छले अध्याय में मैंने यह दिखलाया कि मसीही को अपनी आराधनाओं में दूतों के उपस्थिति पर विश्वास करना चाहिए, दोनों प्रकार के दूतों की -अच्छे और बुरे भी। विशेषकर, पवित्रशास्त्र नूह के दिनों के पहले और उसके बाद हुए कार्यों को प्रगट करती है जो गिरे हुए दूतों के द्वारा इस धरती पर हुई।

मैंने लूसिफर के द्वारा पहले विद्रोह के बारे में भी वर्णन किया जो यशायाह १४:१२-१५ में है। इस अध्याय में मैं उस विद्रोह और उसके परिणामों का परीक्षण करूंगा। लूसिफर के विद्रोह की सूक्ष्म जानकारी यहेजकेल २८ः१-१६ में दिया गया है, इसमें दो व्यक्तियों के बारे में कहा गया है, पहला सोर के प्रधान और दूसरा सोर का राजा ।

शैतान के उद्देश्य और साधन

सोर के प्रधान अपने आप को परमेश्वर होने का दावा करता है। परन्तु यहेजकेल में उसे एक ऐसा व्यक्ति बताया गया जो चढ़ाई करने वालों के हाथों मारा जाएगाः

“तब क्या तू अपने घात करनेवाले के सामने कहता रहेगा कि तू परमेश्वर है? तू अपने घायल करनेवाले के हाथ में ईश्वर नहीं मनुष्य ही ठहरेगा।”

वहीं दूसरी तरफ सोर के राजा एक दूत है जो स्वर्ग में एक सर्वोच्च स्थान पर हैः “तू परमेश्वर की अदन नाम बारी में था; तेरे पास आभूषण, माणिक, पद्यराग, हीरा, फिरोजा, सुलैमानी मणि, यशब, नीलमणि, मरकद, और लाल सब प्रकार भांति के मणि और सोने के पहिरावे थेः तेरे डफ और बांसुलियां तुझी में बनाई गई थी।

तू छाने वाला अभिषिक्त करूब था, मैनें तूझे ऐसा ठहराया कि तू परमेश्वर के पवित्र पर्वत पर रहता था; तू आग सरीखे चमकने वाले मणियों के बीच चलता फिरता था। जिस दिन से तू सिरजा गया और जिस दिन तक तुझमें कुटिलता न पाई गयी, उस समय तक तू अपनी सारी चाल चलन में निर्दोष रहा”

(यहेजकेल २८ः१३-१५) । लूसिफर तेज से भरा था परन्तु वह एक ऐसी सृष्टि था जिसने अपने सृष्टिकर्ता से विद्रोह किया।

लैव्यव्यवस्था में हम देखते हैं; परन्तु लेनदेन की बहुतायत के कारण तू उपद्रव से भरकर पापी हो गया। लैव्यव्यवस्था १६ः१६ इसमें ‘लेन देन’ के अर्थ का एक शब्द है “लूतरा” जो अपने लोगों में फिरा करता है। यह बताता है कि लूसिफर हर दूतों के पास गया जो उससे नीचे के श्रेणी के थे, और वह उनकी परमेश्वर के प्रति विश्वस्तता को नष्ट करने की कोशिश करने लगा और अपने साथ विद्रोह में शामिल होने के लिए उकसाता रहा। जहां तक कि उसने यह सुझाव भी दिया होगा कि “परमेश्वर तुम्हारा महत्व नहीं समझता। अगर मैं परमेश्वर के स्थान में होता तो मैं तुमको कई ऊंचा पद देता।”

परमेश्वर-जिसकी आंखों के सामने सब खुली और बेपरद है। देखें ईब्रानियों ४:१३ में, उसे निश्चित रूप से लूसिफर की सब हरकतों का अनुमान था, और वह उसे समय दे रहा था ताकि वह अपने विद्रोह की चालों को स्पष्ट कर सके :

“सुन्दरता के कारण तेरा मन फूल उठा था; और वैभव के कारण तेरी बुद्धि बिगड गई थी” (यहेजकेल २८ः१७)।लूसिफर को अनोखे ज्ञान और सौन्दर्य ने उसके हृदय में घमंड भर दिया और यही उसके गिरने का कारण बना।

यही उद्देश्य था लूसिफर के लिए यशायाह १४:१३-१४ मेंः

“तू मन में कहता तो था कि मैं स्वर्ग पर चढूंगा; मैं अपने सिंहासन को ईश्वर के तारागण से अधिक ऊंचा करूंगा; और उत्तर दिशा की छोर पर सभा के पर्वत पर विराजूंगा; मैं मेघों से भी ऊंचे स्थानों के ऊपर चढूंगा, मैं परम प्रधान के तुल्य हो जाऊंगा।”

