मानवतावादः मसीह के विरोधी के लिये अग्रदूत ।

Derek Prince
*First Published: 1994
*Last Updated: मार्च 2026
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“क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध, लोहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से और अधिकारियों से और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में है” (इफिसियों ६ः१२)।
पिछले शिक्षापत्र में, हमने उस व्यक्ति के गुणों पर विचार किया जो मसीह के साथ शासन करने के योग्य है। यह पाठ उस आवश्यकता के बारे में है कि हमें युद्ध की आध्यात्मिक प्रकृति को पहचानना चाहिए।
यी “शु मसीह के चेले होने के कारण हम एक लड़ाई में शामिल हो जाते हैं जो धरती और आकाश में हो रही है। हम जिन शक्तियों का समाना करते है, वे हैं प्रधानों से -जो है बुरी आत्मिक शक्तियां जो न दिखने वाले अदृश्य मंडलों में है और हर सच्चे ध् गार्मिकता के विरूद्ध कार्य करता है, साथ ही साथ पूरे संसार में शैतान के आधिपत्य को स्थापित करना चाहती है।
इस लड़ाई में हमारा उत्तरदायित्व अनोखा है क्योंकि मसीह ही हमें हथियार और आत्मिक परिज्ञान देगा जो हमें विजय दिलाएगें । इस संसार के शासक जनों और सेनाएं इन समस्याओं को एक प्राकृतिक रूप से हल करने की कोशिश में है परन्तु उन्हें इस लड़ाई का कोई सामर्थ का पता नहीं जिससे वे, शैतानी शक्तियों से जो आकाश मण्डलों में है, उनसे सामना कर सकें। जिसके दूसरे तरफ इन बातों से अन्जान होकर वे स्वयं भ्रष्ट होते है और शैतानी शक्तियों के अधीन हो जाते है।
विजय की प्राप्ति के लिये जो सबसे जरूरी बात है वह है इन शक्तियों के प्रकृति को जाने और समझे कि हर परिस्थितियों में यह किस प्रकार कार्य करते हैं। हाल ही में मैं जब संसार के इस प्रगति पर विचार कर रहा था खासकर अमरीका और इस्त्राएल पर, मैं विश्वास करता हूं कि परमेश्वर ने मुझे दिखाया शैतान की एक पहचान को और धोखे देने की सामर्थ को। शैतान के चालों को भी यह दिखाया जो उसने इस युग के अंत के लिये रखा है। वह है मानवतावाद ।
जब मैं मानवतावाद के बारे में सोचता हूं तो मुझे हर समय यह एक निर्दोष त्रुटि के रूप में दिखाई दिया।जब मैंने इसका अर्थ शब्दकोश में देखा तो मैं अपनी सोच से पीछे हट गया। उसमें लिखा था
“किसी मानवता के ऊपर किसी भी सामर्थ या नैतिक मूल्यों का त्याग करना; धर्म का त्याग कर इस बात पर विश्वास करना कि मानवता स्वयं अपने बल से विकसित हो सकती है।”
मैंने यह महसूस किया कि मानवतावाद एक निष्क्रिय आत्मिकता नहीं है। परन्तु उसके दूसरी तरफ यह परमेश्वर की सामर्थ और अधि ाकार का त्याग या अस्वीकार करना है। यह धर्म को न मानने वाला एक धर्म है। इस कारण यह कई बार हमें शैक्षणिक प्रणालियों में खासकर अमरीका में धर्म की शिक्षा, उसके मूल अर्थ को, देने से इन्कार करते हैं।
