पत्र इंगित करता हैकि यीशु मसीह के ये दोनों प्रावधान हमारे लिए आवश्यक है।
पानी क्या करता है
सबसे पहले, हमें पता होना चाहिए कि हम यीशु के खून केद्वारा छुड़ाए गए हैं। लेकिन यह अपने आप में, सबकुछ नहींहै। इसके अलावा, हमें अपने दिलों, मनों और जीवनों मेंउसके वचन का काम होने के लिए स्वयं को समर्पित करनाचाहिए कि वह हमें पवित्र करे ताकि हम पवित्र और निर्दोषहो सकें। यह खोज एक जबरदस्त लक्ष्य है जिसे परमेश्वरहमारे लिए तैयार किया है। लेकिन चूँकि परमेश्वर ने लक्ष्यनिर्धारित किया है, हम जानते हैं कि उसने लक्ष्य तक पहुँचनेका साधन भी दिया है।
At this point, it is important for us to clearly understand the difference between cleansing and sanctification. The word “cleansing” is a familiar word—even in daily life. It means to make clean or pure. The first operation of God’s Word upon us is purification. Through His Word, God purifies our minds, our hearts, our thoughts, and our motives. He washes away that which is sinful, unclean and degraded.
हालांकि, परमेश्वर हमें पवित्र करता है। "पवित्र करना"धार्मिक शब्द प्रतीत होता है जो आम लोगों को डराता है।मुझे आपको यह इस तरह से समझाने दें: कोई भी शब्दजिसके अंत में करण आता है उसका अर्थ प्रथम आने वालेशब्द का करना है, अतः शुद्धीकरण का अर्थ है, 'शुद्ध करना'।उसी प्रकार, पवित्रीकरण का अर्थ है, "पवित्र बनाना"। आप पूछसकते हैं, "दुनिया में पवित्र करने का क्या मतलब है? यहसंत शब्द के ही समान है। और 'संत' क्या है? धर्मशास्त्र कीमूल भाषा में, यह उसके लिए प्रयुक्त है जो पवित्र है।
जाहिरहै, पवित्रीकरण का अर्थ है "हमें' पवित्र बनाना।"अब, पवित्रीकरण के दो पहलू हैं: पहला, नकारात्मक, तबसकारात्मक। पवित्रीकरण का नकारात्मक पहलू एक अलगाव है।इसका मतलब पाप से अलग होना है, सब अशुद्ध और परमेश्वरके लिए अस्वीकार्य बातों से अलग रहना। इसके अलावा,हालाँकि, पवित्रीकरण का एक सकारात्मक पहलू भी है। इसकाअर्थ परमेश्वर की पवित्रता का भागीदार बनना है-अर्थातपरमेश्वर की पवित्रता से पवित्र बनना। इखाबियों १२ अध्याय,१० और १४ पदों में, हम यह स्पश्टतः देखते हैं। लेखक हमारेमानवीय पिताओं के अनुशासन और परमेश्वर, हमारे स्वर्गीयपिता के अनुशासन, बीच के संबंध के बारे में बात करता है।वह कहता है
वे (हमारे मानवीय पिता) तो अपनी अपनी समझ के अनुसार
थोड़ दिनों के लिये ताड़ना करते थे, पर यह तो हमारे लाभ के
लिये करता है, कि हम भी उस की पवित्रता के भागी हो जाएं।
हम यहाँ देखते हैं कि हमारे जीवन में परमेश्वर के काम औरअनुशासन का परम उद्देश्य यह है कि हम उसकी पवित्रता मेंसाझी हो सकें। पवित्रता का यह अनुभव केवल नकारात्मकपरहेज नहीं है पाप और अशुद्धता से। सकारात्मक पक्ष पर, यहवास्तव में हमारे भीतर बहुत प्रकृति और ईश्वर की पवित्रता,प्राप्त कर रहा है ताकि हम परमेश्वर की पवित्रता के साथ पवित्रहो जाते हैं। इस लक्ष्य का उद्देश्य क्या है? हम पद १४ मेंइसका जवाब देखखते हैं। इसी संदर्भ में इब्रानियों का लेखककहता जाता है.