यह बात हमारे मन में हमेशा रखनी चाहिये कि ‘घमंड’ के कारण ही लूसिफर का पतन हुआ। यही शैतान की मुख्य प्रवृति है जिससे वह मनुष्यों को पाप करने में प्रलोभित करता है। अन्य पापों से ज्यादा घमंड ही ऐसा कारण है जिससे कई पुरुष और स्त्रियों का पतन हुआ।

सोर के प्रधान (एक व्यक्ति) और सोर के राजा (एक स्वर्गीय प्राणी) के संबध हमें यह दर्शाती है कि यही वह तरीका है जिससे शैतानी दूत जो आकाश मंडलों में है वह पृथ्वी के राजाओं पर नियंत्रण कर पृथ्वी को प्रभावित करते हैं।

इस संबंध में एक उदाहरण है जो शैतान और ‘मसीह के विरोध गी’ के बीच होगा। जिस प्रकार यह मैंने पिछले अध्याय में बताया कि शैतान सारे संसार को अपनी आराधना कराने के लिए ‘मसीह-विरोध गी’ का उपयोग करेगा । “और उन्होंने अजगर की पूजा की, क्योंकि उसने पशु को अपना अधिकार दे दिया था और यह कहकर पशु की पूजा की, कि इस पशु के समान कौन है”(प्रकाशितवाक्य १३:४)?

और क्योंकि आराधना सिर्फ और सिर्फ परमेश्वर की ही होती है तो सारे संसार की आराधना को हासिल कर शैतान एक अन्तिम दावा करने की कोशिश करेगा वह जो यथार्थ रूप में करना चाहता है, वह है परमेश्वर की बराबरी।

शैतान के राज्य का स्थान

शैतान और उसके साथ वाले दूत गण जो परमेश्वर से विद्रोह करने लगे, वे सब स्वर्ग से निकाल दिये गए परन्तु वे पृथ्वी पर नहीं गिराये गये। पौलुस उनका विवरण देते हुए कहता है “दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में है” (इफिसियों ६:१२)।

कुलुस्सियों १:१६ में, पौलुस चार मुख्य स्वर्गीय प्राणियों की सूची बनाता है जिनकी सृष्टि परमेश्वर मसीह के द्वारा कियाः सिंहासन, प्रभुताएं, प्रधानताएं और अधिकार। इफिसियों ६ः१२ में दो ऊँचे पदों के बारे मे पौलुस बताते है जो शैतान के विद्रोह में शामिल हो गये, वे है, प्रधानताए और अधिकार । यह संकेत करता है कि न तो सिंहासन और न ही प्रभुता को शैतान ने अपने विद्रोह में शामिल होने के लिए फुसलाया।

अपने प्रारम्भिक वाक्य में ही बाईबिल बतलाती है कि पृथ्वी एक वचन में कहा गया है परन्तु आकाश बहुवचन मेंः “आदि में परमेश्वर ने आकाश (बहुवचन) और पृथ्वी (एक वचन) की सृष्टि की” (उत्पत्ति १:१)। पौलुस एक व्यक्ति के बारे में कहता है “तीसरे स्वर्ग तक उठा लिया गया” (२ कुरिन्थियों १२ः२)। स्वभाविक रूप से पहले और दूसरे के बिना तीसरा स्वर्ग नहीं हो सकता।

पौलुस कहता है कि यह व्यक्ति “स्वर्गलोक पर उठा लिया गया, और ऐसी बाते सुनी जो कहने की नहीं और जिस का मुंह पर लाना मनुष्य को उचित नहीं” (२ कुरिन्थियों १२ः४)। यह दिखाती है कि तीसरा और सबसे ऊंचा स्वर्ग एक पवित्रता से परिपूर्ण स्थान है, जहां स्वयं परमेश्वर निवास करता है। अगर पहला स्वर्ग पृथ्वी से दिखता है, तो दिखने वाला पहला स्वर्ग और तीसरा स्वर्ग, जहां परमेश्वर का वास है इनके बीच में दूसरा स्वर्ग स्थित है। मैं विश्वास करता हूं कि यह बीचवाला स्वर्ग ही शैतान के राज्य का स्थान है। इस बात की स्पष्टता दानिय्येल की किताब

