आत्मिक सुरक्षा के सिद्धांत

Derek Prince
*First Published: 2000
*Last Updated: मार्च 2026
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‘ब हम एक नया जीवन प्राप्त कर परमेश्वर के राज्य में एक मसीही बनें तब हमने पाया कि हम एक लड़ाई में सम्मिलित हो गये हैं, जो आत्मिक राज्य के विरूद्ध है- वो है, शैतान का राज्य। क्योंकि जिस राज्य के हम भागीदार हैं वह राज्य एक युद्ध में है, और हम उस युद्ध के एक भाग हैं। हम यह पाते हैं कि हमारा सामना कई प्रकार के दुश्मनों से होता है परन्तु उनमें से शक्तिशाली और भयंकर है स्वर्ग मंडल के विद्रोही दूत जो परमेश्वर के प्रधान शत्रु, शैतान, के नियमों पर चलते हैं।
In the first letter in this series, Because of the Angels, we looked at the intervention of angels in believers' lives; then we explored Biblical accounts of warfare between God's angels and those of Satan. In this letter we will consider the need for spiritual protection in the midst of this war in the heavenlies.
क्योंकि हमारे शत्रु शक्तिशाली है इसलिए चाहिए कि हम परमेश्वर द्वारा दी गई सुरक्षा को प्राप्त करें। इस अध्याय में हर मसीही के लिए परमेश्वर की दृढ़ मांगों को हम देखेंगे ।हमने देखा पौलुस कहते हैं कि मसीही स्त्री को उसके ऊपर वचन की सुरक्षा की आवश्यकता है-जिसके उदाहरणतः उनके सिर को ढकने से है। परन्तु यह सिर्फ एक उदाहरण है उस सिद्धांत का जो हर मसीही पुरुष और स्त्री पर लागू होते हैं। हर मसीही को वचन के अधिकार के अधीन रहकर सुरक्षित रहना है।
अधिकार को समझते हुए
लूका ७:१-१० बताता है कि किस प्रकार एक सूबेदार ने यहूदी पुरनियों को यीशु के पास भेजा यह विनती करने कि उसके दास को चंगा करें, जो मरने पर था। यीशु ने कहा कि वह आकर उसके दास की चंगाई के लिए प्रार्थना करेगा। यीशु उनके साथ-साथ चला पर जब वह घर से दूर न था, तो सूबेदार ने उसके पास यह कहला भेजा, किः
“हे प्रभु दुख न उठा, क्योंकि मैं इस योग्य नहीं कि तू मेरी छत के तले आए। इसी कारण मैंने अपने आप को इस योग्य भी न समझा कि तेरे पास आ सकूं पर अगर तू एक वचन ही कह दे तो मेरा सेवक चंगा हो जाएगा। मैं भी पराधीन मनुष्य हूं; और सिपाही मेरे हाथों में है; और जब एक को कहता हूं जा तो वह जाता है; और दूसरे से कहता हूं कि आ तो आता है; और अपने किसी दास को कि यह कर तो वह उसे करता है” (लूका ७:६-८)।
“मैं भी पराधीन मनुष्य हूं” यह कहकर सूबेदार पहचान लेता है कि यीशु का अधिकार आत्मिक क्षेत्र में क्या है, वह वैसा ही है जो उसके स्वयं के अधिकार रोमी सेना के क्षेत्र में है। इन दोनों स्थिति में जो अधिकार है वह किसी ऊंचे आधार के अधीन है। सूबेदार के लिए वह आधार था रोमी राजा । यीशु के लिए वह आध् ार था पिता परमेश्वर।
