Spirit, Soul and Body

Derek Prince
*First Published: 1996
*Last Updated: मार्च 2026
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गन्ति का परमेश्वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे; और आत्मा और प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक पूरे पूरे और निर्दोष सुरक्षित रहैं” और निर्दोष सुरक्षित रहैं” (१ थिस्सलुनीकियों ५ः२३)।
यह पौलुस की प्रार्थना रही है कि मसीही जन पूरी रीति से पवित्र रहें और फिर पौलुस तीन बातों की व्याख्या करते है जो मनुष्य के व्यक्तिव को पूर्ण बनाती है, वे है : आत्मा, प्राण और देह।
हमारे व्यक्तित्व के इन तीन मूलों की श्रेष्ठता बहुत से मसीही नहीं समझते हैं। तौभी पवित्रशास्त्र हमें प्रबंध करती हैं एक अपूर्व ‘दर्पण’, जो उनके प्रकृति और परस्पर संबंध को प्रकट करती है, और हमें दिखाती है कि किस प्रकार हर एक कार्य किया जाता है। इस दर्पण को उपयोग में न लाने से हम आंतरिक निराशा व बेसुरेपन को जगह देते है।
मनुष्य की सृष्टि के वक्त परमेश्वर ने कहा, “हम मनुष्य को अपने स्वरुप के अनुसार अपनी समानता मे बनाएँ” (उत्त्पति १:२६)। स्वरुप दर्शाती है मनुष्य की बाहरी आकृति। परन्तु यह किसी और जीव के लिए सच नहीं है। मनुष्य परमेश्वर के बाहरी आकृति को प्रतिबिंबित करता है। यह उचित था कि परमेश्वर का पुत्र इस जगत में मनुष्य के रुप में आया न की बैल या किसी कीड़े की - और न ही किसी स्वर्गीय जीव की, जैसे साराप।
‘समानता’ दर्शाती है मनुष्य के आंतरिक प्रकृति को । पवित्रशास्त्र परमेश्वर की त्रिएकता को बतलाता हैः पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा। उसी प्रकार वह दर्शाता है कि मनुष्य भी त्रित्व अस्तित्व के है, जो है आत्मा, प्राण और देह ।
मनुष्य की सृष्टि का प्रारुप यह दर्शाता है कि किस प्रकार त्रितत्व की प्रकृति अस्तित्व में आईः “और यहोवा परमेश्वर ने मनुष्य को भूमी की मिट्टी से रचा और उसके नथनों में जीवन का श्वास फूंकने से मनुष्य एक जीवित प्राणी बन गया” और सही रीति से कहा जाये तो जीवित आत्मा बन गया (उत्पत्ति २:७)।
परमेश्वर के सांस फूंकने के द्वारा मनुष्य में आत्मा का समावेश हुआ। उसका देह मिट्टी से बनाया गया और एक जीवित देह मे परिवर्तित किया गया। और क्षण भर में वह एक जीवित आत्मा बन गया।
यही आत्मा बना अहम् या कह सकते है एक व्यक्तित्व । ज्यादातर इसे परिभाषित किया जाता है तीन तत्वों में : इच्छा, ज्ञान और भावनायें। और यह उत्तरदायी होता है व्यक्तिगत निर्णय लेने के लिए और तीन सूक्तियों मे इसे व्यक्त कर सकते है “मैं चाहता हूँ”, “मैं सोचता हूँ” और “मैं महसूस करता हूँ”। अगर परमेश्वर की आलौकिक कृपा न हो तो हमारा व्यवहार इन तीन प्रवृतियों से नियंत्रित होते हैं।
मनुष्य की सृष्टि परमेश्वर के साथ एक व्यक्तिगत सहभागिता के लिए किया गया; परन्तु उसके पापमय् अनाज्ञाकारिता ने उसके व्यक्तित्व के तीनों तत्वों पर एक भयंकर परिणाम उत्पन्न किया।
“पाप के परिणाम और उद्धार”
परमेश्वर से वह दूर कर दिया गया और मनुष्य की आत्मा मृत हो गई। परमेश्वर की चेतावनी यहाँ पूर्ण हुईः “पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खानाः क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाए उसी दिन अवश्य मर जायेगा” (उत्पत्ति २:१७)।
आदम की देह अब दुर्जनता के अधीन हो गया था, जो है बीमारी, सड़न और मौत, और धीरे-धीरे कार्य करना बन्द हो गया; उसकी मृत्यु नौ सौ वर्ष के पश्चात् हुई। परमेश्वर से अवज्ञाकारी होने और अपनी इच्छाओं को उनके लिए व्यक्त करने से, मनुष्य अपनी आत्मा में एक विद्रोही बन गया। उस समय से हर व्यक्ति जो , आदम के वंशक्रम से है उसमें विद्रोह की प्रकृति हैं।
इफिसियों की पत्री २:१-३, पौलुस व्यक्त करते है कि विद्रोह के परिणाम को जिसने हम सबको प्रभावित किया हैं :
और उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थें। जिन में तुम पहिले इस संसार की रीति पर, और आकाश के अधिकार के हाकिम अर्थात् उस आत्मा के अनुसार चलते थे, जो अब भी आज्ञा न मानने वालों में कार्य करता हैं। इन में हम भी सब पहिले अपने शरीर की लालसाओं में दिन बिताते थे, और शरीर, और मन की लालसाएं पूरी करते थे, और लोगों के अपने स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान बनें।
और पाप का परिणाम यह था कि हम सब अपने प्राणों में मृत हुए। हमारी आत्मा में हम परमेश्वर से विद्रोह करने लगे। हमारी देह भी बीमारी, सडन और मृत्यु से ग्रस्त हुई।
तौभी परमेश्वर का असीम प्रेम ऐसा है कि वह निरन्तर मनुष्य से साहचर्यता को पुणःस्थापित करने के मार्ग ढूँढता हैं। “क्या तुम यह समझते हो, कि पवित्रशास्त्र व्यर्थ कहता है? जिस आत्मा को उसने हमारे भीतर बसाया हैं, क्या वह ऐसी लालसा करता है जिसके प्रतिफल डाह हो” (याकूब४:५) । इसके अतिरिक्त, यीशु के सूली पर दिये गये बलिदान के द्वारा परमेश्वर ने उन खोये हुए साहचर्यता को पुणःस्थापित करने के लिए एक मार्ग खोल दिया।
Effects of Salvation
पौलुस समझता है किस प्रकार हम अपने प्राणों में मुक्ति के
“परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है; अपने उस बड़े प्रेम के कारण, जिस से उस ने हम से प्रेम किया। जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे तो हमें मसीह के साथ जिलाया” (इफिसियों २ः४-५)।
हमारे प्राण परमेश्वर से जुड़ गये और एक बार फिर जी उठा। साथ ही साथ हमारी आत्मा ने पश्चताप और विश्वास के द्वारा विद्रोह की प्रवृत्ति से छुटकारा प्राप्त किया और परमेश्वर से मेल मिलाप हो गया।
“क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे? और केवल यही नहीं, परन्तु हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा जिस के द्वारा हमारा मेल हुआ है, परमेश्वर के विषय में घमण्ड़ भी करते हैं” (रोमियों ५:१०-११) ।
जब हम समझने लगते है कि हमने हमेशा परमेश्वर से विद्रोह किया, तब यह भी स्वीकार करते है कि बिना पश्चताप् के कोई मुक्ति नही है।
पश्चताप् का अर्थ है कि हम अपने विद्रोह को छोड़ते हुए परमेश्वर के राज्य के सामने अपने आपको समर्पित कर दें। मुक्ति या मोक्ष शरीर के लिए भी प्रबंध करते हैं। पाप के दासत्व से छुटकारा मिलने के बाद हमारा शरीर एक मंदिर बन जाता है जहाँ पवित्रात्मा का निवास होता है और हर अंग ध् गार्मिकता का साधन हो जाता है (रोमियों ६ः१३) । अन्त में, मसीह के पुनर्नागमन पर हमारा शरीर परिवर्तित होकर मसीह के समान एक अमर शरीर हो जायेंगा।
“शिष्यता की अनिवार्यताएँ”
यह हमारे धार्मिक युद्ध में किस प्रकार उपयोग में आता है? यीशु ने अपने शिष्यों को इसलिए नियुक्त किया कि वह हर राज्यों में जाकर चेलें बनाए। उस ने उनसे कलीसिया के सदस्यों को बनाने को न कहा। काफी सतर्कता से, अगला कदम शिष्यता है जो एक योद्धा के व्यक्तित्व को बनाने के लिए आवश्यक हैं। और इसे आवश्यकता होती है हमारे व्यक्तित्व से एक मौलिक जवाब जैसे देह, आत्मा और प्राण।
रोमियों १२:१ में हमारे शरीर की आवश्यकताओं का वर्णन किया गया है “इसलिए हें भाईयों, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिलाकर बिनती करता हूँ कि अपने शरीरों को जीवित और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओं : यही तुम्हारी आत्मिक सेवा हैं।” हमें चाहिये कि हम अपने देहों को परमेश्वर की वेदी पर बलि होने के लिए समर्पित करें जैसे पुराने नियमों मे इस्त्राएली जानवरों को वेदी पर बलि चढ़ाते थे। परन्तु यहाँ एक महत्वपूर्ण भेद है। इस्त्राएलियों ने जानवरों को मारकर परमेश्वर को दिया। परन्तु हमारे शरीर जो हम परमेश्वर को देते है वह एक जीवित बलि होती हैं।
