• मारे धार्मिक लड़ाई में पवित्र आत्मा का सबसे महत्वपूर्ण सेवकाई 'यह है कि वह हमारा मार्ग दर्शन करता हैं।

हमारे जीवन का मार्ग दर्शन करने के लिए परमेश्वर पिता ने उसे भेजा है। यीशु ने कहा,

“परन्तु जब वह अर्थात 'सत्य का आत्मा' आयेगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा, परन्तु जो कुछ सुनेगा वहीं कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना १६:१३) ।

पौलुस यह बताते है कि किस प्रकार हम परमेश्वर की सन्तान बन कर जीयेंः वह है पवित्रआत्मा के द्वारा चलाए चलने से ।

“इसलिए कि जितने लोग परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते है, वे ही परमेश्वर के पुत्र है" (रोमियों ८ः१४)।

जिस ‘काल’ का यहाँ उपयोग किया गया है वह है स्थायी वर्तमान काल। जो कोई निरंतर परमेश्वर के आत्मा के चलाये जाते है वे ही परमेश्वर के पुत्र है। ‘पुत्र’ वाक्य संबोधित करती है परिपक्वता को। यह किसी दुधपिउवे बच्चे के लिए नहीं कहा गया परन्तु एक बड़े व्यक्ति के लिए। यूहन्ना ३ में यीशु ने इसे स्पष्ट किया कि परमेश्वर की सन्तान बनने के लिए हमें उसके आत्मा के द्वारा नये सिरे से जन्म लेना होगा। परन्तु एक बार इस नये सिरे से

जन्म लेने के बाद हमें बढ़ना है, और परिपक्व व पूर्ण बनना हैं और निरंतर पवित्र आत्मा द्वारा चलाए चलना है।

धार्मिकता को प्राप्त करें

पवित्रशास्त्र परमेश्वर से धार्मिकता को प्राप्त करने के दो तरीकों को प्रकट करता हैः नियम और अनुग्रह- ये दोनों परस्पर भिन्न है। अगर आप धार्मिकता को व्यवस्था से प्राप्त करने की कोशिश करेंगे, तो आप इसे अनुग्रह में प्राप्त नहीं कर पायेंगे। और यदि आप धार्मिकता को अनुग्रह से प्राप्त करने की कोशिश करेंगे, तो आप इसे व्यवस्था का पालन करते हुए प्राप्त नहीं कर पायेंगे। इस बात को जोर देना अत्यावश्यक है क्योंकि मैंने देखा है कि कई मसीही जन नियम और अनुग्रह को मिलाने की कोशिश करते है। वे परमेश्वर के आगे सही साबित होने के लिए कोशिश करते हैं कुछ व्यवस्थाओं और कुछ अनुग्रह के द्वारा।

परन्तु इसकी सच्चाई यह है कि वे न तो अनुग्रह के बारे में जानते है और न ही व्यवस्था के विषय में। ‘व्यवस्था' एक आदेशों का क्रम है जिसे आपको कायम रखना है।

अगर आप सारे आदेशों का हर समय पालन करेंगे तो आपको धार्मिकता प्राप्त होगी। 'अनुग्रह' जो दूसरी तरफ, कुछ ऐसा है जिसे हम अर्जित नहीं कर सकते। परमेश्वर द्वारा अनुग्रह को प्राप्त करने का एक ही मार्ग है, जो इफिसियों २:८ में बताया गया है :

“क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।"

व्यक्तिगत तौर पे मैं यह यकीन करता हूँ कि धार्मिकता को विश्वास से प्राप्त करने का रास्ता स्वयं परमेश्वर ने बनाया। और मेरे समझ से, हर धर्म में धार्मिकता को किसी कार्य के करने से ही प्राप्त होता है। हर एक धर्मों में अलग अलग ज़रूरतें होती है परन्तु इन सबका मूल अर्थ एक ही होता है जो हैः “मैं धार्मिक बन सकता हूँ अगर मैं यह सब करूँ और वह सब न करूँ तो।”