सब से मेल मिलाप रखने, और उस पवित्राता के खोजी हो जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा।
यह एक बहुत ही गंभीर सच है अगर हमें कभी परमेश्वर कोदेखखना है तो हमें अवश्य ही पवित्र हो जाना चाहिए। यह कैसेसंभव है? हमारे लिए परमेश्वर का प्रावधान हमें 'जल औरवचन के स्नान' से पवित्र करना है। उसके वचन हमें अब्छीतरह धोता और पूरी तरह पवित्र भी करते हुए - शुद्ध औरपवित्र दोनों करता है।
धर्म का जाल
परमेश्वर के वचन रूपी जल से धोने का सिद्धांत हमारेआत्मिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, जिस तरहपरमेश्वर हमें पवित्र करने के लिए कार्य करता है और अकसरधर्म के तरीकों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है। धर्म में बाहरसे काम करने का आदी है। यह रूपरेखा के साथ शुरू होताहै और कहता है, "यह करो और यह मत करो और तब तुमपवित्र हो जाओगे।" मत्ती २३ में यीशु इस धार्मिक पवित्रता की बात करता है - जहाँ वह इसे अपर्याप्त और असंतोषजनककह कर खारिज करता है। यहाँ हमारे प्रभु द्वारा दी गई उसपवित्रता का वर्णन है जिस तरह की शास्त्रियों और फरीसियोंकी थी। यीशु कहते हैं:
हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम एक जन
को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरतेहो, और जब वह मत में आ जाता है, तो उसे अपने से दूनानारकीय बना देते हो॥हे अन्धे अगुवों, तुम पर हाय, जो कहते हो कि यदि कोईमन्दिर की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु यदि कोई मन्दिर
के सोने की सौगन्ध खाए तो उस से T जाएगा।
यीशु उन से जो कुछ कह रहा था, वह यह & “तुमफरीसियों, तुम लगातार बरतन के बाहर की सफाई पर कामकर रहे हो, लेकिन तुम उसे साफ नहीं किया है जो अंदर है।और भले ही तुम कितनी भी कोशिष कर लो, जो कुछ अंदरहै वह पुन: बाहर को अशुद्ध करने जा रहा है।” इस प्रकार केधर्म की गठती यह है कि यह लोगों को बाहर से काम करकेभीतर पवित्र बनाने की कोशिष करती है। यह दृष्टिकोण आजकलीसिया के विभिन्न भागों में पाया जाता है जहाँ मसीहियोंसे कहा जाता है कि. पवित्रता मनुष्यों द्वारा बनाए गए कुछनियमों का पालन करके प्राप्त किया जा सकता है। यहाँ उसदृष्टिकोण के साथ समस्या यह है. यद कभी भी मनुष्य कोभीतर से नहीं बदलता।
इसके विपरीत, हम मत्ती ५७ में यीशु, के शब्दों से देखतेहै कि हमें पवित्र बनाने का तरीका भीतर से बाहर की ओरकाम करना है:
धन्य हैं वे, जिन के मन शुद्ध हैं, क्यों कि वे परमेश्वर कोदेखें
यहाँ यीशु यह कह रहा है कि अगर आपका दिल शुद्ध है,तो यह स्थिति आप को ठीक परमेश्वर की उपस्थिति में लेजाएगा। यदि आपका मन शुद्ध हैं, तो फलस्वरूप आपकेशब्द, विचार, और कार्य सभी शुद्ध होगा। नीतिवचन ४:२३हमें याद दिलाता है कि जीवन की सारी अच्छी बातें हृदय सेआती हैं। यदि आपका हृदय शुद्ध है तो आपका जीवन शुद्धहोगा। हालाँकि, बिना शुद्ध हृदय के एक शुद्ध जीवन असंभवहै।
अपने मनों को नया करना
हम शुद्ध मन कैसे विकसित कर सकते हैं? हमें नया करने कापरमेश्वर का तरीका हमारे मन को शुद्ध बनाना है- हमारेसोचने के तरीके को बदलकर। रामियों १२:२ में यह स्पष्ट रूपसे कहा गया है.
और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये
हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुमपरमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से
मालूम करते रहो।.