यह भी ध्यान दें कि सूबेदार ने यह नहीं कहा कि “मुझे अधि ाकार है” परन्तु यह कहा कि “मैं पराधीन हूं।” उसने वचन की एक मूल सिद्धांत को पक्का कियाः अधिकार को प्राप्त करने के लिए एक व्यक्ति को अधिकार के अधीन रहना है। इसलिए अधिकार हमेशा नीचे की ओर बहता है।
अपने पुनरुत्थान के बाद, यीशु ने कहा,
“स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है” (मत्ती २८ः१८)।
इस ब्रह्माण्ड के हर परिस्थितियों के लिये अधिकारों की एक कड़ी सी है जो यीशु के जरिये पिता परमेश्वर से आती है। पौलुस समझाते हुए कहते हैं कि इस पृथ्वी के हर परिवार के लिए एक अधि ाकार की कड़ी को बनाया गया हैः “तुम आप ही विचार करो, क्या स्त्री को उघाड़े सिर परमेश्वर से प्रार्थना करना सोहना है” (१ कुरिन्थियों ११:१३)? एक विवाहित जोडे के विषय में कहा जाये तो परम अधिकार परमेश्वर पिता के पुत्र यीशु के द्वारा पुरुष पर आता है और पति के द्वारा पत्नी पर।
यह सत्य जो एक घर के लिये है यही जीवन के हर कार्यक्षेत्र पर भी लागू होता है। हर एक मसीही को सही अधिकार के अधीन रहकर सुरक्षा की आवश्यकता होती है। ‘एक मसीही सुरक्षित नहीं रहता अगर वह किसी अधिकार के अधीन नहीं है।’
कलीसिया में अधिकार
परमेश्वर की सबसे प्रथम मांग अर्थात मसीह का अधिकार जो हर कलीसिया में उसके जरिये कार्य करता है, उसका आदर करना हमें सुरक्षा प्राप्त करने के लिए मदद करता है। पौलुस कहता है कि परमेश्वर ने यीशु को इसलिए दिया कि वह “उसे सब वस्तुओं पर शिरोमणि ठहराकर कलीसिया को दे दें” (इफिसियों १:२२)
। कलीसिया के लिए ग्रीक शब्द है ‘एकलेसिया’ (ekklesia) इसका वास्तविक अर्थ में एकलेसिया एक राज्य (जैसे एथेन्स) के नागरिकों के एक समूह को दर्शाता है जिन पर शहर के शासन के कार्यभार सौंपे गये थे। जब यह मसीही पर लागू होता है, तो दर्शाता है कि यीशु ने उद्धार के कार्यों को करते समय कलीसिया के जरिये अधिकार का प्रयोग किया, जो उसका एकलेसिया है।
मसीही के अधिकार के अधीन का अर्थ है कि उसकी कलीसिया से जुड़े रहें। हम मसीह के अधिकारों का आदर नहीं करेंगे अगर हम उस कलीसिया पर रखे अधिकार का आदर न करें।
इसका उदाहरण पौलुस प्रेरित ने स्वयं की नियुक्ति से दिया है। पौलुस स्वयं से कहता है
“पौलुस की ओर से जो हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर और हमारी आशा-स्थान मसीह यीशु की आज्ञा से मसीह यीशु का प्रेरित है, तीमुथियुस के नाम जो विश्वास में मेरा सच्चा पुत्र है” (तीमुथियुस १:१) ।
अन्तिम अधिकार जो पौलुस के प्रेरित होने का था वह एक निर्णय था जिसे स्वर्ग में पिता परमेश्वर और परमेश्वर पुत्र ने लिया था। परन्तु प्रेरित की परिभाषा है “वह जो भेजा गया”। पौलुस का प्रेरित होने का दायित्व तब तक प्रभाव में नहीं आया जब तक उसे अन्ताकिया के एक स्थानीय कलीसिया में भेजा न गया।