इसका मतलब यह हुआ कि अगर हम मसीही विश्वास को सही रीति से जानें तो पायेंगे कि यह सबसे अनोखा है। ऐसा कोई धर्म नहीं जो धार्मिकता को अनुग्रह द्वारा हमें देता है और वह अनुग्रह जो सिर्फ विश्वास के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। परन्तु जब हम परमेश्वर के अनुग्रह को गले लगाते है तो वह हमें सशक्त बनाता है एक ऐसा जीवन पाने के लिए जो पाप के अधिकाारों से मुक्त हो। रोमियों ६:१४ मे, पौलुस उन लोगों से बातें करता है जो परमेश्वर के अनुग्रह को प्राप्त किये हुए हैः

“तुम पर पाप की प्रभुता न होगी, क्योंकि तुम व्यवस्था के अधीन नहीं बरन अनुग्रह के अध् तीन हो।”

ध्यान दें कि यह एक दूसरे से भिन्न है। अगर आप व्यवस्था के अधीन है, तो आप अनुग्रह के अधीन नहीं है। अगर आप अनुग्रह के अधीन है, तो आप व्यवस्था के अधीन नहीं है। आप एक ही समय में दोनों के अधीन नहीं हो सकते।

मैंने यह भी देखा है कि पौलुस कहता है पाप का अधिकार तुम पर न होगा क्योंकि तुम नियम के अधीन नहीं हो। अगर हम ध् गार्मिकता को व्यवस्था का पालन द्वारा प्राप्त करने की कोशिश करेंगे तो हम कभी पाप के चंगुल से बच नहीं पायेंगे।

आयें एक और बार देंखें रोमियों ८ः१४ को :

“इसलिए कि जितने लोग परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते है, वे ही परमेश्वर के पुत्र है।

” क्या हम एक आदेशों के क्रम का पालन करते हुए परमेश्वर के सन्तान बनकर जी रहें है? नहीं! हम परमेश्वर की सन्तान बनकर जी रहें है जो पवित्र आत्मा के चलाए चलते है। यही एक तरीका है परमेश्वर के परिपक्व सन्तान बनकर जीने का ।

अब आयें देखें गलातियों ५ः१८ को :

‘और यदि तुम आत्मा के चलाए चलते हो, तो व्यवस्था के आधीन न रहे।’

आप परमेश्वर के पुत्र बनेंगे जब पवित्र आत्मा आपको चलायेगा। और अगर आप आत्मा के द्वारा चलाए जा रहे हैं तो आप व्यवस्था के अधीन नहीं हैं।

स्वयं को मसीही बताने वाले बहुत से लोगों के लिए ‘आदेशों का क्रम’ मानों एक बैसाखी है और वे अपने आपको उस पर निर्भर रहकर लंगड़ाते हुए चलते है। परमेश्वर कहता है, “अपने बैसाखी को फैंक दो और मुझ पर भरोसा रखो।” मैंने यह पाया है कि परमेश्वर के अनुग्रह पर पूर्ण रूप से भरोसा करने का विचार लोगों को भयभीत करता है। हम सब चाहते है कि थोड़े से आदेशों के क्रम पर निर्भर रहें। परन्तु यह कार्य नहीं करती। हमें पूर्ण रूप से पवित्र आत्मा पर निर्भर होना होगा।

धार्मिकता और पवित्रताई के लिए परमेश्वर का मार्ग कोई संघर्ष नहीं, परन्तु समर्पण के साथ-पवित्र आत्मा के लिए समर्पित होकर हैं। आप अपनी तरफ से सारे प्रयत्न करने के पश्चात यह कहें, “पवित्र आत्मा अब आप अधिकार लें। मैं इस परिस्थिति का सामना नहीं कर सकता-परन्तु आप कर सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि आपको स्वइच्छा शक्ति की जरूरत नहीं है। परन्तु इसका अर्थ यह है कि आप अपनी स्वइच्छा शक्ति को अलग तरीके से प्रयोग करें। आप अपनी स्वइच्छा शक्ति को स्वयं करने के लिए प्रयोग न करें, परन्तु पूर्ण रूप से पवित्रआत्मा पर भरोसा करें।

प्राकृतिक रूप से मैं स्वतंत्र हूं और एक सामर्थी सोच वाला पुरूष हूं। कभी भी जब मैं समस्या में पड़ता हूं, तो मेरी प्राकृतिक प्रवृति यह कहती है कि मैं स्वयं इसका हल निकालूं। मुझे इस प्रवृति से बाहर निकलने में वर्षों लगे और मैनें ऐसा करना छोड़ दिया। मैनें यह कहना शुरू किया कि, “प्रभु, आपका हल क्या है?” अधिकतर तौर से परमेश्वर का हल मेरी सोच से बिलकुल अलग था। ऐसा हल जो मैं कभी सोच भी नहीं सकता था। मसीही जीवन एक संघर्ष भरा जीवन नहीं है, यह एक समर्पण का जीवन है उस पवित्र आत्मा के लिए जो हम में वास करता है।

