संघर्ष का उत्कर्ष

Derek Prince
*First Published: 2001
*Last Updated: मार्च 2026
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‘तान और उसके दूतों का परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह जो हमने वचन के आधार पर देखा और इसके बाद शायद हम यह सोचने पर मजबूर हो जाये कि क्यों नहीं परमेश्वर ने उसी समय शैतान और उसके दूतों को अनन्त आग में डाल दिया जहां उन्हें रहना चाहिए था?
हाँ यथार्थ रूप से परमेश्वर यह कर सकता था। परन्तु उसने न करने का निर्णय किया। परमेश्वर ने अपने परिज्ञान में उस विद्रोह से भरे शैतान को एक जरिया बनाया जिससे वह स्वयं के उद्देश्यों के लिए उसे उपयोग कर सकता है। सी.टी. स्टड नामक प्रभु का सेवक था जो पहले एक खिलाड़ी हुआ करता था। उसने कहा “परमेश्वर ने किसी भी प्राणी से ज्यादा शैतान को इस्तेमाल किया है।”
As this series, Because of the Angels, draws to a close, we will see how the spiritual conflict of which we are inextricably a part reaches its climax, and discover that believers play a crucial role in Satan's final downfall.
यह परमेश्वर का सिद्धान्त है कि हमारे सम्बन्ध तब तक सुरक्षित नहीं हो जाता जब तक हम उसके नियुक्त की गई परीक्षाओं में विजयता पूर्वक नहीं निकलते। यह दोनों मनुष्य व दूतों के लिए लागू है। बिना परखे गये संबंध वैसे ही है जैसे अशुद्ध सोना। स्वर्ग उन्हें नहीं स्वीकारेगा।
इसी कारण यीशु में लौदीकिया की कलीसिया से कहाः “इसीलिये मैं तुझे सम्मति देता हूं कि आग में ताया हुआ सोना मुझसे मोल ले” (प्रकाशितवाक्य ३ः१८)। दूसरे शब्दों में, “तुम जो मेरे जन होने का दावा करते हो वे तब तक स्वीकार नहीं किये जायेंगे जब तक तुम अपनी परीक्षाओं पर विजयी नहीं होते”। इस प्रकार के गुण वाला सोना कभी तुच्छ नहीं हो सकता। हमें उसे खरीद लेना है। और हमें उसकी एक कीमत भी चुकानी होगी।
परीक्षा लेने वाला
एक मुख्य जरिया जिसके द्वारा परमेश्वर हमारी परीक्षा लेता है वह है ‘शैतान’। दो बार पवित्रशास्त्र में उसे “परखने वाला” कहा गया हैं (देखें मत्ती ४:३, १ थिस्सलुनीकियों ३ः५)। इसका अनुवाद अच्छे रीति से किया जाए तो होगा ‘परीक्षा लेने वाला’।
सबसे पहले परमेश्वर ने शैतान को स्वर्ग के दूतों की परीक्षा करने के लिये प्रयोग किया। वही दूत इस परीक्षा में सफल हुए जो शैतान के विद्रोह में शामिल नहीं हुए। तीन बार, मसीह के महिमा और न्याय में वापसी के बारे में बताया गया, पवित्रशास्त्र बताता है कि वह उसके पवित्र दूतों के साथ आयेगा (देखें मत्ती २५:३१; मरकुस ८ः३८; लूका ६ः२६)। यह दूत उन दूतों से भिन्न है जो शैतान के विद्रोह में शामिल हुए और जिन्होंने अपनी पवित्रताई को नष्ट कर दिये।
