क्योंकि सकेत है वह फाटक और सकरा है वह मार्ग जो जीवन को पहुँचाता है .... (मत्ती 7:14) यहाँ यीशु मसीही जीवन को दो क्रमिक चरणों में दर्शाते हैं: पहला एक सीधा द्वार है जिसमें से हमें प्रवेश करना चाहिये, दूसरा एक संकीर्ण मार्ग है जिस पर हमें अवश्य चलना चाहिये। "द्वार" एक एकल प्रवेश के अनुभव को दर्शाता है-जिसे बाइबल "बचाया जाना" या नया जन्म पाना कहती है। "मार्ग" नये प्रकार के जीवन का प्रतिनिधित्वि करता है जिसमें यह प्रवेश अनुभव हमें ले जाता है।

वास्तव में यीशु हमें इन दोनों चरणों को एक दूसरे से अलग करने के बारे में चेतावनी देता है। सकरे मार्ग का एकमात्र प्रवेश सीधे मार्ग से ही है। बिना नया जन्म पाये हम मसीही जीवन जीना प्रारंभ भी नहीं कर सकते हैं। दूसरी ओर द्वार से प्रवेश करने का अभिप्राय मार्ग पर चलना है। जीवन की परिपूर्णता जिसमें यीशु हमें आमंत्रित करता है, वह केवल द्वार से प्रवेश करना मात्र नहीं है परन्तु उसके पश्चात् मार्ग में चलना है जिसमें वह द्वार हमें पहुँचाता है।

मार्ग

यह सबसे महत्वपूर्ण है कि हम मसीही जीवन को मात्र "बचाये जाने" या "एक मसीही होने" के रूप में नहीं देखते हैं। कलीसिया के प्रारंभिक शुरुआत में मसीहियत शब्द अभी तक गढ़ा भी नहीं गया था। जिसे मसीहियत कहते हैं उसे उन दिनों "मार्ग" कहा जाता था। उदाहरण के लिये, जब शाऊल दमिश्क के लिए निकला तो उसने दमिश्क के आराधनालय के नाम पर पत्र माँगा ताकि "क्या पुरूष, क्या स्त्री, जिन्हें वह इस पंथ पर पाए, उन्हें बान्धकर यरूशलेम में ले आए।" (प्रेरितों 9: 2)। बाद में, जब पौलुस कुछ समय इफिसुस में प्रचार कर चुका तो परिणाम के बारे में दो बातें कही गई हैं: " कितनों ने कठोर होकर उस की नहीं मानी बरन लोगों के साम्हने इस मार्ग को बुरा कहने लगे" और "पन्थ के विषय में बड़ा हुल्लड़ हुआ।" (प्रेरितों 19:9; 23)। (अन्य उदाहरणों के लिये जहाँ मसीहियत को मार्ग कहा गया है, प्रेरितों 22:4, 24:14,22 देखें ।)

धर्मशास्त्र के अन्य कई भागों में यही विचार प्रस्तुत किया गया है। उदाहरण के लिए, अथेने के पुरुषों से पौलुस ने कहा, "क्योंकि हम उसी (परमेश्वर) में जीवित रहते, और चलते - फिरते, और स्थिर रहते हैं (प्रेरितों 17:28)। यदि हम "जीवित" हैं तो हम "आगे बढ़ेंगे"। जीवन कभी भी स्थिर या स्तब्ध नहीं है। इसमें हमेशा बढ़ती, गति, विकास, प्रगति होती है। नीतिवचन 4:18 हमें बताता है, "परन्तु धर्मियों की चाल उस चमकती हुई ज्योति के समान है, जिसका प्रकाश दोपहर तक अधिक अधिक बढ़ता रहता है।" इस मसीही जीवन के मार्ग में हम लगातार पूर्ण ज्योति की ओर आगे बढ़ रहे हैं। जब हम मार्ग में प्रत्येक कदम रखते हैं तो प्रकाश और उज्जवल हो जाता है। कल की रोशनी आज के लिए पर्याप्त नहीं है। स्थिर खड़े रहने के लिये कोई अवसर नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता अतीत कैसा था, भविष्य अब भी उज्ज्वल है।

