“क्या तुम नहीं जानते कि पवित्र लोग जगत का न्याय करेंगे” (१ कुरिन्थियों ६ः२)?

को हमारे उद्धार से दो उद्देश्य थे। नकारात्मक सिरा प यह है कि वह हमे नर्क से बचाना चाहता था जिसके लिए हमें परमेश्वर के प्रति अनन्त आभारी रहना है। सकारात्मक सिरा यह है कि यह स्वयं के लिये एक जन समूह को तैयार कर रहा है जो मसीह के साथ उसके सिंहासन को बांटेगें।

This is the first in a series of three teaching letters that explore the purpose of preparing to reign with Christ.

इससे पहले की आप आगे पढ़ें जरा रूकें और एक पल के लिए यह सोचें कि एक मसीही होने के नाते आप मसीह के साथ अनन्तता में शासन करने के लिए क्या तैयारियां कर रहे है। हमारे विषय में, मैंने और रूत ने यह पाया कि पवित्रआत्मा इस बात पर जोर दे रहा है कि हम उस अनन्तता के लिये तैयारियां करे।

वादे शासन करने के

“यीशु से उन से कहा, मैं तुम से सच कहता हूं कि नई उत्पत्ति से जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा के सिंहासन पर बैठेगा, तो तुम भी जो मेरे पीछे हो लिए हो, बारह सिंहासनों पर बैठकर इस्त्राएल के बारह गोन्नों का न्याय करोगे” (मत्ती १९ः२८)
“जो जय पाए, और मेरे कामों के अनुसार अन्त तक करता रहे, मैं उसे जाति-जाति के लोगों पर अधिकार दूंगा और वह लोहे का राजदण्ड लिए हुए उन पर राज्य करेगा जिस प्रकार कुम्हार के मिट्टी के बरतन चकना चूर हो जाते हैं जैसे कि मैंने भी ऐसा ही अधि कार अपने पिता से पाया है” (प्रकाशितवाक्य २:२६-२७)।

मसीह के साथ शासन करने की तैयारी

मसीह के साथ शासन करने के अनोखे उत्तरदायित्व के लिए एक परिश्रम भरी तैयारी की जरूरत है। सिर्फ नये सिरे से जन्म लेने का दावा करना ही काफी नहीं होता है। आगे हम कुछ मुख्य आवश्यकताओं को देखेंगे।

1. १. धीरज धरना

“परन्तु तुम वह हो, जो मेरी परीक्षाओं में लगातार मेरे साथ रहे। और जैसे मेरे पिता ने मेरे लिये एक राज्य ठहराया है, वैसे ही मैं भी तुम्हारे लिये ठहराता हूं ताकि तुम मेरे राज्य में मेरी मेज पर खाओ पिओ, वरन सिंहासनों पर बैठकर इस्त्राएल के बारह गोत्रों का न्याय करो” (लूका २२:२८-३०),

बहुत से लोगों ने यीशु के शिष्य के रूप में आरंभ किया, परन्तु केवल बारह ही अन्त तक उसके साथ दृढ़ता से बने रहे, और केवल वे ही उसके साथ इस्त्राएल पर राज्य करने के योग्य गिने गए।

लिए आदर दिया और उन्हें इस्त्राएल पर शासन करने के लिये श्रेष्ठ समझा। (ध्यान दीजिए कि यहूदा इसकरियोति ने अपने कपटी व्यवहार के कारण उस सिंहासन का अधिकार खो दिया और उसके स्थान में वह दूसरे को दे दिया गया ।) और हम से जो अन्त तक मसीह के चेले बनकर आज के समय धीरज धरते है? “यह बात सच है कि यदि हम उसके साथ मर गये हैं तो उसके साथ जीएंगे भी। यदि हम धीरज से सहते रहेंगे, तो उसके साथ राज्य भी करेगेः यदि हम उसका इन्कार करेंगे तो वह भी हमारा इन्कार करेगा” (२ तीमुथियुस २ः११-१२) । इसके बारे में अधिक अध्ययन हम अगले दो अध्यायों में करेंगे ।

अगर हमें मसीह के ऊंचे उठाने के विषय को दूसरों से बांटना हो तो हमें उसकी मृत्यु के बारे में पहले बताना होगा और फिर कई परीक्षाओं से गुजरते हुए अन्त तक स्थिर रहना है।

२. नम्रता और आत्मा में दीनता

हम यह भी पढ़ते हैंः “धन्य हैं वे, जो मन के दीन है, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है” (मत्ती ५ः५) ।
Blessed are the meek, for they shall inherit the earth. (Matthew 5:5)

परमेश्वर अपने राज्य को उन लोगों को नहीं सौंपना चाहता जो घमंडी और स्वार्थी है। परन्तु सिर्फ उनको देना चाहता हैं जो यह जानते है कि वे इस आदर के योग्य नहीं है। शमुएल की माता ने इस विजयी गीत की घोषणा की :

“वह कंगाल को धूलि में से उठाता और दरिद्र को घूरे में से निकाल खड़ा करता है; ताकि उनको अधिपतियों के संग बिठाए और महिमायुक्त सिंहासन के अधिकारी बनाए। क्योंकि पृथ्वी के खम्भे यहोवा के है, और उसने उन पर जगत को धरा है” (१ शमुएल २ः८)।

हजारों वर्ष के बाद मरियम नामक कन्या ने इससे भी बड़ी एक विजय-गीत गाई और सत्य की घोषणा कीः

“उसने बलवानों को सिहांसनों से गिरा दिया; और दीनों को ऊंचा किया” (लूका १:५२)।

३. शुद्धता

जिसने अपने आप को हमारे लिये दे दिया, कि हमें हर प्रकार के अधर्म से छुड़ा ले, और शुद्ध करके अपने लिये एक ऐसी जाति, बना ले जो भले भले कामों में सरगर्म हो” (तीतुस २:१३-१४)।