प्रेरित १३:१ में पौलुस (जो अब भी शाऊल कहलाता था) पांच ऐसे व्यक्तियों की सूची में चुन लिया गया जो भविष्यवक्ता और उपदेशक थे। फिर पवित्र आत्मा की अगुवाई में उनमें से तीन व्यक्तियों ने बरनवास और शाऊल के ऊपर हाथ रखा और उन्हें भेजा गया। उसके पश्चात ही दोनों प्रेरित कहलाने लगे (देखें प्रेरित १४:४-१४)। पौलुस का प्रेरित होना स्वर्ग पर निश्चित की गई परन्तु वह प्रभाव में तब आया जब पौलुस ने उसे धरती में स्वीकार किया और एक स्थानीय कलीसिया के लिये कार्य किया।
पचास वर्ष के अन्तर्देशीय सेवकाई में, मैंने हमेशा मसीह के अधिकार का आदर किया है जो स्थानीय कलीसिया के द्वारा कार्य करता है। पहले लिडिया (मेरी पहली पत्नी), मैं, फिर रूत (मेरी दूसरी पत्नी) हमेशा हमारे स्थानीय कलीसिया में जाने जाते थे। जब कभी भी हम अपने मिशन यात्रा में जाते हैं, तो हम औपचारिक रूप से उस स्थानीय कलीसिया द्वारा भेजे जाते। जब हम लौटते तो उस कलीसिया को एक रिपोर्ट पेश करते। यही पौलुस और बरनवास द्वारा किया गया जो प्रेरितों के काम १३:३ और १४:२६-२७ में है।
कुछ मसीही एक संपूर्ण कलीसिया की खोज करते हैं। मैं यह बताना चाहूंगा कि मैंने ऐसी एक भी कलीसिया नहीं देखी। लेकिन मैं यह भी बताना चाहूंगा कि अगर मुझे ऐसी एक कलीसिया मिल जायेगी तो मैं उसमें शामिल नहीं होऊंगा, क्योंकि मेरे शामिल होने के बाद वह एक सम्पूर्ण कलीसिया कभी नहीं रहेगी। परन्तु मैं आभारी हूं उन ‘अपूर्ण’ स्थानीय कलीसिया का जिनसे मुझे हर अच्छी बातें सीखने को मिली ।
एक शरीर के सदस्य
पौलुस एक और चित्र दर्शाता है इस पृथ्वी पर परमेश्वर के जनों का। वह कहता है “कलीसिया... उसकी (मसीह की) देह है” (इफिसियों १:२२-२३) ।
पौलुस और स्पष्ट रूप से इस विषय को, कुरिन्थियों १२:२७ में बताते हैं : “तुम सब मिलकर मसीह की देह हो, और अलग-अलग उसके अंग हो।” उन्होंने शारीरिक देह के कई उदाहरण दिए जिसमें इस बात पर बल दिया गया कि हम सब को एक दूसरे की आवश्यकता है।
सबसे पूर्ण और अधिकार से परिपूर्ण चित्र एक कलीसिया का जो मसीह के देह के रूप में है उसे दिखाया गया है इफिसियों की पत्री में। यह बहुत विशेष बात है कि पौलुस निरंतर मसीही को बहुवचन में कहता है। वास्तव में उसे एक अकेले या व्यक्तिगत मसीही से कुछ नहीं कहना है।
इफिसियों १:३-१२ में उदाहरणतः पौलुस यह कहता है किः
“परमेश्वर नें ‘हमें’ आशीष दी—-‘हमें’ चुन लिया—-‘हम’ उसके निकट हो—-‘हमें’ अपने लिए ठहराया—-‘हम’ उसके लेपालक पुत्र ठहरे ‘हमे’ छुटकारा मिला जिसे उसने सारे ज्ञान और समझ सहित ‘हम’ पर बहुतायत से किया कि ‘हम’ उसकी महिमा की स्तुति के कारण हो”।
अगर यह अध्याय पूरा पढेंगे तो यह बात स्पष्ट होती है कि यही वह संदेश है शुरुआत से आखिरी तक। वहां किसी भी व्यक्तिगत लोगों के लिए कोई वायदा या प्रार्थना नहीं है। सिर्फ आखिरी के छहः आयतों में एक संक्षिप्त विवरण दिया है, पौलुस स्वयं के लिये प्रार्थना मांग कर समाप्त करता है।