पौलुस इसे रोमियों ७ में एक उदाहरण के द्वारा समझाते हुए कहते हैं जो विवाह संबध के बारे में है। आपके जीवन के फल आपके परिश्रम से पता नहीं चलता, परन्तु उस व्यक्ति से जिससे आपका विवाह हुआ है। अगर आपका विवाह आपके सांसारिक प्रकृति से हुआ है। तो आप सांसारिक कार्यों को उत्पन्न करेंगे। परन्तु यही पवित्र आत्मा के द्वारा आप जी उठे मसीह में एक हुए है, तो उस एकता के द्वारा आप आत्मा के फल को उत्पन्न करेंगे।

जुडे रहना

यीशु अपने और हमारे संबध की तुलना एक दाखलता और उसकी डाली से करतें हैंः

“सच्ची दाखलता मैं हूं; और मेरा पिता किसान है” किसान वह है जो छांटता है।

In verses 4 and 5, Jesus goes on to say to His disciples:

“तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते। मैं दाखलता हूँः तुम डालियां हो; जो मुझ में बना रहता है, और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।”

कठिन परिश्रम करने से भी दाखलता की डालियां अंगूर नहीं देती। वे प्रतिज्ञा नहीं करते और कहतेः “अब मैं अंगूर उत्पन्न करूंगा।” वे जुडे रहते हैं डालियों से जिनमे जीवन बहता हैं और यही जीवन डालियों में पहुंचता है और उचित प्रकार के फलों को उत्पन्न करता है। यीशु ने कहा, “मैं दाखलता हूं और तुम डालियां। अगर तुम मुझ में बने रहोगे तो बहुत सा फल लाओगें।”

और यीशु छांटने के विषय में बताते हैं जब किसान दाखलता को छांटता है तो वह बहुत बेरहम होता है। वह डालियों को तने के साथ तक काट देता है। आप सोचेगें शायद अब यह दाखलता कभी फल नहीं देगा। परन्तु अगले वर्ष वह पहले से ज्यादा फलों को उत्पन्न करेगा।

हमारा सबसे दर्दनाक संघर्ष यह है कि हम किस प्रकार फल उत्पन्न करें। इस वक्त शायद परमेश्वर आपको छांट रहा हो। आप हिम्मत न हारें। यह न कहें कि “यह मेरे साथ कैसे हो सकता है?” सिर्फ समर्पण करें। उस किसान के आगे समपर्ण करें।

ईश्वरत्व के तीनों व्यक्ति फल उत्पन्न करने की प्रक्रिया में जुडे हुए हैं। पिता परमेश्वर किसान है। यीशु दाखलता है। पवित्र आत्मा वह जीवन जो दाखलता से डालियों तक पहुंचता है। पवित्र आत्मा ही वह है जो फल उत्पन्न करता है। वह फल हमारे परिश्रम की नहीं और न ही हमारे धर्म की है। वह फल पवित्र आत्मा का है।

एक नक्शा या एक मार्ग दर्शक?

मैं आपको एक छोटा सा दृष्टांत बताना चाहूंगा जो इस बात को और स्पष्ट रूप से समझने में सहायता करेगी। मैं यह स्वयं के अनुभव से बता रहा हूं। मैं जानता हूं कि परमेश्वर को अपने परिश्रम से प्रसन्न करने के लिए मुझे कितना कठिन संघर्ष करना पड़ा। अधिकतर समय मैं ज्यादा “धार्मिक” बनने की कोशिश करता था। परन्तु उन समयों में मैंने अपने आप को घायल पाया क्योंकि मुझे यह नहीं पता था कि आगे मुझे क्या करना है। परन्तु मैंने यह सीख लिया कि यह सब सिर्फ उस प्रक्रिया के अंश है जो यीशु के साथ चलने में मदद करता है।