मैंने यह निर्णय लिया कि मैं इस मानवतावाद के बारे में ऐतिहासिक तौर से खोज करूंगा और इसकी शुरूआत मैंने नबूकदनेस्सर के स्वप्न से की जो एक मूर्ति के बारे में था जिसका सिर चोखे सोने का था, सीना और भुजाएं चांदी की, पेट और जांघे पीतल की और टांगे लोहे की थी। इसकी व्याख्या दानियेल ने चार गैर यहूदी साम्राज्य से की जो अधिकार में आयेंगे। सिर था बाबुल; सीना और भुजाएं फारसी देश; पेट और जांघे यूनान और टांगे थी रोम देश (देखें दानिएल २:३१-४६)।
एक बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया : यूनानी देश को उत्पादन अंग के स्थान में बताया गया। मेरे यूनानी साहित्य के जानकारी से मुझे स्वीकार था। मैंने यह पूर्ण रूप से यकीन किया कि किसी अन्य देश से अधिक यूनान वह राज्य है जिसके साहित्य से कई सभ्यताएं उत्पन्न हुईं।
दो यूनानी साहित्यकार के बारे में हमें लिखित प्रमाण है, वे है हेराक्लीटस और प्रोटागोरास। जो तीन कथनी आज तक जीवित हैं वे हैं “सारी चीजें बहती हैं”,
- “आप कभी दोबारा
- एक ही नदी में पांव नहीं रख सकते,
- और “एक मनुष्य सारी बातों का एक माप है”।
यह चौकाती है कि किस प्रकार यह कथनी मानवतावाद का तत्व बन गई। वे कहती हैं कि सारी चीजें एक दूसरे से जुड़ी हैं। कोई नैतिक या कानून नहीं है और मनुष्य ही इस जग का सर्वस्व अधिकार रखने वाला है।
इस अध्ययन के उद्देश्य से जरुरी है इसका विशलेषण करना कि यह विचार किस प्रकार उत्पन्न हुआ। पहला, यूरोप के विचार और फिर यूरोप के जरिये आज की “सभ्यता” के विचार। यूनान ने मानव विचार को पूजनीय बना दिया। परमेश्वर के प्रति आरिसटोटल के विचार थे ‘वही परमेश्वर है जो स्वयं के अपने विचार को गहराई से मनन कर सकता है क्योंकि अपने स्वयं के मनन से ज्यादा कुछ भी नहीं है’। इस साहित्य से बुद्धिवाद का जन्म हुआ।
इस साहित्य के साथ ही यूनानी सभ्यता एक और मुख्य सिद्धांत के बारे में जोर देती है जो एक खेल प्रतियोगिता है। उनकी ओलम्पिक खेल, मनुष्य के बल या योग्यता को पूजनीय समझने की एक प्रक्रिया थी जो आज की सदी में फिर से सशक्त रूप से सामने आया है। टी.वी में सबसे ज्यादा प्रकाशित होने वाले कार्यक्रम है अन्तर्राष्ट्रीय खेल स्पर्धा।
यूनानीयों ने पुरुष और स्त्री के वैवाहिक संबंध को भी गिरा दिया और दो पुरुषों के बीच लैंगिक संबंध को “प्रज्ञात्मक उपलब्धि I” का नाम दिया। एक पुरुष के लिए उनके संवाधिक रूप नग्न है। परन्तु स्त्री के लिये कुछ कपड़े से ढांपा गया है यूनानी देवता मानवता के सारे नैतिक मूल्यों पर गिरी हुई चित्र को दर्शाते हैं। जैसेः
लालसा, अनैतिकता, ईर्ष्या, बदले की भावना और धोखा देना, यथार्थ रूप में नैतिक मूल्यों की न होने की स्थिति। ऐसा एक व्यक्ति उनका देवता है और वे स्वयं की नैतिक मूल्यों का निर्माण करते हैं। आखिरकार वे अपने देवता के स्तर से ज्यादा नहीं जी पाते।
यूनानी मानवतावाद के प्रभाव सारे पश्चिमी सभ्यताओं में देखने को मिलता है। यह परमेश्वर की धार्मिक व्यवस्था जो मुनष्य के साथ है उसे स्पष्ट रूप से अस्वीकार किये जाने को दर्शाती है।
वह व्यवस्था जो परमेश्वर ने पहले मूसा से की और फिर यीशु से। इसका निष्कर्ष यह मिलता है कि मानवतावाद सिवाय ‘सत्य’ के सब पर विश्वास करते हैं और सिवाय ‘धार्मिकता’ के कुछ भी सह सकते हैं।