इस मसीह के देह पर केन्द्रित बातों का अन्त इफिसियों ६:१०-१८ में दिया है, यहां पौलुस हमाारे आत्मिक लड़ाई के विषय में कहते है। आयत १२ में हर महत्वपूर्ण शब्द बहुवचन में है दोनों ही जो परमेश्वर के जन के लिये है और उन ताकतों से जो हमसे मल्लयुद्ध करते है। हम मल्लयुद्ध करते हैं प्रधानों से अधिकारियों अंधकारों के हाकिम और दुष्टता की आत्मिक
आत्मिक लड़ाई यह बताती है कि यह लड़ाई किसी व्यक्तिगत मसीही की नहीं बल्कि यह दो सेनाओं का युद्ध है। इसमे ‘स्वयं खोजी’ के लिए कोई स्थान नहीं क्योंकि वे अपने स्वयं की लक्ष्य को केन्द्रित करते हैं। विजय उस बात पर होगी जब परमेश्वर के जन एक होकर एक देह के अंग बनकर कार्य करे। यह हमेशा वचन के अधिकार के सामने समर्पण करने के लिए अनुशासन और तैयारी की मांग करता है।
अधर्म को समझें
इस युग के अन्त के एक लक्षण के कारण यीशु ने अपने चेलों को जो चेतावनी दी, वह है अधर्म में पड़नाः
“और अधर्म के बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठण्डा हो जाएगा” (मत्ती २४:१२) ।
यीशु बतात हैं कि कई मसीही अधर्म से प्रभावित होकर परमेश्वर के प्रेम से ठण्डे हो जाते है।
अधर्म का मूल तत्व है अधिकार को अस्वीकार कर देना। यही आज के व्यवहारों में अधिक पाया जाता है। किसी भी नियम या व्यवस्था को पंसद नहीं किया जाता जो किसी के व्यक्तिगत जीवन में दखल अंदाज करते है। लोग स्पष्ट रूप से अपने ‘हक’ पर ज्यादा जोर देते हैं फिर भी वे अपने जिम्मदारियों को निभाने में असंतुष्टि जाहिर करते हैं। कभी-कभी यह किसी अव्यवस्था के कारण भी होते है। एक मसीही होने के नाते हमें इन स्वभावों से अपने आप को सुरक्षित रखना है। हमें अपने संसार के प्रति सम्मान व्यक्त करना होगा।
परन्तु सबसे पहले हमें परमेश्वर पिता और हमारे उद्धारकर्ता यीशु के प्रति आदर और आज्ञाकारिता को उत्पन्न करना है। और यह आदर और आज्ञाकारिता के स्वभाव का जो पत्र व्यवहार है वह है पवित्र शास्त्र।
यीशु ने कहा
“यदि कोई मुझ से प्रेम रखे, तो वह मेरे वचन को मानेगा... जो मुझसे प्रेम नहीं रखता वह मेरे वचन को नहीं मानता (यूहन्ना १४:२३-२४)।
चाहे हम परमेश्वर से प्रेम रखने का दावा करे या लम्बी प्रार्थना करें, या दीर्घ प्रचार करें, परन्तु आखिरकार हम परमेश्वर का आदर नहीं करते अगर हम उसके वचन का पालन नहीं करते। हमारे अध् ार्म में भी हमें एक नया निर्णय लेना है कि हम स्वयं को बांधकर नहीं रखेंगे और पूर्ण रूप से पवित्र शास्त्र के अधिकार के आगे स्वयं को समर्पित करेंगे। “हर एक पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है” (२ तीमुथियुस ३ः१६)।
हमारे व्यक्तिगत संबंधों में छिपा अधर्म
परमेश्वर की दूसरी और तीसरी मांग जो हमारे व्यक्तिगत संबंधों की सुरक्षा को निश्चित करती है, वह हैः क्षमा और समर्पण। यही दो स्थान है जहां परमेश्वर के और उसके वचन के प्रति हमारे समर्पण की परख होती है। और इस विषय में यीशु ने कुछ सख्त नियम रखे हैं।
जैसे कि किसी दूसरे को क्षमा करने के विषय में, वह कहता हैः