वे लोग जिन्हें मसीह ने अपनी जाति के रूप में स्वीकार किया है, वे वही हैं जिन्हें उसने हर प्रकार के अधर्म से छुड़ाया और अपने लिये शुद्ध किया है।

परन्तु इस शुद्धीकरण के क्रम के दो भाग हैः पहला, आलौकिक, दूसरा मानवीय। प्रेरित यूहन्ना हमारी आशा के बारे में कहते है कि वह उसके वापसी में मसीह के स्वरूप में परिवर्तित हो जायेगी परन्तु और आगे वह कहते हैः “और जो कोई उस पर आशा रखता है, वह अपने आप को वैसा ही पवित्र करता है, जैसा वह पवित्र है” (१ यूहन्ना ३ः३)।मसीह उन लोगों को शुद्ध करेगा जो अपने आप को शुद्ध करने की इच्छा रखते है। परन्तु शुद्धता के लिये परमेश्वर का एक ही सिद्धान्त है : “जैसा वह (यीशु) पवित्र है।"

पतरस हमें बतलाते है कि हम किस प्रकार अपनी आत्मा को शुद्ध कर सकते हैः “सत्य के मानने से अपने मनों को पवित्र किया” जिससे “भाईचारे” की निष्कपट प्रिती रख सकें” (१ पतरस १:२२)। प्रेम से भरी हुई आत्मा है शुद्ध की गई आत्मा।

४. सत्य का प्रेम

धोखे से ही शैतान ने आदम और हव्वा को परमेश्वर के विरूद्ध विद्रोह करने के लिये फुसलाया और यही अब तक मानवता के विरूद्ध उसका हथियार रहा है। प्रकाशितवाक्य में उसे कहा गया है “वह बड़ा अजगर अर्थात वही पुराना सांप... सारे संसार को भरमाने वाला” (प्रकाशितवाक्य १२:६) । और पौलुस २ थिस्सलुनीकिया

२:६-११ में हमें चेतावनी देते हैं कि शैतान की चाल ‘मसीह के विरोधी’ में पायी जायेंगी, जो झूठे चिन्ह और अद्भूत काम के साथ उनको धोखा देगा “जिन्होंने सत्य के प्रेम को ग्रहण नहीं किया” (२ थिस्सलुनीकियों २ः१०)।

‘सत्य के प्रेम को प्राप्त वह शैतान के धोखे में इसलिये यहां हमारी एक ही सुरक्षा हैः करें।’ जो कोई भी इसे अस्वीकार करता है आ जाता है। परमेश्वर स्वयं ही उन्हें भ्रम में डालेगा।

सत्य का प्रेम सिर्फ धार्मिक रीतियों की समानता नहीं है चाहे वह ‘शास्त्र सम्वत’ ही क्यों न हो। और न ही यह हर दिन आपके बाईबल को पढ़ना और “एकांत में समय” व्यतीत करना है। यह एक पूर्ण और अनारक्षित समर्पण चाहता है जो परमेश्वर के वचन को मानने व विश्वास करने के लिए है, और जो सारे समझौतों को मिटा देनेवाला है।

यीशु के दिनों में बहुत से यहूदी यह जान गये थे कि यीशु ही मसीहा है, परन्तु धार्मिक अधिकारियों के डर की वजह से उन्होंने यह स्वीकार नहीं किया “क्योंकि मनुष्यों की प्रशंसा उनको परमेश्वर की प्रशंसा से अधिक प्रिय लगती थी।” (यूहन्ना १२:४३) यही समझौते का तत्व है। हमें स्वयं से यह प्रश्न करना हैः मुझे ज्यादा महत्वपूर्ण क्या लगता है - परमेश्वर की स्वीकृति... या मनुष्य की?

सुलैमान सलाह देते हैं कि, “सच्चाई को मोल लेना, बेचना नहीं” (नीतिवचन २३:२३)। इतने सस्ते ढंग से सत्य की प्राप्ति नहीं होती। इसके लिए आवश्यक है प्रार्थना और वचन के अध् ययन में काफी समय बिताया जाए और साथ ही उन्हें अपने व्यवहारिक जीवन में लागू करना। और इसे हमारे कई सस्ते मनोरंजनों से अधिक प्राथमिकता देनी होगी। यह जीवन का भी समर्पण है।

हमें यह भी चेतावनी मिली है कि हमें सत्य को बेचना नहीं है। हम शायद ऐसे प्रलोभन में आ सकते हैं कि हमें अपने सत्य को प्रतिष्ठा के लिए छोड़ना पड़े और यीशु की “कठोर बातों” को छोड़ते हुए ऐसा एक सुसमाचार को दिखाते हैं जिसमें कोई बलिदान की मांग नहीं होती परन्तु सिर्फ एक आसान जीवन,मसीह के साथ शासन करने की तैयारी का वायदा करते है। फिर भी यह यीशु के चेतावनी पर सही बैठते हैंः (मत्ती ७:१४)।

अगर आप यथार्थ में परमेश्वर के साथ मसीह के राज्य को बांटने की इच्छा रखते है तो मैं यह बताना चाहूंगा कि आप कई बार इन आयतों को पढ़े जो मैंने ऊपर दिये है और देखें किस प्रकार ये आयतें आपके जीवन में लागू होते हैं। अगर पवित्रआत्मा आपके उन जगहों को दिखाते है जहां आप में कमी घटी है तो उससे मदद मांगिए ताकि वह उनमें बदलाव ला सके। सफलता के लिए किस बात की आवश्यकता है? वह है, धीरज धरने की।

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