क्या मसीही मार्ग में लगातार आगे बढ़ने की यह चुनौती कठिन और माँग करने वाली प्रतीत हो रही है? मुझे आपको धन्य निश्चयता के वचन कहने दीजियेः हमसे कभी भी अकेले इस पथ पर चलने के लिए नहीं कहा गया है। प्रभु स्वयं हमारे हर कदम पर हमारे साथ होगा। पुरानी वाचा के अंतर्गत उसने अपने लोगों को यह गंभीर वादा दियाः

"मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूँ, इधर उधर मत ताक, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूँ, मैं तुझे दृढ़ करूँगा और तेरी सहायता करूँगा, अपने धर्ममय दहिने हाथ से मैं तुझे सम्हाले रहूँगा' (यशायाह 41:10)।

नई वाचा के तहत मसीह स्वयं के द्वारा हमसे इसकी पुष्टि की गई है:

"देखो, मैं जगत के अंत तक सदैव तुम्हारे संग रहूँगा" (मत्ती 28:20)।

क्या दो जन साथ चल सकते हैं?

तो, अवश्य ही हमें परमेश्वर के साथ चलना सीखना चाहिए। इसमें उसके साथ एक सतत व्यक्तिगत संबंध का तात्पर्य है। अमोस 33 प्रश्न करता है: "यदि दो मनुष्य परस्पर सहमत न हों, तो क्या वे एक संग चल सकेंगे?" निहितार्थ यह है कि इसका उत्तर न है। परमेश्वर के साथ चलने के लिए अवश्य ही हमें उसके साथ "सहमत" होना चाहिए। हालाँकि, स्वभाव से, हम परमेश्वर के साथ सहमत नहीं हैं।

इसके विपरीत, पौलुस रोमियों 8:7 में हमें बताता है कि "क्योंकि शरीर पर मन लगाना तो परमेश्वर से बैर रखना है, क्योंकि न तो परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन है, और न हो सकता है।" "भारीर पर मन लगाना" इस बात को सूचित करता है कि विचार और मनोवृत्ति जो परमेश्वर के अनुग्रह से पूर्व हम सबके लिये सामान्य होती है, हमें बदलना प्रारंभ करती है। ये सीधे परमेश्वर के विरोध में होते हैं, और कोई सुलह संभव नहीं है।

यशायाह 55:8-9 में परमेश्वर हमसे स्पष्ट तौर पर कहता है: "क्योंकि यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं है, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है। क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है।" इसके साथ, परमेश्वर नहीं बदलेगा। मलाकी 3:6 में वह कहता है, "मैं यहोवा बदलता नहीं,"

चूँकि परमेश्वर के तरीके और विचार हमारे से काफी अलग हैं, और चूँकि परमेश्वर नहीं बदलता है, फिर केवल एक ही संभावना शेष बचता है। यदि हमें परमेश्वर के साथ चलना है तो हमें अवश्य ही बदलना चाहिएः "दुष्ट अपनी चालचलन और अनर्थकारी अपने सोच विचार छोड़कर यहोवा ही की ओर फिरेगा" (यशायाह 55:7)। यह हमारे तरीके और विचार हैं जिन्हें अवश्य ही बदलना चाहिये। इस बदलाव में एक पूर्ण समर्पण और परमेश्वर के लिए हमारी पूर्ण प्रतिबद्धता की आवश्यकता है।

किसका स्वामित्व?

रोमियों के पहले ग्यारह अध्यायों में, पौलुस मसीह में विश्वास के माध्यम से हमारे छुटकारे के लिए परमेश्वर के पूरे प्रावधान का वर्णन करता है। फिर वह इन शब्दों के साथ 12 अध्याय प्रारंभ करता है, "इसलिए हे भाईयों, मैं तुम्हें परमेश्वर की दया स्मरण दिलाकर..।" "इसलिए" में क्या निहित है? यह उस प्रतिक्रिया को इंगित करता है जिसकी हमसे उस बात के प्रकाश में अपेक्षा है जो कुछ परमेश्वर ने हमारे लिए किया है। यह क्या प्रतिक्रिया है? यह आगे कहा गया है। "..अपने शरीरो कों जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओः

यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है। और इस संसार के सदृश्य न बनो। परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाये, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो
9
शेयर करना