हमारी लडाई के हथियार

Derek Prince
*First Published: 2000
*Last Updated: मार्च 2026
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- मने यह सीखा है कि जब हम एक मसीही बन जाते हैं तो ह अपना सीखा एक आकर लड़ाई मसीन्मलित माने जाते हैं जो स्वर्ग और धरती दोनों में विद्यमान है। और हमारा सबसे शक्तिशाली और भयंकर शत्रु है दुष्ट दूतों का राज्य जिनका प्रधान स्थान आकाश मंडल में है।
परमेश्वर का ज्ञान और करूणा हमें सारे हथियारों से लैस करती है जो हमारी विजय के लिये जरूरी है। क्योंकि हमारी लड़ाई आत्मिक मंडलों में है इसलिए हमारे हथियार भी आत्मिक है। पौलुस कहता है कि “क्योंकि हमारी लड़ाई के हथियार शारीरिक नहीं, पर गढ़ों को ढा देने के लिये परमेश्वर के द्वारा सामर्थी है” (२ कुरिन्थियों १०:४)।
मजबूत गढ़ जिन पर हम आक्रमण करते हैं वे भी आत्मिक हैं। कई शताब्दियों से शैतान ने मानव जाति के हृदय और मनों में इसका निर्माण किया है। वे मजबूत गढ़ है व्यय का, घृणा का, मूर्ति पूजन का, धार्मिक अन्धविश्वास का, सामाजिक कुरीतियों का और कई अन्य।
यही वह मजबूत गढ़ है जो किसी राजनीति के शांति प्रस्ताव को असफल बनाती है और कोई प्रस्ताव इतना मजबूत नहीं कि वहउन आत्मिक गढ़ों को तोड़ सके जो शांति के मार्ग में है।
संपूण शान्ति तभी आ सकती है जब इस संसार में मसीह का राज्य स्थापित हो जाएगा। एक मसीही की लड़ाई का यही एक लक्ष्य है और हमारे हथियारों का इस्तेमाल करने का उद्देश्य। वह यह है कि, स्त्री और पुरूषों के हृदय में बनी आत्मिक गढ़ों को तोड़ सकें और फिर मसीह के राज्य की स्थापना कर सकें -पहले उनके हृदय में फिर सारे संसार में।
Seven Spiritual Weapons
इफिसियों की पत्री ६:१३-१८ में पौलुस सात आत्मिक हथियारों की सूची देते है, जिनकी हमें आवश्यकता है । वे अपने दिनों के रोमी सैन्य के हथियारों से उदाहरण लेते है। यह है वह सूची :
१) सत्य से अपनी कमर कस लो।
पौलुस के दिनों मे स्त्री और पुरूष दोनों साधारणतः लम्बे औरडीले वस्त्र पहनते थे जो उनके घुटनों के नीचे तक आते थे। किसीभी मेहनती कार्य को करने से पहले अपने लम्बे वस्त्र को उपरउठाकर कमर में बांध लेते थे। इसके बाद ही किसी कठिन कार्य कोकरने के लिये तैयार हो पाते। इसलिए यह
वाक्य सत्य से कमर कसने पर हमें अपने हर प्रकार के कपट औरसमझौतों का त्याग करना होगा। अगर हम उन्हें "कस नहीं लेते"तो वे हमारी आत्मिक उन्नती के मार्ग में रूकावट होंगे। हमेंपवित्रशास्त्र के सत्य के प्रति विश्वसनीय रहना है भले उसमें विवादहो या ज्यादा लोकप्रिय हों तो भी।
हमें अपने व्यक्तिगत संबंधों में भी ईमानदार और स्पष्ट होना चाहिए। यह एक जरूरी अवस्था है जो आत्मिक बढ़ोत्तरी के लिए आवश्यक है।पतरस नये विश्वासियों को लिखतें हुए कहतें है,