परमेश्वर शैतान को सारी मानवता की परीक्षा लेने के लिये कहता है। इसकी शुरूआत आदम और हव्वा से हुई। परमेश्वर ने उन्हें अदन की वाटिका में एक साधारण या नकारात्मक आदेश के साथ रखा “पर अच्छे या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है उसका फल तू कभी न खाना।” तब शैतान ने उस वाटिका में कदम रखा और उन्हें प्रलोभित किया जिससे वे वह करें जिसे परमेश्वर ने मना किया था। जब वे इस प्रलोभन में गिर गये, तब परमेश्वर ने उन तीनो पर अपना न्याय दिया। शैतान अपने 'परीक्षा लेने की' भूमिका निभा रहा था, परन्तु आदम और हव्वा अपने परीक्षा में असफल रहे।
यीशु के जीवन में भी शैतान को एक ‘परीक्षा लेने वाले’ की भूमिका को निभाने की अनुमति दी गई थी।
चालीस दिन और चालीस रात निराहार रहने के बाद, परखनेवाला (परीक्षा लेने वाला) यीशु के पास आया और उसके सामने तीन उत्तम प्रलोभन या परीक्षा को रखा (मत्ती ४:१-११)। परन्तु जहां पहला आदम असफल हुआ वहीं आखिरी आदम प्रबल हुआ। और शैतान को पीछे हटना पड़ा।
करीब साढ़े तीन साल के पश्चात उस परीक्षा लेने वाले को एक बाद फिर यीशु के खिलाफ कार्य करने की अनुमति दी गई। सबसे पहले, शैतान ने यहूदा इस्करियोत के भीतर प्रवेश किया और उसे यीशु को पकड़वाने के लिये उपयोग किया (देखें लूका २२:३)। उसके बाद शैतान ने एक अधर्मी लोगों के समूह पर कार्य किया जो यीशु क्रूस पर चढ़ाये जाने की मांग कर रहे थे। एक और बार यीशु ने इन परीक्षा में भी सफलता प्राप्त की। उसने स्वइच्छा से अपना जीवन मानवता के पापों के लिये बलिदान दिया।
यहां पर परमेश्वर का अनोखे परिज्ञान अपने अन्तिम चरण पर पहुंच गया। यीशु ने क्रूस पर जो दाम चुकाया उसने शैतान के सारे दावों को मिटा दिया जो गिरी हुई मानवता पर थी। शैतान के लिये स्पष्ट होती विजय ही उसकी अटल पराजय बन गयी ।
दासत्व से विजय की ओर
परमेश्वर ने एक और बार अपने असीम परिज्ञान को दिखाने के लिये शैतान का इस्तेमाल किया। शैतान ने मानवता को परमेश्वर के विरूद्ध विद्रोह करने के लिए प्रलोभित किया और उन्हें अपना दास बना दिया। परन्तु यीशु ने क्रूस पर बलिदान होकर जो दाम चुकाया उसके कारण परमेश्वर ने हमें हमारे पापों से क्षमा ही नहीं किया बल्कि अपने राज्य के उत्तराधिकार भी बनाया। पर यथार्थ में उसने हमें एक जरिया बनाया है जिससे वह शैतान पर अपनी अन्तिम विजय को देख सके।
यूहन्ना इस लड़ाई के विषय में बतातें है कि; यह भविष्य में होने वाला है और जो आखिरकार शैतान के राज्य और उसके विद्रोही दूतों पर विजय प्राप्त करें जो आकाश मंडलों में है।
“फिर स्वर्ग पर लड़ाई हुई, मीकाईल और उसके स्वर्गदूत अजगर से लड़ने को निकले और अजगर और उसके दूत उससे लड़े। परन्तु प्रबल न हुए और स्वर्ग में उनके लिए फिर जगह न रही। और वह बड़ा अजगर अर्थात् वही पुराना सांप, जो इब्लीस और शैतान कहलाता है और सारे संसार का भरमानेवाला है, पृथ्वी पर गिरा दिया गया। और उसके दूत उसके साथ गिरा दिए गए। फिर मैंने स्वर्ग पर से यह बड़ा शब्द आते हुए सुना कि अब हमारे परमेश्वर का उद्धार और सामर्थ और राज्य, और उसके मसीह का अधिकार प्रगट हुआ है क्योंकि हमारे भाइयों पर दोष लगाने वाला, जो रात दिन हमारे परमेश्वर के सामने उन पर दोष लगाया करता था, गिरा दिया गया। और वे मेम्ने के लोहू के कारण, और अपनी गवाही के वचन के कारण, उस पर जयवन्त हुए और उन्होनें अपने प्राणों को प्रिय न जाना, यहां तक कि मृत्यु भी सह ली”