पौलुस के इन शब्दों में आज्ञा स्पष्ट है। हमें दुनिया के लोगोंके समान नहीं होना हैं, जो यीशु मसीह की सेवा नहीं करतेहैं और परमेश्वर का सम्मान नहीं करते है। हम भिन्न होना हैं।हम बदला हुआ होना हैं। लेकिन यह बदलाव कैसे आता है?हमें बदलना है- बाहरी नियम कानूनों से नहीं – लेकिनहमारे मनों के नये हो जाने से। हमें जिस परिवर्तन की जरूरतहै वह हमारे भीतर से आना है। इस रोमियों १२ के भाग में,पौलुस हमें बताता है कि एक बार जब हमारा मन नया होजाता है तो हम साबित कर सकेंगे, अर्थात अनुभव सेमालूम करना कि कि क्या भला, ग्रहणयोग्य और सिद्ध है।सारांश में, हम "यदि आपका मन शुद्ध है तो फलस्वरूप आपके शब्द, विचार और कार्य सभी शुद्ध होंगे।" जानेंगे कि हमारे जीवनों के लिए परमेश्वर की वास्तविक इच्छा क्या है। कृप्या ध्यान दें कि परमेश्वर की इच्छा उस मन पर प्रकट नहीं की जाती है जो नया नहीं किया गया है। केवल नया किया गया म नही परमेश्वर की इच्छा की प्रशंसा कर सकता है और उसमें प्रवेश कर सकता है।
अब एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न। परमेश्वर का वचन किसप्रकार हमारे मनों का नया करता है?मैं सलाह दूँगा कि हम तीन चरणों में इस नया करने कीप्रक्रिया पर विचार करेंगे। सबसे पहले, वचन अशुद्धता को दूरकरता है। यह हमें कलंक, अशुद्ध विचारों, गंदे विचारों औरबुरी बातचीत से शुद्ध करता है। यह उन बातों को हमसे दूरकरता है।
दूसरा, यह हमारे मूल्यों में परिवर्तन लाता है। हम अलग अलगमानकों के द्वारा संचालित होने लगते हैं। हम अलग ढंग सेचीजों को देखने लगते हैं। हम मुद्दों का मूल्यांकन उस तरहकरने लगते हैं जिस तरह परमेश्वर करता है। हम पाप को पापऔर धर्म को धर्म कहने लगते हैं। हम उस बात के लिएफैंसी मनोवैज्ञानिक शब्द का उपयोग करना बंद कर देते हैंजिससे परमेश्वर नाखुश है।
तीसरा, परमेश्वर के वचन, हमारे भीतर काम करते हुए, हमेंपरमेश्वर के उद्देश्यों के साथ एकरूपता बनाने का कारण बनताहै। हमारी मंशा बदल जाती हैं। हम अब मुख्य रूप से इस बातसे चिंतित नहीं रहते हैं कि हम क्या चाहते हैं। इसके बजाय,हमारी सबसे बड़ी इच्छा यह हो जाता है कि परमेश्वर क्याचाहता है। हम पृथ्वी पर परमेश्वर के उद्देश्यों के साथ एकरूतहो जाते हैं। प्रभु की प्रार्थना में, यीशु, ने हमें कहना सिखाया"तेरा राज्य आए।" और यह हमारे जीवनों की अधिभावीमकसद और इच्छा हो जाती है। हमारी सबसे बड़ी इच्छा पृथ्वीपर परमेश्वर के राज्य स्थापित होते देखना हो जाता है। हमारेजीवन में इसी प्राथमिक मकसद के साथ इसलिए प्राथमिकसाथ, हम भिन्न रूप से नहीं जी सकते हैं।
जब हमारे मन में ये सभी परिवर्तन आ गए हैं तो यह हमारेबाहरी व्यवहार में परिवर्तन में महसूस किया जाएगा। जाहिर है,परमेश्वर अपने वचन के द्वारा हमारे मन के नवीकरण के द्वाराहमारे जीवन में प्रक्रिया शुरू करता है।
क्या आपने अपने जीवन में इन परिवर्तनों को लाने के लिए रमेश्वर से कहा है? क्या आप यकीनन जानते हैं कि आपनेपरमेश्वर के वचन को आपको शुद्ध और पवित्र करने - उसकेराज्य को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता बनाने के लिए अपनेमन को नया करने - की अनुमति दी है?यदि आप सुनिश्चित करना चाहते हैं, कि यह आपके लिए हुआ है,या अगर आप इन सिद्धांतों के लिए अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टिकरना चाहते हैं, कृपया मेरे साथ निम्न प्रार्थना में शामिल हों।
*Prayer Response
प्रभु यीशु, मैं इस शिक्षा के द्वारा प्राप्तप्रत्येक सिद्धांत पर पूरी तरह चलना चाहताहूँ। मैं आपका धन्यवाद करना चाहता हूँ किआपने मुझे अपने लहू के द्वारा बचाया है।कृपया अपने वचन के द्वारा धोकर मुझे पूरीतरह शुद्ध और पवित्र कीजिए। आपकी नजरमें अपने आप को धार्मिक दिखाने की मेरीप्रवृत्ति से कृष्या मुझे बचाइये। मेरे हृदयको शुद्ध करते हुए, और फिर मेरे मन कोनया करते हुए, मुझमें मेरे भीतर से अपनीप्रक्रिया प्रारंभ कीजिए। इस प्रक्रिया के लिएमैं स्वयं को पूरी तरह खोलता हूँ और मैंस्वयं को पुनः आपके प्रति और पृथ्वी पर- इसी समय मुझमें - आपके राज्य कीस्थापना के लिए समर्पित करता हूँ। अपनेबहुमूल्य वचन के द्वारा आप मुझमें जोकार्य कर रहे हैं उसके लिए प्रभु, धन्यवाद।आमीन।
कोड: TL-L106-100-HIN