“इसलिए सब प्रकार का बैरभाव और छल और कपट और डाह और बदनामी को दूर करके नये जन्मे हुए बच्चों की नाई निर्मल आत्मिक दूध की लालसा करो ताकि उसके द्वारा उद्धार पाने के लिये बढ़ते जाओ।”
इन सबसे ज्यादा, हमें परमेश्वर से ईमानदार और पूर्ण रूप से स्पष्ट होना चाहिए। यही एक तरीका है आत्मिक प्रकाशन को प्राप्त करने के लिए।
दाऊद कहता हैः “देख, तू हृदय की सच्चाई से प्रसन्न होता है, और मेरे मन ही में ज्ञान सिखाएगा” (भजन संहिता ५१:६)।
परमेश्वर अपने रहस्यमय ज्ञान को सिर्फ उनको प्रगट करता है जिनके अन्दर सत्य है।
२. धार्मिकता की झिलम
झिलम हमारे हृदय को सुरक्षित करती है। नीतिवचन ४ः२३ में हमें एक चेतावनी मिलती हैः
‘“सबसे अधिक अपने मन की रक्षा कर क्योंकि जीवन का मूल स्त्रोत वही है।
” आत्मिक जीवन में हमारी विजय इस बात पर निर्भर करती है कि किस प्रकार हमारे हृदय के संबंध परमेश्वर और मनुष्यों से है। हमें पौलुस के उदाहरण का अनुसरण करना चाहिए और “इस से मैं आप भी यतन करता हूं, कि परमेश्वर की, और मनुष्यों की ओर मेरा विवेक सदा निर्दोष रहे” (प्रेरित २४:१६)।
जिस प्रकार की धार्मिकता को परमेश्वर देखता है वह सिर्फ किसी सिद्धांत का, अपनी बुद्धि से सहमत होने से नहीं परन्तु यह हृदय की स्थिति है, न की बुद्धि की।
“क्योंकि धार्मिकता के लिये मन से विश्वास किया जाता है, और उद्धार के लिए मुंह से अंगीकार किया जाता है।”
और यह किसी धार्मिक नियमों के पालन करने से भी नहीं होता है। पौलुस इनसे कई वर्षों तक वाकिफ था परन्तु जब वह मसीह से मिला तो उसकी आकांक्षा बदल गयी
“मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूंः जिसके कारण मैनें सब वस्तुओं की हानि उठायी, और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिससे मैं मसीह को प्राप्त करूं और उसमें पाया जाऊँ। न कि अपनी उस धार्मिकता के साथ, जो व्यवस्था से है, वरन उस धार्मिकता के साथ जो मसीह पर विश्वास करने के कारण है, और परमेश्वर की ओर से विश्वास करने पर मिलती है” (फिलिपियों ३:८-६)।
३. सुसमाचार की तैयारी के जूते
रोमी सैन्य गण मजबूत जूतों से लैस थे। वह उन्हें आसानी से इधर -उधर जाने में सहायता करती थी। तुरन्त आज्ञा मिलने पर वे लम्बी दूरी की यात्रा पर जा सकते थे।
एक मसीही होने के कारण हमें गतिशील बनना चाहिए जिससे हम किसी भी वक्त कहीं भी परमेश्वर की आज्ञा पाकर जा सकते है और वह क्यों न एक तुरन्त मिली आज्ञा हो। इसके लिये चाहिये ‘तैयारी’। हमें स्वयं को सुसमाचार के सत्य से परिचित कराना होगा और यह जानना है कि किस प्रकार एक अविश्वासी को यह सत्य बांटना है।
और यह शान्ति का सुसमाचार भी है। हम सुसमाचार को प्रभावी रूप से तभी बांट सकते है जब हमारे हृदय में सच्ची शान्ति होगी वह शान्ति जो हमारे बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं है। एक मुसीबत में पड़े और उलझे हुए पापी को वचन बांटते समय जो वाक्य हम यथार्थ में बोलते हैं उस स्वर की मधुरता उसे प्रभावित करती है।