तथापि उस समय से हमारा शरीर हमारा नहीं रहता। वह परमेश्वर की पूंजी हो जाती है, और परमेश्वर का मंदिर भी। हम सिर्फ एक सेवक होते है जिन्हें परमेश्वर को जवाब देना होता है कि हम किस प्रकार इस मंदिर में रहें । दुर्भाग्यपूर्ण, बहुत से मसीही आज यह समझते है कि यह शरीर उनकी निजी सम्पत्ति है और मानो वे कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं।
हमारी आत्मा के विषय में यीशु ने उनकी आवश्यकताओं को मत्ती १६:२४-२५ में व्यक्त किया है :
“तब यीशु ने अपने चेलों से कहाः यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप का इन्कार करे और अपना क्रूस उठाए और मेरे पीछे हो ले। क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा; और जो कोई मेरे लिए अपना प्राण खोएगा, वह उसे पाएगा।”
हमारा क्रूस वह स्थान हैं जहाँ हमने मरने के लिए चुना हैं। इसे परमेश्वर ने हम पर नहीं डाला हैं। हम यह हमारे स्वइच्छा से उठाते हैं। यहाँ चाहिए कि हम अपनी आत्मा को इन्कार करें। इसका मतलब है कि हम न कहे हमारी आत्मा की उन तीन माँगों को, जो एक योद्धा के व्यक्तित्व का निर्माण है “मैं चाहता हूँ”, “मैं सोचता हूँ” और “मैं महसूस करता हूँ”। और फिर हम इन तीनों स्वभावों से नियंत्रित नहीं होते। उनकी जगह परमेश्वर के वचन व परमेश्वर की इच्छा ले लेती हैं जैसे-जैसे हम उसके वचनों और उद्देश्य का पालन करते हैं तब हम उस नये जीवन को पाते है जो यीशु हमें देना चाहता हैं। एक मृत्यु के ज़रिये ही हमारी आत्मा इस नये जीवन को पा सकती है।
और जब हम परमेश्वर की आवश्यकताओं को, जो हमारे देह और आत्मा में है, उसे पूरा करते है, तब हमारी आत्मा स्वतंत्र होकर परमेश्वर द्वारा संगति करने के लिए प्रवेश पा लेता है, जो उस समय से उत्तम है जब हम खोये हुए थे। देखें १ कुरिन्थियों ६ः१५-१६, यहाँ पौलुस मसीही जन को वेश्याओं से अनैतिक लैंगिक सम्बन्ध रखने के विरुद्ध चेतावनी देता है, क्योंकि इसका अर्थ होता है वेश्याओं के साथ एक तन होना । और फिर सीधे तुलना करते हुए वे कहते हैं, “और जो प्रभु की संगति में रहता है, वह उसके साथ एक आत्मा हो जाता है”।
उद्देश्य बहुत ही साफ है। छुडाई हुई आत्मा अब परमेश्वर के साथ संगति का आनन्द उठा सकती हैं और वह उतना ही गहरा होता है मानों तन का लैंगिगता में एक होना। सिर्फ आत्मा ही इस गहरे संगति का आनन्द उठाती है न कि प्राण या मुख्यतः
आराधना के ज़रिये हमारी आत्मा इस संगति तक पहुंचती है। यीशु ने कहाः
“सच्चे भक्त पिता का भजन आत्मा और सच्चाई से करेंगे..... परमेश्वर आत्मा है और यह जरुरी है कि उसके भजन करनेवाले आत्मा और सच्चाई में भजन करें” (युहन्ना ४ः २३,२४)।
यहाँ उसने व्यक्त किया हैं कि सच्ची आराधना या भजन हमारी आत्मा की क्रिया होनी चाहिए।
आधुनिक कलीसियाओं में आराधना की प्रकृति के बारे मे बहुत कम ज्ञान है, ज्यादातर इसलिए कि हम आराधना और स्तुति के भेद पर विचार नहीं करते। आराधना कोई मनोरंजन नहीं हैं। वह सिनेमा घरों या रगंमंचों में होती है न की कलीसियाओं में। और न ही आराधना और स्तुति एक है। हम परमेश्वर की स्तुति हमारे प्राणों से करते है, और यह सही भी हैं। हमारे स्तुति से हम परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश पाते हैं। परन्तु एक बार हम उसमे प्रवेश पाते है तब आराधना के जरिये हम सच्ची आत्मिक संगति में आनन्दित हो जाते हैं।
परमेश्वर को इस प्रकार आराधना करना ही मुक्ति का लक्ष्य है पहले धरती पर, फिर स्वर्ग में। मनुष्य के लिए यह एक सबसे अधिक व पवित्र कार्य है जो उससे संभव है। और यह तब सम्भव है जब प्राण और देह आत्मा के सामने समर्पित होते है और इनमे एक तालमेल होता है। इस प्रकार की आराधना ज्यादातर शब्दों में बहुत गहरा होता है। यह परमेश्वर के साथ एक मजबूत और निःशब्द संगति बनाती हैं।
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