यह वाक्य कुछ अत्यंत जरूरी सच्चाई को सामने लाती हैः
- १) इस घटना के व्याख्या करने से पहले, शैतान और उसके दूत निरंतर अपने राज्य को आकाश मंडलों पर स्थापित किये हुए है।
- २) जब स्वर्ग से एक बड़ा शब्द “हमारे भाईयों” के विषय में कहा गया तो इसका अर्थ है हम जगत के विश्वासियों से।
- ३) शैतान और उसके दूत तब तक निकाले नहीं जायेंगे जब तक स्वर्गीय मंडल में परमेश्वर के दूत और जगत के विश्वासी उन्हें एक जुट होकर हरा न देते।
यह इस लड़ाई की एक आश्चर्यजनक अन्त को दर्शाती है। “वे (जगत के विश्वासी) उस (शैतान) पर विजयी हुए।” इस जगत के बचाये गये विश्वासी होंगे वो जन जो शैतान पर विजय प्राप्त करेंगे। शैतान के द्वारा घायल किये जाने पर ही उस पर विजय प्राप्त करेंगे। सिर्फ परमेश्वर ने ही यह सोचा होगा।
यह लड़ाई आत्मिक हथियारों द्वारा लड़ी जानी है। शैतान का मुख्य हथियार है ‘दोष’ इसलिए वह ‘जो रात दिन हमारे परमेश्वर के सामने हम पर दोष लगाता है’। उसका उद्देश्य है हमारे दोषों को निरंतर सामने लाना। अगर हम दोषी है तो हम उसके विरूद्ध खड़े होने के लिए सामर्थी न होंगे और उसकी जगह जो स्वर्ग में है उसे लेने के लिए अधिकारी भी नहीं होंगे।
हमारी विजय उसी समय होगी जब हम सर्वोच्च शक्तिशाली हथियार का इस्तेमाल करेंगे जो परमेश्वर ने हमें दिया है “मेम्ने के लहू और अपनी गवाही।” मेम्ने का लहू हमारे लिए यीशु के क्रूस पर दी गई बलिदान को जो पूर्ण-पर्याप्त है, स्पष्ट करता है। “क्योंकि उसने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए जाते है, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है।” यीशु का बलिदान जो हमारे बदले मे था वह हमेशा के लिये पर्याप्त है। इसके साथ न ही कुछ जोड़ने की जरूरत है और न ही इसमें से कुछ भी निकालने की। आखिरी शब्द यीशु का क्रूस पर यह ،، था पूरा हुआ” (यूहन्ना १६ः३०)। यह पूरी तरह और संपूर्ण रूप में पूर्ण हुआ।
फसह के सिद्धांत
परमेश्वर ने हमारी अन्त-समय की लड़ाई जो शैतान के साथ है, उसके लिये जो प्रबंध किया है उसे प्रतिबिंबित किया है उस फसह की घटना से जब उसने इस्त्राएल को मिस्र से छुड़ाने के लिये किया था। जो मेम्ना उस धार्मिक रीति पर बलि चढ़ाया गया वह यीशु अर्थात “परमेश्वर का मेम्ना” को प्रतिबिंबित करता है।