यह दृष्टांत एक नक्शे और मार्ग-दर्शक के बारे में है। अगर आपको किसी अन्य देश में जाना पड़े, ऐसा देश जो बहुत दूर है और आप पहले कभी वहां नहीं गये हो। परमेश्वर आप को दो विकल्प देते हैं। पहला, या तो आप एक नक्शा साथ ले जा सकते है या स्वयं के लिए एक मार्ग दर्शक ले जा सकते हैं।

आप सामर्थी है, आप चतुर है और आप स्वयं पर निर्भर रहने वाले हैं। आप कहेंगे, “मैं नक्शों को अच्छे रीति से समझता हूं इसीलिए मैं नक्शे को चुनूंगा।” सही दिशा की जानकारी लेते हुए आप उस मार्ग की ओर चल पड़ते हैं। सूरज की चमक और पक्षियों की चहचहाहट से आप आनन्दित होते हैं। आप अपने आप से कहेंगे, ‘यह तो बहुत आसान है। यह किसी मिठाई के टुकड़े जैसा है।

तीन दिन के बाद आप एक जंगल के बीच आ जाते है। समय आधी रात का है और जोरों की बारिश हो रही है। और यही नहीं आप एक बड़ी सी चट्टान के कोने पर हैं। आप को यह समझ नहीं आ रहा कि उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम कहां है। परन्तु तभी एक क्या मैं आप का मार्ग दर्शन कर और आप कहते हैं, “अरे, मुझे तुम्हारी जरूरत है! हां जरूरत है।” मार्ग दर्शक कहता है, “मुझे अपना हाथ दो, और मैं तुम्हे यहां से बाहर निकालूंगा।” कुछ ही समय में आप और मार्गदर्शक वहां से बाहर निकलते हैं और एक बार फिर से मार्ग पर आ जाते हैं और दोनों साथ-साथ चल रहें हैं।

और फिर ऐसा होता है कि आप स्वयं से कहते हैं, “मैं कितना भोला था कि उस जंगल में थोड़ी देर के लिए डर गया। मैं चाहे तो स्वयं बाहर निकल सकता था।” जैसे ही आप अपने मार्ग दर्शक को यह बताने के लिए मुड़ते है तो आप देखते हैं कि मार्ग दर्शक वहां नहीं है। आप अपना कंधा झाड़ते हैं और सोचते हैं, “मैं यह स्वयं कर सकता हूं।” और आप आगे बढ़ जाते हैं।

दो दिन के पश्चात आप अपने आप को एक दलदल के बीचों बीच पाते हैं। आप को कुछ समझ में नहीं आता कि आपको क्या करना है। आप स्वयं से कहते हैं, “मैं फिर से मदद के लिए नहीं पुकार सकता। पिछले बार मुझे मदद प्राप्त हुआ था परन्तु मैंने सही नहीं किया।”

और इस क्षण आप चकित हो जाते हैं जब एक और बार मार्ग दर्शक को अपने साथ पाते हैं। वह कहता है, “मुझे तुम्हारी मदद करने दो, और आप दोनों एक और बार फिर चल पड़ते हैं।

इस दौरान आपको याद आती है उस नक्शे की जो आपकी जेब में है। सो आप उसे निकालते हैं और मार्ग दर्शक को देते हुए कहते हैं, “शायद आप इसे रखना चाहेंगे”।

नक्शा ही व्यवस्था है। वह एकदम सही है। उसमें दी गयी हर विस्तृत बात सही है। हर एक स्थान का सही भौगोलिक रूप दिया गया है। आप को यह निर्णय करना है कि, “मैं इस नक्शे को नहीं उठाऊंगा। मैं अपने मार्ग दर्शक पर भरोसा रखूंगा।”

कौन है आपका व्यक्तिगत मार्ग दर्शक? बेशक वह पवित्र आत्मा है।

कितनी बार इस प्रकार की बाते घटती होंगी? कितने बार हम मुड़कर वापस अपनी बुद्धि और चतुराई पर भरोसा कर पवित्र आत्मा का अनादर करते हैं?