४. विश्वास की ढाल
‘ढाल’ शब्द का अनुवाद ‘दरवाजे’ से मिलता जुलता है। इसकी लम्बाई इसकी चौड़ाई से अधिक है। एक परिचित योद्धा उसके पीछे अपने आपको पूरी तरह छिपा देता है जिससे वह पूर्ण रूप से सुरक्षित हो जाता है। परन्तु इनके लिये उसे योग्य और एक व्यायाम करने वाला होना चाहिए। एक जरूरत से ज्यादा भार वाला व्यक्ति पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं हो पायेगा।
होनी चाहिए। वह हमारे सारे व्यक्तित्व को सुरक्षित करनी चाहिये-जैसे मन, आत्मा और शरीर। हमें आत्मिक परीक्षण प्राप्त कर अपने आप को इतना योग्य बनाना है कि हम पवित्रशास्त्र के वायदों से पूरी तरह ढांप लिये जाये। जो कुछ भी हमारे अहम की होगी या सही न होगी तो वह सब उस ढाल से सुरक्षा के दायरे से बाहर होगी।
शैतान हमारी ओर जो बाण छोड़ता है वह अधिकतर “तीक्ष्ण” होता है। वे सिर्फ घायल करने के लिये ही नहीं बनी है परन्तु उन को जला भी देती है जिनको वह निशाना बनाती है और वह आग गपशप की हो सकती है, कलंक लगाने की हो सकती है, परिवारों या पूरे कलीसिया को विभाजित करने की हो सकती है। परन्तु विश्वास की ढाल इस तीक्ष्ण बाण को रोकती ही नहीं है बल्कि उसको बुझा भी देती है। उस तीक्ष्ण आग को वह पूर्ण रूप से बुझा देती है।
५. उद्धार का टोप
जिस प्रकार झिलम हमारे स्वास्थय की सुरक्षा करता है उसी प्रकार टोप हमारे विचारों को सुरक्षित रखता है। विचार ही ऐसी एक जगह है जहां ज्यादातर मसीही पर निरंतर आक्रमण होते है। शैतान हमारे विचारों को उकसाता है जिससे वह चाहता है कि हम परेशान हो जायें और अपने राह से भटक जाये और उसके साथ जो युद्ध है उसमें हम ज्यादा प्रभावी न हो सकें।
इस विषय में परमेश्वर ने मुझे कई बातें सिखाई। जब मैंने नये जन्म को प्राप्त किया फिर भी मेरे विचारों में मैनें निराशा और निरूत्साह को पाया। मैंने जाना कि उन स्थानों में मुझे सुरक्षा की जरूरत है। जब मैंने पौलुस के हथियारों की सूची को इफिसियों ६:१३-१८ में देखा, तब मैंने महसूस किया कि मुझे जिस चीज की जरूरत थी, वह था ‘उद्धार का टोप’ । परन्तु मैंने अपने आप से प्रश्न किया, “मुझे मालूम है कि मैं बचाया गया हूं। तो क्या इसका अर्थ यह है कि ‘उद्धार का टोप’ मुझ में हर समय पाया जाता है या फिर क्या कोई ऐसी चीज है जिसकी मुझे उद्धार के बाद जरूरत पड़ेगी?
इसके बारे में जब मैं और खोज रहा था तो मैंने देखा कि पौलुस इफिसुस के उन मसीहियों को लिखते हैं जिन्होंने उद्धार प्राप्त किया था। फिर भी पौलुस उनको निर्देश देते हैं कि उद्धार का टोप ले लो। स्पष्ट रूप से मुझे भी यही कहना था। परन्तु यह ‘उद्धार का टोप’ क्या है जो हमारे विचारों को सुरक्षित करती है?