यह हर इस्त्राएली परिवार के मुखिया का उत्तरदायित्व था कि वह एक मेम्ने को बलि चढ़ाये और उसका लहू एक कटोरे मे ले लें। परन्तु यहाँ पर कार्य पूरा नहीं हुआ। उस कटोरे में जो लहू था वह इस्त्रएलियों को बचा नहीं सकता था। उस लहू को कटोरे से चौखट के सिरे में और दोनों अलंगों में लगाना था। परमेश्वर का वायदा था ،، कि मैं उस लहू को देखकर, तुम को छोड़ जांऊगा” (निर्गमन १२:१३)। अर्थात “वह विपत्ति तुम पर नहीं पड़ेगी।”
इस फसह के पर्व में एक और मुख्य चीज़ थी। एक ‘जुफा’ नाम का पौधा जो अरब राज्यों में अधिकतर जगहों पर पाया जाता है। इस्त्रएलियों के हर पुरनियों को एक गुच्छा ‘जुफा’ तोड़ना था और उसे उस लोहू के कटोरे में डुबाकर द्वार के चौखट और दोनों अलंगों पर छिड़कना था। उसके पश्चात् ही वह घर सुरक्षित हो पाएगा।
किस प्रकार यह घटना और यीशु के क्रूस पर हमारे लिये दी गयी बलिदान की समानता दर्शाती है? ज़रा देखें उस चिन्ह को जब फसह के पर्ब में लहू उस तसले (कटोरे) में है। परन्तु कटोरे में पड़े लहू किसी को बचा नहीं सकता। उसे उस कटोरे से हमारे रहने के स्थान पर लगाना होगा।
फसह के पर्ब में जूफा के द्वारा लोहू को उस जगह पर छिड़का गया जहाँ उसकी जरूरत थी। हमारे जीवन में उस जूफा से मिलती क्या बात है? किस प्रकार हम यीशु के लहू को उन स्थानों में लगायेंगे जहाँ उनकी जरूरत है?
इसका उत्तर प्रकाशितवाक्य १२:११ में दिया गया है : ‘“और वे (जगत के विश्वासी) मेम्ने के लहू के कारण और अपनी गवाही के वचन के कारण उस (शैतान) पर जयवन्त हुए।” वह हमारी गवाही है जो जुफे ने इस्त्राइलियों के लिये किया। यह तब होता है जब हम हमारी व्यक्तिगत गवाही देते है। यीशु के लहू को जब हम प्रयोग करेंगे और तभी हम दावा कर सकेंगे उन लाभों के जो यीशु के क्रूस पर दी गयी बलिदान के कारण परमेश्वर ने हमारे लिए प्रबंध किया है। हमारा साहस और निरंतर गवाही एक जूफा बन जाता है जो हमारे जीवन में यीशु के लहू को लगाता है।
जहाँ तक हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि शैतान को बाईबल की अच्छी जानकारी है। वह पवित्रशास्त्र में प्रगट की गई परमेश्वर के उद्देश्यों से अच्छी तरह वाकिफ है। वह जानता है कि परमेश्वर इस जगत के विश्वासियों को शैतान पर अन्तिम विजय प्राप्त करने के लिए एक जरिया बनायेगा । उसकी चाल यह है कि वह दोषी समझने की भावना को हममें उत्पन्न कर हमें शक्तिहीन बनाना चाहता है, जिससे हम अपने आपको तुच्छ और नालायक समझे। इसी उद्देश्य से वह हम पर “परमेश्वर के सामने दिन रात” दोष लगाता है (प्रकाशितवाक्य १२:१०)।
हम पूछ सकते हैः परमेश्वर क्यों शैतान के आरोपों को शान्त नहीं करता? इसका जवाब यह है कि परमेश्वर हमारे लिये वो नहीं करेगा जो वह हमसे करवाना चाहता है। वह हमें आत्मिक हथियारों को प्रबंध करता है जो हमें शैतान के हर दोषों पर जयवन्त करेगा। शैतान के हर आरोपों के लिए हम जवाब देंगे कि यीशु का लहू जो क्रूस में बहा था उसने हमारे लिए एक पूर्ण आजादी को प्रबंध किया है। इसलिए हम ‘दोषी’ नहीं हैं।
अन्त के समय के सैनिकों के लिए एक संक्षिप्त हस्तलेख