वह दुल्हन जिसने मार्ग-दर्शक पर भरोसा रखा

उत्पत्ति २४ में बताया गया है कि किस प्रकार इब्राहीम ने अपने पुत्र इसहाक के लिए दुल्हन ढूंढा। उसने अपने दास को मसोपोटामिया भेजा अपने कुल से ही एक दुल्हन चुन सके, क्योंकि यह उस समय की एक जरूरी परम्परा थी।

यह कहानी इतिहास में घटित एक दृष्टांत है। इब्राहीम परमेश्वर पिता के जगह में है। इसहाक पुत्र यीशु मसीह के स्थान पर। और चुनी गई दुल्हन (जिसका नाम रिबेका था) वह एक कलीसिया के समान हैं। और दास जो पवित्र आत्मा के स्थान पर है। उत्पत्ति २४ में पवित्र आत्मा कभी किसी का ध्यान अपनी ओर आकर्षक नहीं करता, बल्कि वह पिता और पुत्र की महिमा के लिए निरंतर कार्य करता है।

दस ऊंटों पर अनेक भेंटो को लादकर दास यह सोचते हुए चल पड़ा कि वह एक दुल्हन को अवश्य चुनेगा। मध्य-पूर्वी देशों में यह एक अनिवार्य प्रथा है कि जब भी आप एक रिश्ता बनाना चाहते हो तो आपको एक भेंट देनी होगी। अगर आपकी भेंट को स्वीकार कर लिया गया, तो आपको भी स्वीकार कर लिया गया, अगर आपके भेंट को ठुकरा दिया गया तो इसका मतलब आपको भी ठुकरा दिया गया है। यह किसी संबंध को बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण बात है ।

क्योंकि ऐसी जगहों पर मैं रह चुका हूँ इसलिए मैं कह सकता हूं कि एक ऊंट पर बहुत वजन के सामान लाद सकते हैं। और दास अपनी यात्रा में कुछ कम नहीं परन्तु दस ऊंटों को ले गया। वह एक स्थान पर पहुंच कर अपने झुंड की प्यास बुझाने के लिए ठहरता है और साथ ही एक प्रार्थना करता हैः “मैं इनमें से एक कुंवारी कन्या से मेरे लिये पानी निकालने को कहूंगा। ऐसा हो कि जिसे मैं कहूं वह ही चुनी हुई वह कुंवारी कन्या हो और जो कहे, ‘मैं तुम्हारे लिये ही नहीं तुम्हारे ऊंटों के लिए भी पानी निकालूंगी।” (यह ध्यान रखें कि एक ऊंट चालीस गेलन पानी पीता है।

तब वहां रिबेका आती है और दास उससे कहता है, “मुझे कुछ पीने के लिये दो।” रिबेका का जवाब था, “अवश्य ! और मैं आपके ऊंटों के लिये भी पानी निकालूंगी।” फिर वह दास अपने आप से कहता है, “यही वह लड़की है।” यहां मैं कहना चाहूंगा कि रिबेका विश्वास और कार्य का प्रतिरूप है। दस ऊंटों को पानी पिलाना एक कठिन कार्य है।

फिर दास ने कुछ सुन्दर आभूषण निकाले जो एक नथ और कुछ कंगन थे और रिबेका को पहना दिया। जैसे ही उसने उन आभूषणों को स्वीकार किया उसी वक्त वह चुन ली गई। क्या होता अगर रिबेका उन आभूषणों को लेने से इन्कार कर देती? वह कभी चुनी गई दुल्हन न बन पाती। हम उन कलीसियाओं के बारे में क्या कहें जो पवित्र आत्मा के भेटों को ठुकराती है? वे एक दुल्हन बनने के चिन्ह से दूर होते हैं।

रिबेका के पास कभी कोई नक्शा नहीं था। वह उस स्थान पर कभी नहीं गई थी जहां मार्ग दर्शक उसे ले जा रहा था। उसने उस व्यक्ति को कभी नहीं देखा था जिससे उसका विवाह होने वाला था और न ही उसके पिता को देखा था। परन्तु उसके साथ एक मार्ग दर्शक था जो रास्ता जानता था। वह मार्ग दर्शक दोनों-पिता और पुत्र को जानता है। वह उसको सारी जानकारी दे सकता है जो वह जानना चाहती है।

ऐसा ही मेरे और आपके साथ भी है। हम नक्शे से नहीं पहुंच सकते; हमें मार्ग दर्शक की सख्त जरूरत है। इस जीवन में शायद हम-पिता और पुत्र को न देखें और न ही उस अन्तिम स्थान को। परन्तु अगर हम पवित्र आत्मा को अगुवाई करने दें तो वह हमें मार्ग दिखायेगा।

Take some time today to thank God for His Holy Spirit!

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