Daniel’s Three-week Fast

में होती है। दानिय्येल १०ः२-१२ में, जब दानिय्येल तीन हफ्तों तक शोक और उपवास कर रहा था, तब एक स्वर्गीय पुरुष उसे दिखाई दिया और जिसने उससे कहा : “हे दानिय्येल, मत डर, क्योंकि पहिले ही दिन को जब तू ने समझने-बुझने के लिये मन लगाया और अपने परमेश्वर के सामने अपने को दीन किया, उसी दिन तेरे वचन सुने गए, और मैं तेरे वचनों के कारण आ गया हूं” (दानिय्येल १०:१२) ।

उस स्वर्गीय पुरुष ने तीन और स्वर्गीय पुरुषों के बारे में जिक्र कियाः मीकाएल (परमेश्वर का प्रधान दूत), फारस का प्रधान और यूनान का प्रधान। जो आखिरी दो हैं वे शैतान के प्रधान दूत है (देखें दानिय्येल १०:१३:२१)।

दानिएल के पास पृथ्वी पर पहुंचने के लिये परमेश्वर के दूत को शैतानी दूतों का सामना करना पड़ा। यह स्पष्ट करती है कि शैतान का राज्य “स्वर्गीय मंडल” में स्थित है जो तीसरे स्वर्ग जहां परमेश्वर का वास है और पहले स्वर्ग जो पृथ्वी से दिखता है, इन दोनों के बीच में है। यह प्रार्थना व आत्मिक लड़ाई के कई महत्वपूर्ण सच्चाई को प्रगट करती हैः

  1. १. इस घटना का पहल पृथ्वी पर दानिय्येल के द्वारा की गई। उसी की प्रार्थना और उपवास ने परमेश्वर के दूतों के गतिशील किया जो स्वर्गीय मंडल में है।
  2. दानिएल के पास पृथ्वी पर पहुंचने के लिये परमेश्वर के दूत को शैतानी दूतों का सामना करना पड़ा। यह स्पष्ट करती है कि शैतान का राज्य “स्वर्गीय मंडल” में स्थित है जो तीसरे स्वर्ग जहां परमेश्वर का वास है और पहले स्वर्ग जो पृथ्वी से दिखता है, इन दोनों के बीच में है। यह प्रार्थना व आत्मिक लड़ाई के कई महत्वपूर्ण सच्चाई को प्रगट करती हैः२. शैतानी राज्य के दूतों ने विरोध किया उस दूत का जो स्वर्ग से था (जहां परमेश्वर का वास है)।
  3. ३. यह शैतानी दूत इतने शक्तिशाली थे कि परमेश्वर के दूतों को इनके विरोध को तोड़ने के लिये तीन हफ्ते लगे।
  4. ४. दानिय्येल की प्रार्थना ने अन्तिम विजय के लिये एक

सबक जो हम सीख सकते हैं

इस युद्ध में हमारी प्रार्थनाओं को और भी प्रभावशाली बनाने के लिए हमें दानिएल की प्रार्थना से महत्वपूर्ण सबक मिलती है :

  1. १. हमारी प्रार्थनाएं परमेश्वर के दूतों को जो स्वर्ग में हैं उन्हें गतिशील करती है। परमेश्वर कभी कभी हमारे लिये इन्तजार करता है कि हम पहल करें।
  2. २. परमेश्वर के सिंहासन तक पहुंचने के लिए हमारी प्रार्थनाओं को शैतान के राज्य से होकर गुजरना पड़ता है वो राज्य जो स्वर्गीय मंडल में है। इसके लिए हमारी प्रार्थनाओं को आलौकिक रूप से सशक्त करना हैः “क्योंकि परमेश्वर का राज्य बातों में नहीं, परन्तु सामर्थ में है” (१ कुरिन्थियों ४:२०)।
  3. ३. हमारी प्रार्थनाओं को स्तुति और धन्यवादों से प्रेरित करना होगा। यह एक “बूस्टर रोकेट” की तरह हमारे प्रार्थनाओं को परमेश्वर के सिंहासन तक ले जाते है। विनती, प्रार्थना निवेदन के साथ धन्यवाद भी दें (१ तीमुथियुस २ः१)।
  4. ४. उपवास हमारे आत्मिक संवेदनशीलता को बढ़ाता है और हमारी प्रार्थना में आलौकिक सामर्थ को भर देता है। कुछ शैतानी ताकतों पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रार्थना के साथ उपवास जरूरी होता है।

अगले अध्याय में मैं बताऊंगा उन आत्मिक सुरक्षा का जो परमेश्वर ने हमें दिया है ताकि हम शैतान के राज्य के और उन विद्रोही दूतों का सामना कर सकें।

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