भाग्यवश मैं जो बाईबिल उपयोग कर रहा था वह अन्योन्य संदर्भ वाला था इसमें मुझे दूसरे संदर्भ की आयत मिली। इफिसियों ६:१७ का संदर्भ १ थिस्सलुनीकियों ५:८ था जो यह कहती है कि “उद्धार की आशा का टोप पहनकर सावधान रहें”। इस वचन ने मेरे विचारों को बदल दिया। अगर ‘निराशावाद’ मेरी समस्या थी तो ‘आशावाद’ ही उसका यथार्थ हल था।
मैंने अपने आपको खोजी बनाया और कई बार वचन को कंठस्थ करने से मुझे एक पक्का और आशावाद विचार की प्राप्ति हुई। आज मेरे विचार प्रभावशाली रूप से सुरक्षित है।
इस वक्त तक सारे हथियार बचाव के थे और जिनका उद्देश्य सिर्फ ‘सुरक्षा’ या बचाव था। इस समय पौलुस के हथियारों की ओर जाते हैं। इसके पीछे एक यथार्थ और व्यावहारिक कारण हैः अगर हम अपने आपको सुरक्षित रखने से पहले आक्रमण करते हैं तो हम शत्रु के आक्रमण को रोकने में तैयार नहीं रहते और इसमें हमारे घायल होने की सम्भावना अधिक होती है। यही वह कारण है कि कई मसीही घायल हो जाते हैं।
अब हम चलेंगे बचे हुए दो हथियारों की ओर।
६. आत्मा की तलवार
यह तलवार जो पौलुस कहता है वह प्रभु का वचन या पवित्रशास्त्र है जिनका उपयोग हम बचाव व आक्रमण दोनों के लिए कर सकते हैं। परन्तु इसका प्रथम कार्य आक्रमण है। किसी ने कहा है “एक उत्तम आक्रमण ही एक उत्तम बचाव है” और यह आत्मिक क्षेत्र में बिल्कुल सही है।
‘रेमा’ है जो अक्सर बोले गये वचन को दर्शाती है। जिस प्रकार हमने १२ वीं अध्याय में महत्वपूर्ण वचन को देखा, हमारी बाईबिल किताबों के शेल्फ या कहीं और रखे जाने से प्रभाव नहीं करती। परन्तु जब हम उस वचन को हमारे मुंह में लाते हैं और सामर्थ रूप से हमारे होठों से घोषणा करते हैं तब वह तेज धार वाला दो मुंहा तलवार बनता है।
यह भी ध्यान दें कि वह “(पवित्र) आत्मा की तलवार है।” हम परमेश्वर के वचन को हमारे मुंह में ला सकते हैं, परन्तु इसके रूप से प्रभाव करने के लिये पवित्र आत्मा के नियंत्रण की आवश्यकता होती है।
आपको अगर याद हो कि एक स्पष्ट उदाहरण वचन को उपयोग में लाने के विषय में देखने को मिलता है जब शैतान यीशु को मरूस्थल में प्रलोभित कर रहा था। तीन बार शैतान यीशु की तरफ प्रलोभन के साथ आया और तीनों बार यीशु ने यह कहते हुए उसे पीछे हटा दिया कि “यह लिखा है” (मत्ती ४:४,७,१०)। यीशु ने सिर्फ ‘रेमा’ के हथियार का उपयोग किया प्रभु ने कहे गये वचन को हथियार बनाया। परमेश्वर ने यही हथियार हर मसीही को उपलब्ध कराया है।
दो जरूरी बातों को हमें अपने ध्यान में रखना है। पहला, यीशु पहले ही “पवित्रआत्मा से भरा हुआ था” (लूका ४:१)। वह पवित्रआत्मा था जो यीशु में था और यीशु को इन तलवार को उपयोग करने का निर्देश दे रहा था।
जब शैतान ने उसके सामने एक मुठभेड़ किया तो यीशु ने किसी धर्म संबंधी किताब को नहीं देखा या किसी लाईब्रेरी में नहीं गया। उसने पहले से वचन को अपने स्मरण में डाल दिया था। निश्चित रूप से, आज हमें यह करना है जो यीशु ने किया।
७. हर समय की प्रार्थना
यह सातवां हथियार बाकी छह के समान ही है, परन्तु एक मसीही सैनिक को पूर्ण बनाने के लिए इसकी आवश्यकता होती है।छह हथियार जो हमने देखा उसमें आखिरी वाला ही आक्रमण का हथियार था, वह था आत्मा की तलवार। और तलवार उसी क्षेत्रों में पहुंच सकती है जहां उस सैनिक का हाथ पहुंचता है।