“और जब कभी तुम खड़े हुए प्रार्थना करते हो, तो यदि तुम्हारे मन में किसी की ओर से कुछ विरोध हो तो क्षमा करोः इसलिए कि तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा करे। और यदि तुम क्षमा न करो तो तुम्हारा पिता भी जो स्वर्ग में है, तुम्हारा अपराध क्षमा न करेगा”(Mark 11:25-26)
मत्ती ६:६-१३ के अपने सिखाये गये प्रार्थना के बाद फिर से यीशु अपने चेलों से कहते हैंः
“इसलिए यदि तुम मनुष्य के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा। और यदि तुम मनुष्यों के अपराध क्षमा न करोगे, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा न करेगा” (मत्ती ६ः१४-१५)।
हमें हमेशा यह ध्यान में रखना चाहिए कि किसी दूसरे व्यक्ति को क्षमा करना एक भावना को व्यक्त करना नहीं होता परन्तु यह एक अन्य संयम का कार्य है। इसके लिए हम पवित्र आत्मा पर निर्भर हो सकते है, आत्मा जो “सामर्थ और प्रेम और संयम की आत्मा है” (२ तीमुथियुस १:७)।
आत्म संयम से एक प्रकार के स्वभाव को उत्पन्न करना होगा जो पौलुस इफिसियों ५:२१ में बताते हैः “और मसीह के भय से एक दूसरे के अधीन रहो।” एक दूसरे के प्रति यह अधीनता एक अच्छे संबंध को बनाने में मदद करती है, चाहे वह संबंध घर में हो या कलीसिया में।
जो मसीही दूसरों को क्षमा करने या अधीन रहने से इंकार करते हैं वे पवित्रशास्त्र का अनादर करते हैं। उनकी मूल समस्या है ‘अधर्म’। वे अपने आपको इस संसार की आत्मा के अधीन बना देते हैं। वे लोग स्वयं को दुष्ट दूतों द्वारा चोट पहुंचाने के लिये स्वयं को दे देते हैं, जो स्वर्गीय मंडल में उनके घोर शत्रु हैं।
आज्ञाकारिता और बचाव
हमारा सामना तीन ऐसे क्षेत्र से हुआ जिसमें पवित्रशास्त्र एक स्पष्ट और बिना समझौता किये परमेश्वर की मांगों को प्रगट करता है जो हर मसीही के लिये लागू होता है। पहला मसीह के अधिकार का आदर करना जो किसी स्थानीय कलीसिया के द्वारा चलायी जाती हे। दूसरा, सम्पूर्ण क्षमा उन सब के लिये जिन्होंने हमसे बुरा किया या हमें चोट पहुंचाया। तीसरा, मसीही अंग के अधीन रहने का स्वभाव है।
इन तीनों क्षेत्रों की आज्ञाकारिता एक मसीही को पवित्रशास्त्र के अधि ाकारों से ढांप लेती है जो स्वर्गीय मंडल के शैतानी दूत से हमें सुरक्षा प्रदान करती है। अनाज्ञाकारिता और विपरीतता एक मसीही को ऐसे आक्रमण में चोट पाने के लिये अनिवार्य बना देती है।
यह अध्याय मैंने व्यक्तिगत अनुभवों से लिया है। मसीह की देह में कई वर्षो के अनुभव के आधार से मैं मानता हूं कि पवित्र शास्त्र के इन तीनों क्षेत्र का आज्ञा न मानने से एक गम्भीर और दुखद अनुभव का सामना करना पड़ सकता है। मुझे चोट पहुंचती है। मैं यह प्रार्थना करता हूं कि परमेश्वर हमको मसीह के अधिकारों का आदर करने का एक बोझ दें, वह अधिकार जो उनकी कलीसिया के ऊपर है, और हम में एक नये स्वभाव को दें जो क्षमा और अधीनता का है।
In my next letter I will deal with the weapons of our warfare.
कोड: TL-L027-100-HIN