इस संसार की सेना के एक सैनिक को पहले उचित हथियार दिया जाता है और फिर एक प्रशिक्षण पाता है जिससे वह उन हथियारों का अच्छी तरह प्रयोग कर सकें। यह हमारे लिये आज्ञासूचक है कि हम प्रभु के अन्तिम समय की सेना के सैनिक है और हमें भी अच्छी रीति से हमारे हथियारों को प्रयोग करना है जो परमेश्वर ने हमें प्रबंध किया हैः जो है, मेम्ने का लहू और हमारे गवाही के वचन। हमें सीखना है कि हम किस प्रकार हर एक प्रबंध की जो यीशु के लहू के द्वारा हमें प्राप्त हुई है, सही रूप से गवाही दे।
मैंने ‘प्रशिक्षण हस्तलेख’ को नीचे बताया है ताकि हम जानें कि किस प्रकार यीशु का लहू हमारे लिए हर प्रकार से प्रबंध करता है। अगर आप इन आयतों की ओर ध्यान दें या फिर इन्हें जुबानी याद करें, तो आप एक बड़ी आत्मिक लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हो पायेंगे जो इस युग के अन्त में शुरु हो जाएगा।
“और वे मेम्ने के लोहू के कारण, और अपनी गवाही के वचन के कारण, उस पर जयवन्त हुए, और उन्होंने अपने प्राणों को प्रिय न जाना, यहां तक कि मृत्यु भी सह ली” (प्रकाशितवाक्य १२ः११)।
“हम को उसमें उसके लोहू के द्वारा छुटकारा अर्थात अपराधों की क्षमा, उसके उस अनुग्रह के धन के अनुसार मिला है (इफिसियों १:७)।
“यदि हम अपने पापों को मान लें, तो हमारे पापों को
क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी हैं” (देंखे यूहन्ना १:७)।
“सो जब कि हम, अब उसके लोहू के कारण धर्मी ठहरे, तो उसके द्वारा क्रोध से क्यों न बचेंगे” (रोमियों ५ः६)।
“इसी कारण, यीशु ने भी लोगों को अपने ही लोहू के द्वारा पवित्र करने के लिये फाटक के बाहर दुख उठाया” (इब्रानियों १३:१२) ।
“सो हे भाइयो, जबकि हमें यीशु के लोहू के द्वारा उस नए और जीवते मार्ग से पवित्र स्थान में प्रवेश करने का हियाब हो गया है” (इब्रानियों १०:१६) ।
“और नई वाचा के मध्यस्थ यीशु, और छिड़काव के उस लोहू के पास आए हो, जो हाबेल के लोहू से उत्तम बातें कहता है” (इब्रानियों १२:२४)।
हमारी अन्तिम आवश्यकता
प्रकाशितवाक्य १२:११ समाप्त होता है एक अनोखे बयान के साथ उन सभी के विषय में जो इस लड़ाई में जयवन्त होंगेः
“उन्होंने अपने प्राणों को प्रिय न जाना, यहां तक कि मृत्यु भी सह ली।’
अगर ऐसी कोई परिस्थिति आ जाये जहां परमेश्वर की आज्ञा को मानने के लिये हमारे प्राणों का भी मोल चुकाना पड़े तो भी हम उसकी आज्ञाओं का पालन करेंगे ।
हम सबको यह निर्णय लेने कि जरूरत नहीं है परन्तु यह निर्णय हमारी वचनबद्धता होनी चाहिये। यह हमारे गवाह के गुण को दर्शाता है जो शैतान के विरूद्ध एक हथियार बन जाता है जिसके लिए शैतान के पास कोई तोड़ नहीं। हम सब को इस प्रश्न को अपने सामने रखना होगाः क्या यह मैं पूरे सच्चाई के साथ कह सकता हूं कि मैं अपने प्राणों को प्रिय न जानकर मृत्यु को सह सकूंगा?
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