परन्तु यह सातवां हथियार जो ‘हर समय की प्रार्थना’ है उसकी कोई सीमा नहीं हैं । हम इसे ICBM कह सकते हैं। जिसका अर्थ है Inter Continental Ballistic Missile यानी अर्न्तमहाद्वीपीय प्रक्षेपात्र। अगर केन्द्रित प्रार्थना जो पवित्र आत्मा के निर्देशन से है वह चाहे तो महाद्वीपों को और समुद्रों को पार कर अपने लक्ष्य को मार गिराती है। बिना किसी प्रश्न के यह एक सामर्थी और हर ख्रिस्तीय हथियारों से प्रभावशाली है।
जिस प्रकार हमने तलवार के विषय में देखा उसी प्रकार ‘हर समय की प्रार्थना’ भी अपने प्रभावशाली होने के लिए पवित्र आत्मा पर निर्भर करती है। ‘आत्मा में’ प्रार्थना करते रहो (इफिसियों ६ः१८)। परमेश्वर यह हथियार उन मसीहियों को नहीं देता जो अपने सांसारिक इच्छाओं और भावनाओं से चलते है।
‘हर समय की प्रार्थना’ कई विभिन्न प्रकार के प्रार्थनाओं को बताती है - जैसे कि कुछ सूचित की गयी है। १ तीमुथियुस २:१ में उपदेश, विनती, निवेदन और धन्यवाद। यह एक अकेले मसीह के द्वारा बजाए जाने वाला साज नहीं है परन्तु यह कई साजों का तालमेल है जो सिर्फ पवित्र आत्मा के जरिये ही हो सकता है।
कभी-कभी इस प्रकार की प्रार्थना के सामने भयंकर रूकावट आ सकती है। प्रेरित ४:१५-१८ में हम पड़ते कि प्रेरित जन शैतान की एक चाल का सामना करते है जो शायद सुसमाचार की सेवकाई का अन्त कर सकती थी। यहूदी संगठन जो यहूदी जनों का सर्वोच्च धार्मिक अधिकार वाले थे, उन्होंने प्रेरितों को चेतावनी दी कि “प्रभु यीशु के बारे में बिल्कुल न बोलें और न ही शिक्षा या उपदेश दें।”
सुसमाचार के विरोधियों को यीशु नाम के महत्व के बारे में पता चल गया था। और सारा सुसमाचार उस नाम के आधार पर था। जिस प्रकार स्वयं पतरस ने संगठन के सामने यह घोषणा कीः,
“और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं, क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें ” (प्रेरितों के काम ४:१२)।
इस संगठन के निर्णय के द्वारा शैतान ने एक 'गढ़' का निर्माण किया जिससे सुसमाचार के उन्नति के सारे द्वार बन्द हो सके।
शैतान के इस चाल का जब विश्वासियों से सामना हुआ तो उन्होंनें एक जुट होकर परमेश्वर से मदद मांगी। वे सब एक जुट होकर परमेश्वर के हस्तक्षेप के लिये चिल्ला उठे। परमेश्वर ने अपने सामर्थ को इस प्रकार दिखाया कि “जब कि प्रार्थना कर चुके, तो वह स्थान जहां वे इकट्ठे थे हिल गया और वे सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गए और परमेश्वर का वचन हियाव से सुनाते रहे” (प्रेरितों के काम ४:३१)। ‘हर समय की प्रार्थना’ नामक हथियार था जिसने शैतान के मजबूत गढ़ों को गिरा दिया। आज हर सुसमाचार के कार्य के सामने शैतान ने कई कथाएं और सजावट को रचा है। कलीसिया को चाहिए कि वह अपने शक्तिशाली हथियार का उपयोग करें, जो हैः ‘हर समय की प्रार्थना’।
‘हर समय की प्रार्थना’ नामक हथियार था जिसने शैतान के मजबूत गढ़ों को गिरा दिया। आज हर सुसमाचार के कार्य के सामने शैतान ने कई कथाएं और सजावट को रचा है। कलीसिया को चाहिए कि वह अपने शक्तिशाली हथियार का उपयोग करें, जो हैः ‘हर समय की प्रार्थना’।
The topic of my next—and final—letter on this theme will be The Climax of the Conflict.
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