मनुष्य की यह प्रशंसा ही वह शक्ति है जो अन्त में मसीह के विरोधी को उत्पन्न करेगी और जिसका नाम “मनुष्य का अंक है” (देखें प्रकाशितवाक्य १३:१८)। वह पाप का मनुष्य (व्यवस्थाहीन) जो परमेश्वर के विरूद्ध कार्य करता है और अपने आप को ऊंचा उठाता है और यही नहीं वह परमेश्वर के मन्दिर में भी अपने को स्थापित करता है और स्वयं को परमेश्वर होने की घोषणा करता है (देखें २ थिस्सलुनीकियों २ः३-४)।
पवित्र शास्त्र यह प्रगट करता है कि वह उन सबको अपने अधीन करेगा जिन्होंने प्रेम के सत्य को अस्वीकार किया है। इसी कारण से परमेश्वर एक भ्रम को उनके बीच में भेजेगा जिससे वे उस ‘झूठ’ पर विश्वास करें, जो सबसे पहला झूठ है जिसे शैतान ने हमारे सबसे पहले माता-पिता आदम और हव्वा को धोखा दिया यह कहकर कि “तुम भी परमेश्वर जैसे हो जाओगे” या “देवता जैसे”। मनुष्य जब अपने आपको परमेश्वर के जैसे ऊंचा उठाते हैं तब होता है “भारी क्लेश” उस समय में सारी दुनिया में दुख १६३६-१६४५ के विध्वंस से भी ज्यादा भयंकर होगी (देखें मत्ती २४:२१-२२)।
इस अन्तिम समय के क्लेश से पहले परमेश्वर इस्त्राएल और अपनी कलीसिया के लिए जो उद्देश्य है उसे पूरा करेगा। उसके करूणा की फसल के बाद आयेगी न्याय की फसल। परमेश्वर की यह तैयारी जकर्याह ६ः१३ में प्रगट होती है; “मैं सिय्योन के निवासियों को यूनान के निवासियों के विरूद्ध उभारूंगा।” ‘यूनान के
निवासी' वे है जिन्होंने इस मानवतावाद के धोखे को गले लगाया हैं सिय्योन के निवासी' वे हैं जो न बदलने वाले परमेश्वर के वचन पर स्थिर रहते है और उसके वायदों और व्यवस्थाओं को गले लगाते है। वे वास्तविक इस्त्राएल और उसके कलीसिया से चुने जाएंगे। उनके लिए यह कहा जायेगा, “और वे मेम्ने के लोहू के कारण और अपने गवाही के वचन के कारण, उस पर जयवन्त हुए और उन्होंने अपने प्राणों को प्रिय न जाना, यहां तक की मृत्यु भी सह ली” (प्रकाशितवाक्य १२:११) । उन लोगों की एक मात्र प्राथमिकता होगी; परमेश्वर की इच्छा को करना और यह उनके जीवन से भी बढ़कर होगी।
फिर से यह प्रश्न हमें स्वयं से पूछना हैः क्या मैं सिय्योन के एक वासी के तौर पर अपना स्थान लेने के लिए तैयार हूं?
सांख्यात्मिक रूप से हम मानवतावाद के सामने बहुत कम होंगे। परन्तु हमें हिम्मत बांधनी है उसी प्रकार जैसे यहूदा के राजा, आसा ने किया। जब उस पर एक बहुत बड़ी सेना द्वारा चढ़ाई हुई तब उसकी निराशा के समय कि गई प्रार्थना ने उसके निश्चित हार को एक पूर्ण विजय में बदल दिया। हमारे लिये आज उस राजा की प्रार्थना एक अद्भुत सिद्धांत को प्रबंध करती है जिससे मानवतावाद के स्वयं-प्रशंसा की शक्तियों का सामना कर सकते हैं।
“तब आसा ने अपने परमेश्वर यहोवा की दोहाई दी, कि हे यहोवा! जैसे तू सामर्थी की सहायता कर सकता है वैसे ही शक्तिहीन की भी; हे हमारे परमेश्वर यहोवा! हमारी सहायता कर, क्योंकि हमारा भरोसा तुझी पर है और तेरे नाम का भरोसा करके हम इस भीड़ के विरूद्ध आए हैं। हे यहोवा, तू हमारा परमेश्वर है, मनुष्य तुझ पर प्रबल न होने पाएगा” (२ इतिहास १४:११) ।
आइए हम सब प्रार्थना में एक साथ खड़े हों!
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